अमृत ध्वनि छंद
कलम कार
कलम कार बनके सबो,कविता लिखथे रोज।कुछ मन के टेढ़ा रहे,कुछ के रहिथे सोज।
कुछ के रहिथे,सोज सरल जी,भाखा बढ़िया।
पर कुछ मन के,टेढ़ा मेढ़ा, निच्चट अढ़िया।
अउ कुछ मन के,भाव तको ला,नइ भावय जन।
कविता लिखथे,रोज कतिक झन,कलम कार मन।1।
हँसिया
हँसिया परसुल काम के,साग सुधारे जाय।मिरचा लहसुन गोंदली,काटत आँसू आय।
काटत आँसू, आय सबो के,पानी पानी।
नाक कान ला,छू परबे ता,रोत बिहानी।
चानी चानी ,काट काट के,खाथे रसिया।
ये रँधनी के,राजा संगी,परसुल हँसिया।2।
चौकी बेलन
बेलन चौकी के बिना,रोटी नइ बेलाय।गरम तवा मा सेंक दव, तब रोटी ला खाय।
तब रोटी ला,खाय सबोझन,मन भर के जी।
सिलपट्टा के,चटनी हे ता,अउ ला दे जी।
खा के चटनी ,बासी रोटी,अब्बड़ खेलन।
गजब सुहाथे, रोटी बेले,चौकी बेलन।3।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार