Tuesday, 13 July 2021

उल्लाला छंद

बैसाखी

बैसाखी धर के कभू,देश चलय नइ जान लव। 
बिन बैसाखी के रहे,पल्ला दउड़य मान लव। 

दुवा करव भगवान ले,बैसाखी झन आय जी। 
लड़बिड़ लड़बिड़ होय ले,देश कहाँ बढ़ पाय जी। 

पप्पू गप्पू जे बने,पर कंधा मजबूत हो। 
मान बढावय देश के,बने बने करतूत हो। 

बैसाखी के दाँव ले,देश तको थर्रा जथे।  
अवसर वादी मन सदा,सबो मलाई खा जथे। 

बैसाखी केशर बने,करलव इखर इलाज जी। 
पाँव रहे मजबूत जे,पहिरा देवव ताज जी।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

कुण्डलियाँ

कुण्डलियाँ 

पानी तरिया मा रहे,रहे खेत खलिहान। 
नदिया नरवा ढोड़गी,झिरिया कुआँ खदान। 
झिरिया कुआँ खदान,सबो मा पानी पाते। 
जन जीवन खुशहाल,धरे पग जेती जाते। 
तइहा के ये बात,बताथे हमला नानी। 
अब तो हाहाकार,मिले ना चुरुवा पानी।1।

कइसे होही सोंचथौं, ये जग के कल्याण।
मनखे, मनखे ले लड़े,रोज चलावय बाण। 
रोज चलावय बाण, मारथे अपने भाई। 
लहू बहे हर रोज,मचे घर घर करलाई।  
करदव कछू उपाय,रहय सब मनखे जइसे। 
हो जावय कल्याण,सोंचथौं होही कइसे।2।

खोपा मा गजरा सजा,अउ कलगी दे खोंच। 
बिंदी माथा मा लगा,अउ जादा झन सोंच। 
अउ जादा झन सोंच,रूप बड़ सुंदर लागे। 
शहरी छोरी जान,तोर ले दुरिहा भागे। 
लाल लिपिस्टिक मार,लगत हे ओमन धोपा। 
तोर रूप चमकाय,लगे जे गजरा खोपा।3। 

अँधियारी छाई रही,राह दिखा ना कोय। 
चंदा भी आया नही,रहिरहि बादल रोय। 
रहिरहि बादल रोय,समझ ना पाये कोई। 
गरज चमक के संग,बदरिया काहे रोई। 
नाचय झूमय मोर,पंख फैला के सारी। 
अब तो होली शाम,छटा ना ये अँधियारी।4।

छत छतरी छतराय हे, देवत हावय छाँव।
ददा बने छतरी रहे,जरय कभू नइ पाँव। 
जरय कभू नइ पाँव,रहे ओ सुख के सागर। 
कतको तँय हर मांग,देत ओ आगर आगर। 
खाली रहे न पेट,मिलय भर पतरी पतरी। 
जिनगी भर सुख झेल,ददा के हे छत छतरी।5। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

पद पादाकुलक छंद

पी के दारू

पी के दारू,गिरे उतारू। 
हमर बुधारू,संग समारू।  

बिहना जावय,दारू लावय। 
पी के आवय ,शोर मचावय।

रोज बिहानी ,इही कहानी। 
सुनलव संगी,मोर जुबानी।  

गारी गल्ला,होवय हल्ला। 
मारय लोगन,भागय पल्ला। 

बाई रोवय,रोवत सोवय। 
लइका पिचका,सब ला ढोवय।

बेंचय थारी,ब्यारा बारी। 
पारी पारी,रहे उधारी। 

नइ हे खाना,ठौर ठिकाना। 
दरुहा सोंचय,चल मरजाना। 

दारू करथे,कतको मरथे। 
जिनगी बरथे,घरो उजरथे। 

लोगन कहिथे,कहिते रहिथे। 
तोर करे ला, सबझन सहिथे। 

छोडव दारू,सुनव बुधारू। 
संग समारू, बनव जुझारू। 

रचनाकार, दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

कुण्डलियाँ

कुंडलियाँ 

माते हाहाकार हे, गरमी हे बिकराल। 
सुरुज देव कइसे कहँव,तहीं बिगाड़े हाल। 
तहीं बिगाड़े हाल,तपा दे धरती दाई। 
सुख्खा नदिया ताल,मचा दे हच करलाई। 
पूजा होतिस तोर,दिसम्बर मा जे आते। 
अभी हवस जंजाल,घरों घर झगरा माते।1। 

ऊर्जा के तँय स्रोत अस,मानत हे संसार। 
अतका ऊर्जा फेंक के,धरती ला झन बार। 
धरती ला झन बार,जीव सब्बो मरजाही। 
पानी जाही सूख, पेड़ मन सब जर जाही। 
मनखे का बचपाय,टूटही पुर्जा पुर्जा। 
रख ले बने सम्हाल,काम आही सब ऊर्जा।2। 

बाढ़े गरमी देख के,मन मा आय विचार। 
कुछ कम हे ता चल जही,जादा हे बेकार। 
जादा हे बेकार,रहे सरदी या गरमी। 
पानी लाथे बाढ़,पाय नइ कोनो नरमी। 
हवा बनय तूफान,उखाड़य रुखुवा ठाढ़े। 
धन लाथे अभिमान,जेन घर जादा बाढ़े।3। 

बिन गरमी के मर जही,जतका रहे सजीव। 
गरमी जादा होय ता,बरही जस निरजीव। 
बरही जस निरजीव,बात कुछ समझ न आवय। 
कइसे करँव उपाय,सबो जिनगी बच जावय। 
पेंड़ लगे जे पोठ,सबोझन पाही नरमी। 
ऊर्जा तक मिलजाय,पाय सुख सब बिन गरमी।4।

रचनाकार, दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

हायकू

हाइकु 

बरस पानी 
झन कर नादानी 
धरा सुखागे। 

घाम बाढ़े हे। 
सगा कस ठाढ़े हे। 
कहाँ भगाँव। 

पाँव जरथे। 
रेंगत अखरथे। 
बिना छाँव के। 

नदी सुखागे। 
रेती सबो खवागे। 
टूरा पोट्ठा गे। 

बादर आथे। 
हमला बिजराथे। 
मटक देथे। 

भोग मनखे। 
पाँव कुल्हाड़ी मारे। 
धरा उजारे। 

धीरज धर। 
मानसून तो आही। 
गिरय नही। 

देश बाढ़ गे। 
कारखाना बना के। 
खेत खन के। 

खाना बने खा। 
जहर मिलाय हे। 
सबो खाय हे। 

उड़जा पंछी। 
ठिकाना खतम हे। 
भू हजम हे

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

कुकुभ छंद


नाक

नाक किसी का लंबा होता,और किसी का हो छोटा। 
कुछ लोगों का पतला होता,कुछ का होता है मोटा। 

मिट्ठू जैसे नाक किसी के,टेढ़ा कुछ का होता है। 
कुछ के छोटे कन्चे जैसे,कुछ मेंढक सा होता है। 

उठे उठे कुछ नाक दिखेंगे,कुछ पिचका सा होता है। 
कुछ के भद्दे से भद्दे है,पर ओ कभी न रोता है। 

छेद नाक के कुछ हैं छोटे,खुला खुला भी पाओगे। 
अपना भी तो देखो साथी, कैसा है बतलाओगे। 

एक नही पर होता सब का,सब में कुछ गहराई है। 
नाक बने पहचान सभी का,देवों ने अपनाई है। 

कुछ के ऊँचे नाक रहे ओ,शान दिखाया करते हैं। 
कभी कहीं जो नाक कटी तो,मूँह छुपाया करते हैं।

जैसा भी हो नाक मगर कुछ,नाक बचाया करते हैं। 
नाक कटे के डर से कुछ तो,जान गँवाया करते हैं। 

सूर्पनखा की कटी नाक तो, लंका को ही बार दिया।
एक नाक के कारण रावण,अपने कुल को मार दिया। 

रहे नाक की सभी लड़ाई,कोई झुकना ना चाहे। 
अपना नाक बचाने खातिर,दूजे को मारे काहे। 

जैसा भी हो नाक जान लो,काम एक ही आता है। 
सभी जीव जिंदा रहने को,स्वांस यहीं से पाता है।  

नाक रहे बस छेद चलेगा, फिर क्यों लम्बा रहता है। 
अगर पता हो तो बतलाओ,जो दिलीप ये कहता है।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

हायकू

बरखा रानी

टूरा बिलवा। 5
मण्डरावत हावे। 7
तिरे तीर मा। 5

आँखी मारथे। 
सबकुछ हारथे। 
चिल्ला चिल्ला के।  

मया लुटाये। 
हमला बने रिझाये।
हवा चलाये।

बिलवा जोही। 
मनभर भिगोही। 
बिना गरजे। 

मया अपार। 
अमृत कस धार। 
सबो हमागे। 

भरगे कोरा। 
दाई जइसे जोरा। 
टुरी अघा गे। 

आबे करिया। 
भर जय तरिया। 
खार सुहावै। 

धनहा डोली। 
हरियर रंगोली । 
हँसी ठिठोली। 

बरखा रानी। 
भेजव अब पानी। 
झन हो देरी। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

रोला छंद

मेंछा

मेंछा मा दे ताव,जाँघ मा थप्पी मारय। 
खेलय दंगल दाँव, उठा के तहाँ पछाड़य। 
जाने का हे बात,मरद के मेंछा मा जी। 
कतको तो घबराय,देख के होजय राजी। 

कतको मेंछा मोंठ,कतक के पातर पातर। 
कतको गुच्छा दार, रहय कुछ चातर चातर। 
कुछ के जस तलवार,रखे कुछ चुटकी भर जी। 
कुछ के धारी दार, रखय कुछ कली अमर जी।

नत्थू के ओ मूँछ,रहे अमिताभ बखानय।
मेंछा होथे शान,मरद ला झट पहिचानय।  
केस्टो तक के मूँछ, रहे माछी के जइसे। 
पकड़ न पावय हाथ, ताव फिर देवय कइसे।

लड़े कभू नइ मूँछ, मगर ओ ताव बताथे। 
परे छुरा के धार,सफाचट भी हो जाथे। 
सोला ले शरुवात,मरत तक जामे रहिथे। 
करिया पाका मूँछ,कहानी पूरा कहिथे। 

अभिनन्दन के मूँछ,देश के आन बचाये। 
विग सोला दिस मार,शान से वापस आये।   
देखत रहिगे पाक, मूँछ तक छू नइ पाइस।  
नोचत रहिगे बाल, पाक अबड़े पछताइस।

बुढ़वा मन के भाव, लाम मेंछा ले बाढ़े। 
बन मुखिया सरदार, सबो के आगू ठाढ़े।
मेंछा दे के ताव,हाथ ला फेरत रहिथें। 
हवय मूँछ मा धार, ताव देवत सब कहिथें

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

हाकली छंद

बादर आवत

बादर आवत हे करिया।भर जाही नदिया तरिया।
घड़घड़ गरजत आवत हे।बिजुरी तक चमकावत हे। 

सरसर सरसर हवा चले।लोगन ला अब कहाँ छले। 
जइसन रूप दिखावत हे।तइसे जल बरसावत हे। 

गाँव तको हरसावत हे।बरसा के दिन आवत हे।
लोगन खुसी मनावत हे।गीत खुसी के गावत हे। 

गरुवा पल्ला भागत हे।आय हरेली लागत हे।
साँप तको इतरावत हे ।येती ओती जावत हे। 

घर घर नाँगर साजत हे।ठक ठक लकड़ी बाजत हे। 
बइला  भूँसा खावत हे।काम बहुत ओ आवत हे।

नाँगर ला पजवालव ना।डाँड़ी नवा बनालव ना।
पंचारी सजवालव जी।नहना नवा बना लव जी।

खाँध उठा के नाँगर ला।पेरे जावव जाँगर ला। 
इही किसनहा के पढ़ना।भाग अपन हावय गढ़ना। 

बइला सहपाठी बन के।सँग मा जावत हे तन के।
कोरा कागज खेत बने।नाँगर चलथे कलम सने।

ओरी ओरी जावत हे।सुग्घर देख लिखावत हे।
लिख लिख धान उगावत हे।मिहनत के फल पावत हे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

हाकली छंद

गूगल ज्ञानी

गूगल ज्ञानी ज्ञान कहे।मोर कहे ला मान कहे। 
जइसे मँय बतलावत हौं।अच्छा से समझावत हौं। 

पूछ्व बात फटाफट जी।पाव जवाब खटाखट जी। 
जइसन चाहव पूछ सकौ।मोर जवाब सवाद चखौ। 

धरती ले अम्बर तक जा।या सागर के पूछ सखा। 
जम्मो ज्ञान धराय हवे।गूगल ज्ञानी पाय हवे। 

का पकवान बने कइसे।नानी हर जानय जइसे। 
सब येमा भंडार भरे।पूछ सबोझन काम करे। 

खेती कइसे हे करना।कतका हे पानी भरना। 
खातू देना हे कतका।जहर होय झन नइ जतका। 

ये इतिहास बतावत हे।मुर्दा तक घर लावत हे। 
कोन मरे कइसे कहिथे।मनखे मन कइसे रहिथे।  

गाना सुनले तँय झट ले।फ़िल्म दिखाथे ये खट ले। 
पुस्तक जेला भी पढ़ले।जिनगी जइसे भी गढले।

आये हे भगवान कहाँ।काम करे का जहाँ तहाँ। 
का खातिर बर आवत हे।कइसे काम बनावत हे। 

जीव जगत ला जानत हे।कहाँ रहे ये छानत हे। 
तन कइसे सब काम करे।अलग अलग सब नाम धरे। 

बीमारी होथे कइसे।बैद बतावत हे जइसे। 
करना का उपचार कहे।जम्मो गूगल ज्ञान रहे। 

जब कोनो घर जावत हे।रसता तको बतावत हे। 
कोनो कहूँ गँवावत हे।खोज उहू दिखलावत हे। 

छोटे ले छोटे तक हे।पूछ्व जतका जी सक हे। 
ज्ञान पिटारा खोलव जी।बात अपन बस बोलव जी। 

कतका बता बखान करौं।मँय अज्ञानी अभी हरौं। 
पूरा खोल न पाय हवौं।कुछ कुछ ला बतलाय हवौं। 

सबके साथी बने हवै।गूगल मा जे सने हवै। 
पता चले ना समे कहाँ।गूगल हे जब साथ जहाँ। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

बाल कविता

बादर आजा 

आजा बादर आजा।
आसमान मा छा जा। 

धरती ला हरिया दे।
सूरज दूर भगा दे। 

धरती सूखा हो गे।
रुखवा दुख ला भो गे।

रोवत हवय किसनहा।
सुख्खा परगे धनहा। 

मनखे अब पछताथे।
रुखवा कोन लगाथे।

जंगल सबो कटा गे।
नदिया तको अँटा गे। 

बिन पानी मर जाबो। 
कइसे जान बचाबो। 

तोरे बस हे आसा। 
झन होवय ग निरासा। 

आजा बादर आ जा। 
पानी अब बरसा जा। 

इसकुल जाये पाबो।
पढ़ लिख मजा उड़ाबो। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

सखी छंद

जाड़ा

जाड़ा अब्बड़ लागत हे।लइका मन तक जागत हे। 
कोनो सुत नइ पाये हे।जाड़ा के दिन आये हे। 

ठण्डा ठण्डा हवा चले।जावय बाहिर कोन भले। 
कतको काम जरूरी हे।रहना घर मजबूरी हे। 

स्वेटर साल लदाये हे।गरम अँगेठी भाये हे। 
कहाँ रजाई छूटत हे।भीतर खुसरे घूटत हे। 

जम्मो कथरी साँट डरे।बेरा चढ़गे खाट धरे। 
टस ले मस नइ होवत हे।बेर कुबेर ग सोवत हे। 

कोन नहाही पानी मा।दुख भारी जिनगानी मा। 
कंचन काया अकड़ जही।बात कहत हँव मान सहीं। 

सुर सुर हवा हिलोरत हे।जिनगी नइया बोरत हे। 
कटरत हावय दाँत घलो।बिस्तर भीतर चलो चलो। 

गरम बनादे चाय अभी।गरम पकोड़ा लान सभी। 
जाड़ा ला निपटाना हे।जल्दी दूर भगाना हे। 

ये जाड़ा के आये ले।बरसा दूर भगाये ले। 
गरमी सुरता आवत हे।तन ला जेन जलावत हे। 

गरमी जाड़ा या बरसा।जादा देवत हे तरसा। 
अति झन होवय भाई जी।नइते हो करलाई जी। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

सरसी छंद

  झिल्ली 

झिल्ली के बिन काम चले ना,बेबस है इंसान। 
पर झिल्ली होता है भाई,बहुत बड़ा शैतान।

छोटी सी छोटी चीजें अब,झिल्ली भर बेंचाय। 
बड़े बड़े झिल्ली में भर के,धर सब घर ले आय। 

पाउच या मिक्चर हो कोई,शेम्पू बिस्किट मान। 
हल्दी मिर्च नमक या धनिया,पोहा तेल पिसान। 

कपड़ा पानी बर्तन झाड़ू,खेल खिलौने दाल। 
झिल्ली में सब भर कर आते,बन जाते जंजाल। 

डिस्पोजल भी पाट रहा है,हराभरा मैदान। 
मच्छर का घर बन जाता है,दुख पाये इंसान। 

नाली में झिल्ली है जाता, बंद करे सब द्वार। 
खेत खार चौपट हो जाता,खेती हो बेकार।  

पर कुछ काम रहे झिल्ली का,जो सबको स्वीकार। 
पानी से बचने के खातिर,लोग लगाते द्वार। 

छान्ही के ऊपर छाने को,ढँकते और अनाज। 
पानी से गर बचना है तो,झिल्ली है सरताज। 

जहाँ जरूरी लगता है बस,वहीं करें उपयोग। 
वरना झिल्ली से बढ़ सकता,भारी भरकम रोग। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

सखी छंद

अत्याचार

कहाँ हवस भगवान बता।
लइका मन ला झन ग सता। 
होवत अत्याचार इहाँ।
मानत हे भगवान जिहाँ। 

रकसा घर घर बाढ़त हे।
दुख देये बर ठाढ़त हे। 
अइसन मन के नास करौ।
मारे खातिर बाण धरौ। 

नारी निर्बल मानत हे।
अबला ओला जानत हे। 
बल से अत्याचार करे।
मन माफिक हथियार धरे।

उम्र तको नइ देखत हे।
रद्दा बाट म छेंकत हे। 
बड़का धर ले जावत हे।
लइका कहाँ बचावत हे। 

बिनती ला नइ मानत हे।
धरे कटार ल तानत हे। 
कोनो ला डर्राय नहीं।
मारत तक थर्राय नहीं।

अब्बड़ सोर मचावत हे।
हिरदे ला दहलावत हे। 
काखर बल मा गरजत हे।
नइ मानय जे बरजत हे। 

मनखे मन सब हार चुके।
मन अपनो सब मार चुके। 
अब तो तोरे आस हवै।
आबे ये बिसवास हवै। 

तीर कमान धरे झन आ।
चक्र सुदर्शन झन दिखला। 
तिरसुल काम न आवत हे।
गदा कहाँ चलपावत हे। 

किसिम किसिम हथियार धरे।
ये बैरी मन काम करे। 
येखर काट निकालव ना।
नवा नवा कुछ लानव ना। 

मारव जइसे भी करके।
काँपय जम्मो मन डर के। 
अइसन कुछ तो काम करौ।
जन जन मन के पीर हरौ। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

दोहे

दोहे हिंदी

गौर वर्ण की सुंदरी,जिसके काले नैन। 
मेघ सरीखे जुल्फ हैं,कोयल जैसी बैन। 

चंदा जैसी छब लिए,मुख मीठी मुस्कान। 
रंग गुलाबी होठ है,ज्यूँ खाई हो पान। 

भौंहे तीर कमान सा,कजरा लगे कटार।
गाल गुलाबी फूल है,होठ लगे रसदार।  

ना ऊँची तूँ ऊंट सी,जिसके लम्बे पाँव।
छोटी पर ठिगनी नही,ज्यों बरगद के छाँव। 

काया हाथी सा नही,जिसके देंह विसाल। 
जिस तन पे गिर जाय तो,बन जाये ओ काल।  

तूँ पूरी परफेक्ट है,ज्यूँ घोड़ी के देंह। 
देख तुझे क्यों साँवरी,अंतस उठे स्नेह। 

अब तेरी बस चाह है,मृग नैनी सुन बैन। 
जो मेरी तूँ ना हुई,नहीं मिलेंगे चैन। 

मेरे घर में आ सखी,कर दे मुझे निहाल। 
रौशन कर घर आँगना, मेंट सभी जंजाल। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार