Thursday, 25 March 2021

बाल गीत

सार छंद 

चंदा मामा तँय बतलादे, दिन भर कहाँ लुकाये। 
रतिहा बेरा तँय मुस्कावत, कोन डहर ले आये। 

का गलती तँय हर कर डारे, देख सुरुज घबराथस। 
जइसे रतिहा होथे ताहाँ, चुपके चुपके आथस। 

कभू ओढ़ चादर तँय आथस, दिखथस हँसिया जइसे। 
कभू दिखे थारी कस गोला, रूप बदलथस कइसे।  

पुन्नी रतिहा गजब सुहाथे, रूप लगे मन भावन। 
खोर गली अउ अँगना परछी, लागे अबड़ सुहावन।

दाई खीर बना के राखे, रतिहा छत मा आबे। 
अमरित के बरसा बरसावत, मन भर खा के जाबे।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

Friday, 12 March 2021

अमृत ध्वनि छंद

अमृत ध्वनि छंद 

गाँव-गाँव मा शोर हे, जइसे होवत जंग। 
ढोल नगाड़ा संग मा, उड़ियावत सब रंग। 
उड़ियावत सब, रंग फगुनवा, होली आगे। 
खेत खार सब, महके लागिस, फुलुवा छागे। 
लइका बुढवा, अउ जवान सब, जमे ठाँव मा।  
फगुवा गावय, शोर मचावय, गाँव-गाँव मा।1।

बड़ा घमंडी तँय हवस, कर ले तनिक विचार। 
का धर के तँय आय हस, का ले जाबे यार। 
का ले जाबे, यार बता तँय, जब मर जाबे। 
सब धन दौलत, इहँचे रइही, कुछ नइ पाबे। 
मया लुटा ले, मान नही ते, परही डंडी। 
सब दुरिहाही, कहिके तोला, बड़ा घमंडी।2।

मरना हावय सोंच के, रहिथस बहुत उदास। 
माटी के ये तन बता, अइसन का हे खास। 
अइसन का हे, खास जगत मा, जे नइ छूटय। 
हीरा मोती, जड़े हवय का, घर नइ फूटय। 
जे आही ते, निश्चित जाही, फिर का डरना।  
खा ले पी ले, मौज उड़ाले, जब हे मरना।3।

रिस्ता नाता काम के, रख सुग्घर गठियाय। 
मया पिरित मा बाँध ले, देख दूर झन जाय। 
देख दूर झन, जाय कहूँ तँय, कर ले जोखा।
टूटे रस्सी, गाँठ परे फिर, देथे धोखा।
कतको तँय हर,रसता जोहत, कर जगराता। 
दूर होय ले, मिल नइ पावय, रिस्ता नाता।4।

बचपन बीते मौज मा, धुर्रा माटी खेल। 
आय जवानी रात दिन, चिंता नून अउ तेल। 
चिंता नून अउ, तेल सकेले, हपटत बीते। 
घर के जोखा, नइ हो पावय, रहिथे रीते। 
खींच तान मा, पता चले नइ, होगे पचपन। 
सुरता आथे, गुज़रिस कइसे, पूरा बचपन।5। 

आये हावस तँय इहाँ, छोड़ देव के धाम। 
बिसरा झन माया फ़से, भज ले सीता राम। 
भज ले सीता, राम नाम के, सुमिरन करले। 
तज माया तँय, प्रभु मूरत ला, अंतस धरले। 
मोर-मोर के, रटन लगाये, का तँय पाये।
फस माया मा, तड़फत हावस, जब ले आये।6। 

काया माटी के बने, झन कर गरब गुमान। 
घुर जाही सब एक दिन, प्रभु मा दे तँय ध्यान। 
प्रभु मा दे तँय, ध्यान बरोबर, तरही चोला। 
ऊपर वाला, खुद ले जाही, रथ मा तोला। 
धन दोगानी, काम न आवय, ठगनी माया। 
सदा रहय नइ, ये दुनिया मा, कखरो काया।7। 

स्वांस चलत ले मोह हे , मरते तुरत जलाय। 
जानत हे सब ठाठ ये, काम कछू नइ आय। 
काम कछू नइ, आय तहाँ ले, नाता टोरय। 
कपड़ा लकता, कथरी खटिया, सब ला जोरय।  
फेंक दुबट्टा, माचिस मारय, देह जलत ले। 
रिस्ता नाता, मान प्रतिष्ठा, स्वांस चलत ले।8। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़
फ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन

212 1212 1212 1212  

जाड़ बाढ़ गे हवे बता नहाये जाय बर। 
का जरूरी हे कका नहाना भी ह खाय बर?

छोड़ के रजाई जाना हर तको न भात हे। 
जान बूझ के मरे ल जाय का नहाय बर। 

हाथ गोड़ काँपथे सुने कका ये जाड़ के।  
कोन हर बनाये जाड़ ला भला सताय बर। 

दिन घलो निकल जथे फुसुर-फुसुर रुके नही। 
ये सुरुज तको बने न आय जी तपाय बर। 

दिन बिताव शॉल ओढ़ भुर्री ताप के भले। 
रात लाद कतको कम हे जाड़ ला भगाय बर।

मुँह तको धुले नही उठे नही हे खाट ले।
रात के पहात ही लड़े बिहानी चाय बर। 

घुरघुरासी लागथे नहाय बस के नाम ले। 
पर रथे तियार मन ह आनी बानी खाय बर।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

रोला छंद

रोला छंद

बाढ़त हावय भाव, आय पर नइ बाढ़त हे। 
गजब गरीबी जान, सुरुज तक हर ठाढ़त हे। 
कइसे करँव उपाय, मिले छइयाँ ये तन ला। 
मँहगाई के झाँझ, जरावत हे तन मन ला। 

कतको के हे सोंच, कहाँ वोला हे जाना। 
नइ हे मोटर कार, कहाँ पेट्रोल भराना। 
फिर भी परही मार, खाय के जिनिस ठठाही। 
दू रुपिया के चाय, पाँच रुपिया मा आही। 

कतको करव विरोध, कान मा जूँ नइ रेंगय। 
भरयँ खजाना पोठ, आम लोगन ला ठेंगय। 
होगे बारा हाल, गरीबन के अब थारी। 
मँहगाई के मार, रोय जनता बेचारी।

मन कहिथे झन बोल, चलन दे जो होवत हे। 
पर बइठे सरकार, गरीबन ला धोवत हे। 
सपना बहुत दिखाय, पाय हावय आसन ला। 
करत दिखे नइ काम, सुनाथे बस भाषण ल।

जे मन बोलय साँच, आँच हरदम वो पाथें। 
लबरा मन के राज, साँच मन डंडा खाथें। 
झन संगी तँय बोल, नही ते हो करलाई।
चुप रह दिलीप सुजान, इही मा हवय भलाई 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़