Sunday, 21 February 2021

बाल कविता

बाल कविता 

साइकल सीखत हे सोनू, 
सँग मा दउड़त हे मोनू। 
कैची फाँक फँसाये हे, 
हेंडिल सम्हल न पाये हे। 

हॉफ पायडिल मारत हे, 
झट ले पाँव उतारत हे। 
फिर खट ले चढ़ जावत हे, 
अड़बड़ मजा उड़ावत हे। 

रेस चलाये बर लागिस, 
जाने का मनवा जागिस। 
गड्ढा पागे हकरस ले। 
सोनू गिर गे भकर ले। 

दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

Thursday, 18 February 2021

ताटक छंद

ताटक छंद 

नही कहो तो सब करते हैं, करो कहो कतराते हैं। 
है विचित्र यह मानुष प्राणी, बंधन से घबराते हैं।

जहाँ थूकना लिखा मना हो, वहाँ थूक कर आते हैं। 
पीकदान में कहो थूकने, देख पात्र शर्माते हैं। 

जहाँ पार्क को रहे मनाही, गाड़ी वही टिकाएँगे। 
वहीं लिखो सौ रुपिया देना, गाड़ी तुरत हटाएँगे। 

जहाँ प्रसाधन रहे मनाही, साधन वहीं बनाते हैं। 
बड़े बेशरम होते हैं ये, जग में नाक कटाते हैं।  

कहने की जो बात नही है, उसी बात को बोलेंगे। 
जिसको कहना है जन-जन में, जुबाँ नही वो खोलेंगे। 

नियम धियम में बंध कर रहना, कहते ये नाकामी है।
जब हम है आजाद हिंद के, करना नही गुलामी है।

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार18221

बाल गीत

बाल गीत 

मोर बबा के टेड़गा लौठी, सुग्घर बने सहारा जी। 
धरे बबा हर घूमत रहिथे, निशदिन आरा पारा जी। 

कहूँ कुकुर हर भूँके लागिस, एक्के लौठी मारत हे। 
काँय-काँय कर कुकुर भगावय, गोल्लर तक मन हारत हे। 

दातुन खातिर मार गिरावय, बमरी रुख के डारा जी। 
मोर बबा के टेड़गा लौठी, सुग्घर बने सहारा जी। 

खेत खार जब घूमे जावय, रसता ला चतवारत हे। 
कहूँ साँप बिच्छू मिल जावय, बबा कहाँ ले हारत हे। 

टेड़गा लौठी मा दे मारय, भगे साँप बेचारा जी। 
मोर बबा के टेड़गा लौठी, सुग्घर बने सहारा जी। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार18-02-2021

Monday, 8 February 2021

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे रमल मुसम्मन मशकूल सालिम मज़ाइफ़ [दोगुन]
फ़यलात फ़ाइलातुन फ़यलात फ़ाइलातुन

1121 2122 1121 2122

जभे मोर मन से लिखहूँ  तभे काम मोर होही।  
रहे भाव जब भराये तभे नाम मोर होही। 

ये कहाँ फँसे हवँव मँय,बँधे मोह माया बंधन।
करे बर परे तपस्या तभे राम मोर होही। 

दही बर नचाये गोपी त दिखाय नाच कान्हा। 
मया मा रिझाहुँ मँय हर तभे श्याम मोर होही।

करे जेन हर दिखावा वो कहाँ चले सफर मा। 
रमे मन जहाँ रमाये तभे धाम मोर होही।

परे हे डगर डगर मा रहे सिरतो नइ पुछारी।
सजे राह मा जे आहूँ तभे दाम मोर होही। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

Sunday, 7 February 2021

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रमल मुसम्मन मशकूल सालिम मज़ाइफ़ [दोगुन]
फ़यलात फ़ाइलातुन फ़यलात फ़ाइलातुन

1121 2122 1121 2122 

बबा के कमाये धन मा ददा हर पुटानी मारे। 
करे हे बहुत दिखावा जुआ मा तकोच हारे। 

बचे नइ हवय तनिक भी जगा खेत खार भर्री।  
चले मोर घर ह कइसे बिना काम बिन सुधारे।

उठे हे उफान नदियाँ बहे तेज धार भारी।
फँसे जिंदगी के नइया बता कोन अब उबारे। 

परे राह मा जे पथरा चला मिल अभी हटाबो। 
नहीं ते हपट जही जी चले राह जे बिचारे। 

गरी खेल के फँसाथे गुथे मोह माया चारा। 
फँसे लालची जे मछरी दिखे दिन तको म तारे।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

 

Saturday, 6 February 2021

घनाक्षरी

जल हरण घनाक्षरी 

खटिया के चार खुरा, बिना पाटी के अधूरा, 
गाँथबे नेवार कामा, कर ले विचार तँय। 

कहूँ रखे चार पाटी, कतको रहे वो खाँटी, 
बिना खुरा पाबे कहाँ, सोंच ले अधार तँय। 

राख खुरा पाटी सँग, गाँथ ले नेवार तँग, 
सुत फिर लात तान, रोज थक हार तँय।

सुख जिनगी म पाबे,गंगा रोज तें नहाबे, 
नता रिसता ल जोंड़, जिनगी सँवार तँय। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

Monday, 1 February 2021

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़
फ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन

212 1212 1212 1212 

देश ला अजाद जे कराये वो अमर रहे। 
जान दे के आन जे बचाये वो अमर रहे। 

वीर वो सपूत नाम दर्ज जिन कराय हे। 
नइ कराय जान पर गँवाये वो अमर रहे। 

सब गरीब ला उठाय बर विचार जे करे।
जेन संविधान ला बनाये वो अमर रहे। 

देश के सुरक्षा बर डटे रथे सबो पहर। 
सीमा मा सिपाही जेन जाये वो अमर रहे। 

भूख ला मिठाय बर गड़े रथे जे खेत मा। 
जे किसान अन्न ला उगाये वो अमर रहे।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार


गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़
फ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन

212 1212 1212 1212 

बात-बात मा बड़े-बड़े निकलथे बात हर। 
बात जब खिंचाय बीत जाय पूरा रात हर। 

बात के बिना कभू बने न कोई बात जी। 
बात ला बिचार के कहव बढ़े न घात हर। 

बोलना हे बात ला समाज में त सोंच लव। 
जोश मा बिगड़ जथे त पर जथे ग लात हर। 

बात जब गरम रहे त दूर होना ठीक हे। 
मुँह तको जलाय देत हावे ज्यादा तात हर। 

जब उठे धुआँ-धुआँ समझ जवव जलत हवे। 
पेंड़ तक सहे नहीं झड़े लगे जी पात हर। 

खून सींच के कमाय तेन मन अघाय जी। 
जे रहे अलाल तेला नइ मिठाय भात हर। 

नर्म भाव रख जिये ले सुख सदा मिलत रथे। 
जेन हे घमंडी तेला नइ सहाय मात हर। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार