Wednesday, 20 November 2019

लावणी

लावणी छंद

बने रहिस ओ दिन हा संगी,लोटा धर बाहिर जावन।
इही बहाना खेत खार ले,तिवरा भाजी धर लावन।

मेड पार के ओधा बइठे,तिवरा के बटकर टोरन।
पोट्ठा पोट्ठा राहेर ल तब,टोर टोर लोटा जोरन।
पेंड़ तरी मा बइठे बइठे,मीठ मीठ बोइर खावन।
बने रहिस ओ दिन ओ दीदी,लोटा धर बाहिर जावन। 

संझा बेरा मूड़ कोर के,सखी सहेली सँग जावन।
नवा नवा लुगरा अउ गहना, संगी मन ला दिखलावन।
लोटा धर भाँठा मा बइठे, सुख दुख सबझन बतियावन।
इही बहाना

नवा बहुरिया जब घर आवय, सास संग बाहिर जावय।
गाँव गली तरिया अउ नदिया,देख देख बड़ सुख पावय।
परिचय होवय नवा सखी सँग,इही बहाना मिल पावन।
बने रिहिस ओ

नल जल अउ शौचालय ला के,हमला घर खुसरा करदिन।
तरिया नदिया खेत छूट गे, बाहिर जाना सब हर लिन।
सखी सहेली के बिन दीदी,बइठे बइठे पछतावन।
बने रिहिस

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

लावणी छंद

लावणी

गरुवा घुरुवा अउ बारी,जब चिंता हावय भाई।
पाँच रुपइया किलो गोबर,ले लव चिंता मिट जाई।

बीच सड़क मा गरुवा बइठे,देखे बर तक नइ पाबे।
घर घर जम्मो रहे बंधाये, जेन गली मा तँय जाबे।
दुरघटना ले तको बचाही, नइ होवय फिर करलाई।
पाँच रुपइया किलो गोबर,लेलव चिंता मिट जाई।

गोबर ले फिर गैस बना के,घर घर मा चूल्हा बारव।
लकड़ी छेना बंद करव अउ,पेंड़ कटाई ला टारव।
गोबर खातिर खार खार फिर,नइ भटकय दाई माई। 
पाँच रुपइया किलो गोबर,लेलव चिंता मिट जाई

फिर से दूध दही के नदिया,गाँव गली पावन करही।
कर दीही सब दूर मिलावट,घर घर मा पइसा भरही।
घुरुवा ले बारी हरियाही,मगन होय फिर भौजाई।
पाँच रुपइया किलो गोबर,लेलव चिंता मिट जाई।

दिलीप कुमार वर्मा

Saturday, 2 November 2019

आल्हा

(पहिली हवाई यात्रा )

संगी साथी संग टूर मा,गोवा जाये बर तइयार।
टिकिट कटाये हन जहाज के, आज बइठबो पहिली बार।

गेन रायपुर के माना मा,जिहाँ रखावत रहे जहाज।
रहे विवेकानन्द नाम से,जे भारत के हावय ताज।

झोला झँगड़ी देख एक झन,बोलिस ओ सब येती लान।
रखदे येमा जाँच करे बर, भीतर के होही पहिचान।

जाँच कराके चलत रहन ता,कहिथे ये सब जमा कराव।
अपनो जाँच कराये खातिर, बिन झोला के येती आव।

जम्मो पइसा, बेल्ट मुबाइल,डब्बा मा ओमन रखवाय। 
पुरजा पुरजा जाँच करत हे, तब भीतर कोती बुलवाय।

हम सब संगी सोंचत राहन, झोला हर कइसे नइ आय।
बिन झोला के काम बने नइ,सोंच सोंच मनवा पछताय।

खड़े रहन सब आगू पाछू, ततके बेरा बस हर आय।
सब जहाज मा जाबो सोंचन,जाने बस काहाँ ले जाय।

दू मीटर मा लेग उतारय,खड़े रहय गा जिहाँ जहाज।
भारी भरकम देख जहाजे,मन हर गदगद होगे आज।

सीढ़ी चढ़ फिर भीतर पहुँचे, ठंडा ठंडा अबड़ सुहाय।
आगी बारे कस तक लागय,बिक्कट धुँआ धुँआ कस छाय।

गोरी चिट्टी टूरी मन हा,अँगरेजी हिंदी बतियाय। 
सुग्घर सुग्घर रूप देख के,मन मोरो अबड़े हरसाय।

कनिहा मा पट्टा ला बांधे,फिर जहाज हर दौंड लगाय।
जाने कब ऊपर उड़ियागे,खिड़की देख समझ मा आय।

घर कुरिया मन कुँदरा लागय,मनखे तनिक नजर नइ आय।
तरिया नदिया डबरा होगे, रुख राई तक नइ चिनहाय।

जतके ऊपर ऊपर जावय,ततके भारी कान पिराय।
अब तो खड़ा होय कस लागय,का होवत हे समझ न आय।

बादर के हे दिखे बिछौना,पोनी जइसे रहे बिछाय।
बिजुरी चमकत मा जब जावय,तब जहाज हर तक हिल जाय।

बादर अउ बादर बस दिखथे,अउ काँही हर नजर न आय।
बिन बादर मा गाँव दिखत हे, कोन गाँव ये कोन बताय।

काफी पीबो मन हर होगे, सौ रुपिया तब भाव बताय।
भारी मँहगा हे समान सब, तब ले मनखे मन खजवाय।

झटकुन हमला पहुँचा देइस,देख मुंबई के दरबार।
फिर जहाज ले गोवा पहुँचे, इही यातरा के हे सार। 

गोल घुमावत पट्टा कोती, हमला ले के खड़ा कराय।
जेन रायपुर मा हम छोड़े,ओ झोला सब इहचे आय।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
2-11-2019

Wednesday, 2 October 2019

दुमदार दोहे

जानवर के हाल

काँव काँव कउवा करे,बइठ अटारी मोर।
लगथे पहुना आय घर,तभे करत हे शोर।
बरा बर दार फिलोहूँ।
नही ते रोटी पोहूँ।

भाँव भाँव भूँकत हवय,कुकुर गली मा आज।
लगथे चोर हमाय गे,अपन करे बर काज।
धरे लाठी मँय जाहूँ।
चोर ला खूब ठठाहूँ।

म्याऊँ म्याऊँ बोल के,घर मा खुसरत आय।
दूध दही ला देख के,तुरते चट करजाय।
कहाँ मुसुवा ओ पाथे।
बिलाई बड़ा सताथे।

जब ले जंगल काट के,कर दिन हे वीरान।
तब ले देखव बेंदरा,करे अबड़ परसान।
घरो घर रार मचाथे।
साग भाजी ला खाथे।

भर्री भाँठा छेंक के,धनहा सबो बनाय।
गरुवा चारा बर सखा,बता कहाँ अब जाय।
खेत भर घूमय खावय।
सड़क मा रात बितावय।

शेर मार के खाल ला, बेंचय ऊँचा दाम।
हाथी दाँत निकाल के,अपन बनावय काम।
कहाँ जंगल मा राजा।
बने मनखे के खाजा।

उत्पादन के मोह मा, खातू देत ढकेल।
कीरा मारे के दवा,डारत हावय पेल।
अन्न मा जहर ह भरगे।
चिरइया मन सब मरगे।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

सुखी सवैया


अरछी परछी कुरिया अँगना, अब छोंड़ गली कइसे मँय जावँव।
पुतरी पुतरा चुलहा चुकिया,सब छोंड़ सखी कइसे बिसरावँव।
तरिया डबरी नरवा नदिया,बखरी धनहा ल कहाँ अब पावँव।
ससुराल गए सब छूट जही,भगवान जनी कब मैं हर आवँव।

घर के भिथिया खिड़की खटिया,जठना कुरसी सब जानत हावय। 
कब कोन कहाँ कइसे रइही, कहना सब मोर ल मानत हावय।  
जब जेन कहौं घर आवत हे, सब मोर ददा धर लानत हावय।
नइ जावँ सखी घर छोड़ कभू,सब आहट ला पहिचानत हावय।

दिलीप कुमार वर्मा

आल्हा

भोले बाबा

भोले बाबा तहीं बतादे,कइसे तोर दरस बर आवँ।
छाती लोटत साँप हवय ता,कइसे तोला जल ल चढ़ावँ।

लगे महीना सावन के हे,बून्द बून्द बर तरसे धान।
बाती जइसन सबो बरागे,माथा धर के रोय किसान।
अइसन भारी विपदा मा मँय,कइसे उखरा रेंगत जावँ।
छाती लोटत साँप हवय ता,कइसे तोला जल ल चढाँव।

बम भोले के ये जयकारा,मोर हलक तक अब नइ आय।
काँवर पानी धर के रेंगव,मोरो मन ला अब नइ भाय।
तोर चढ़े परसाद बता दे,कइसे के अब मँय हर खावँ।
छाती लोटत साँप हवय ता,कइसे तोला जल ल चढाँव।

मंदिर के घण्टा हर भोले,रहि रहि के मोला चिड़हाय।
तोपवँ कतको कान तभो ले,गूंज गूंज के भीतर आय।
देदे भोले अब परसादी, तोर दरस बिन रह नइ पावँ।
छाती लोटत साँप तभो ले,तोर दरस बर मँय हर आवँ।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

रोला छंद


(1)
भर्री भाँठा खेत, सबो परिया पर जाही।
छत्तीसगढ़ मा देख, मानसुन जे नइ आही।
मरजाही सब पेंड़, घाँस मन तको सुखाही।
जीव सबो मरजाय, बता फिर कोन बँचाही।।

(2)
मनखे जावव चेत, पेंड़ ला अभी लगालव।
बोर करव सब बंद, कुँआ तरिया अपनालव।
नदिया देवव बाँध, नहर ला अउ बगरालव।
हरियर हरियर खेत, खुसी ला सबझन पालव।।

(3)
लहराही जब पेंड़, खुसी के बादर छाही।
गरजत घुमड़त आय, पोठ के जल बरसाही।
हरसाही सब जीव, बने सब भोजन पाही।
तब ही मनखे तोर, मेहनत हा रँग लाही।।

छंदकार - दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

दोहा


तड़फय मछरी कस सबो, पानी बिना किसान।
कलप कलप रोवत हवय, देख भुंजावत धान।1।

अजर अमर ओ मन रहय, नेक करे जे काम।
दुख सुख के साथी बने, सेवक जेखर नाम।2।

पग पग मा काँटा मिले, सत मारग जे जाय।
बाधा टारत जे चले, अवतारी कहलाय।3।

दरपन कस सच्चा बनव, कहदव मुँह मा बात।
बिगड़े बात सँवार लय, झन पावय आघात।4।

कलम चला के देख लव, ये बड़का हथियार।
बन्दुक जे नइ कर सके, कलम करय सरकार।5।

हाथ लिखाये नइ रहय, करम करे ओ पाय।
बिना हाथ के मन तको, सरग अमर दिखलाय।6।

बटकी मा झन छोडबे, एक़्क़ो दाना भात।
मान करे नइ अन्न के, ते मन खाथे लात।7।

बिन मंजिल जे रेंगथे, भटक जथे ओ राह।
मिहनत के फल तब मिले, रख मन में जब चाह।8।

रचना - दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

कुंडलियाँ

  लोटा

खाली लोटा मा भरव,जिनगी के कुछ सार।
ताम झाम ला देख के,झन भरहू बेकार।
झन भरहू बेकार,बोझ बस बाढ़त जाथे।
असल परिक्षा बेर,कहाँ फिर सुरता आथे।
मल मल तन चमकाय,बनाये कँचन थाली।
कचरा भर पछताय,गये ता लोटा खाली।1।

लोटा हे बड़ काम के,सच में करव विचार।
कलश बना पूजा करव,पहिरा देवव हार।
पहिरा देवव हार,लगा के चोवा चन्दन।
दीपक बने जलाव,करव अंतस ले वंदन।
अस्थि कलश बन जाय,रहे लोटा नइ खोटा।
काम अबड़ ओ आय,रहे जे घर मा लोटा।2।

चल दय लोटा ला धरे,करे सत्य के खोज।
सार सार लोटा भरे,जे मिल जावय रोज।
जे मिलजावय रोज,करय फिर मंथन भारी।
कचरा देवय फेंक,खोज फिर राखय जारी। 
रोज लगावय ध्यान,तेन हर ओला बल दय।
लावय जग बर सार,जेन लोटा धर चल दय।3।

धर के लोटा आय जे,कम ओला झन आँक।
हाथ दिखा के देख ले,जिनगी ला दय झाँक।
जिनगी ला दय झाँक,बता दय करम कहानी।
का हे बढ़िया काम,करे का तँय मनमानी।
करे सत्य के खोज,लाय हावय ओ भर के।
पाय हवय ओ सार,गये जे लोटा धर के।4।

लोटा मा जब छेद हे,कहाँ रुके फिर सार।
कतको भर ले लान के,हो मिहनत बेकार।
हो मिहनत बेकार,रहे खाली के खाली।
सबो कमाई तोर,उड़ा देवय घरवाली।
कर ले थोरिक चेत,कती ले हावय खोटा।
ओला बने सुधार,तभे भर पाही लोटा।5।

ये तन लोटा जान ले,हावय दस ठन छेद।
सब्बो होथे काम के,अलग अलग हे भेद।
अलग अलग हे भेद,समे मा ये खुल जाथे।
इही छेद के देन, जीव मन जीवन पाथे।
साफ रखव सब छेद,स्वस्थ रह जाही तनमन।
चमचम ले चमकाव,रहे लोटा जस ये तन।6।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

कुंडलियाँ


(1)
सागर के लहरा असन, लहरावव दिनरात।
कल-कल नदिया कस बहव, कोयल जइसन बात।
कोयल जइसन बात, गाव झरना कस गाना। 
चलव हवा के संग, करव जी आना जाना।
जिनगी हे दिन चार, जियव सब दू मन आगर।
अंतस लाव उफान,लाय जस लहरा सागर।

(2)
सुरता आवत हे बहुत, दिन गुजरे कुछ साल।
टुटहा घर कुरिया रहय, बत्तर राहय हाल।
बत्तर राहय हाल, गरीबी रहना बसना।
कोदो कुटकी खान, रहय नइ खटिया दसना। 
कपहा राहय पेंठ, चिराये राहय कुरता। 
चड्डी ना बनियान, आज सब आवय सुरता।

(3)
मानत नइ हे बात ला, बड़का भइया मोर।
दारू पीथे रोज के, अब्बड़ करथे शोर।
अब्बड़ करथे शोर, करत हे झगरा भारी।
लइका मन चिथियाय, रोत हे घर के नारी।
पढ़े लिखे हुसियार, होय नुकसानी जानत।
पर होगे लाचार, कहे ला ओ नइ मानत।

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

सवैया

चकोर
सास कहाँ कहिथे कुछ जी,अब तो बहु के चलथे सरकार।
सास रहे बपुरी दुबके,खटिया न मिले न मिले घर द्वार।
देत परोसत हे जइसे, तइसे उन खावत हे मन मार।
खेदत हे कतको घर ले,बपुरी निकले अब रोवत हार।

मदिरा
स्वारथ मा सब प्रेम करे,बिन स्वारथ प्रेम कहाँ मिलथे।
आवक हे जब सास करा,तब ही बहु के मन हा खिलथे।
जेकर आवक हा नइ हे, तब तो बहु के मन हा हिलथे।
रोज चलावत बाण रहे,कहिके कुछ भी छतिया छिलथे।

मदिरा
काम करे जब सास इहाँ,लइका रखवार बने घर के।
माँजत हे टठिया मन ला,अउ लीपत हे फरिया धर के।
जाँगर के चलते खुस हे, बहु काम तियारत हे भर के।
काँचत हे कपड़ा लकता,रहिथे घर सास तभो डर के।

किरीट
बाढ़ जथे लइका मन हा,अउ सास रहे सब जाँगर खोवय।
सोय रथे खटिया धर के,बपुरी चुपके चुपके अब रोवय।
हे भगवान उठा जलदी,कहिथे अब मोर सरेख न होवय।
स्वारथ के सब प्रेम रहे,बिन स्वारथ मा समसान पठोवय।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

लावणी छंद

जीभ

मुँह के भीतर रहय जीभ हा,तेकर कथा सुनावत हँव।
दुख पीरा अउ काम धाम ला,सुनलव आज बतावत हँव। 

नरम नरम नाजुक ये जिभिया,सब के काम बनावत हे।
बोले अउ खाये के खातिर,काम सबो के आवत हे।

रहे बतीसी मुँह के भीतर,हरपल जे चाबत रहिथे।
जीभ बिचारी बाँच बाँच के,पीरा ओखर बड़ सहिथे।

कभू कभू सप्पड़ मा आवय,लाल बाल तब हो जावय।
अंतस ले तब आह निकल जय,खून तको बाहिर आवय।

दाँत कटाकट चाबत रहिथे,मनखे जब भोजन खावय।
जीभ बिचारी पेल पेल के,दाँत बीच खाना लावय।

करू मीठ अम्मठ अउ नुनछुर,चुप्पुर तक ला बतलाथे।
जीभ भरोसा सबो जीव मन,स्वाद लेत खाना खाथे।

लार लान के बने मिला दय,लुगदी भोजन बन जाथे।
तभ्भे खाना भीतर कोती, आसानी से लीलाथे। 

आखर आखर बोले खातिर,जीभ अबड़ नाचत रहिथे।
कभू दाँत तालू ला छू के,साफ साफ आखर कहिथे।

कतको कहिथे कैची जइसन,जीभ बात ला काटत हे।
कतको कहिथे बोल बोल के,भेजा तक ला चाँटत हे।

गरुवा मन के लम्बा जिभिया, नाक तको ला साफ करे।
साँप निकाले जीभ अपन ता,मुसुवा तक ला भाँप डरे।

मन माफिक जे स्वाद मिले ता,चाँट चाँट जिभिया लाथे।
पेट भरे तब ले मनखे हर,ठूँस ठूँस खाना खाथे।  

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

चौपई छंद

हरेली

आय हरेली के त्यौहार,हरियर दीखय खेती खार।
बइठ सगा झन तँय मन मार,मिहनत नइ होवय बेकार।

नाँगर रपली राँपा लान,जेन भरोसा बोये धान।
धो के फूल चढावव जान,पूजव येला देव समान।

गुरहा चीला बने बनाव,सब अवजार म भोग लगाव।
श्रद्धा के अंतस रख भाव,सबझन सुग्घर आशिष पाव।

गरुवा बर तँय आंटा सान, अउ खम्हार के ले आ पान।
नून डार लोंदी तँय लान,गरुवा खाही अमरित जान।

जंगल के कांदा दशमूल, बने पकावव रख के चूल।
सबो खवावव हो झन भूल,गरुवा के मिटही सब सूल।

रो रो लइका करय अलाप,ओखर बर तँय गेंड़ी खाप। 
रचरिच रचरिच करही जाप,चिखला के नइ पावय ताप।

नोनी बाबू खुडवा खेल,मल्ल युद्ध कस पेलम पेल।
फुगड़ी खोखो बिल्लस ठेल, आही देखे रेलम रेल।

छत्तीसगढ़ के हरे तिहार,जेमा खुशियाँ हे भरमार।
जुरमिल रहिथे सब नर नार, जानय अब येला संसार।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ

चौपई छंद

नशा

नशा नाश करथे ये जान,तन हो जाते मरे समान।
झन रहिबे तँय हर अनजान,नुकसानी ला अब पहिचान।

सब्जी के बड़ बाढ़े भाव,चटनी ले अब काम चलाव।
बोरे बासी सबझन खाव, दार भात ला दूर हटाव।

चिखला के अब दिन हर आय,देख पाँव हर फिसलत जाय।
नोनी मटक मटक इतराय,भद ले गिरगे सबो सनाय।

येती सुख्खा ओती बाढ़, हवा चले ले ठिठुरे हाड़।
पेंड़ सूख गे देखव ठाड़,धूंका मा बड़ लागय जाड़।

लइका कूद कूद इतराय,बरसा ले ओ नइ घबराय।
बाहिर कोती नाचत जाय, बरसा के ओ मजा उड़ाय।

गरजत हे बाहिर झन जाव, बिजुरी ले थोरिक डर्राव।
घर मा बइठे जान बचाव,नइ ते बिजुरी तन मा खाव।

करिया बादर जब जब आय,रद रद रद पानी बरसाय।
सब किसान के मन हरसाय,बाढ़ आय ले सब पछताय। 

ताटक छंद

ताटक छंद

सूरज सरजी छुट्टी में है,वर्षा मैडम आई है।
कोर्स हुआ कम्प्लीट मैम का,फिर भी क्लाश लगाई है।

कॉपी पूरा लिख डाले हैं,जगा यहाँ ना खाली है।
फिर भी नियमित मैम पढ़ाती,कैसे कहूँ दिवाली है। 

रखे मार्जिन जो कॉपी थे,उसमें भी लिख डाले हैं।
बड़ी भूल कर बैठे हमतो,तभी पड़े ये लाले हैं।

सूरज सर की करें पतिक्षा,आके जान बचाएँगे।
वर्ना कॉपी में लिक्खा जो,सारे ओ मिट जाएँगे।

सूरज सर जी जल्दी आओ,अभी परीक्षा होना है।
रहा अगर परिणाम शून्य तो,बरस बरस भर रोना है।

वर्षा की जब पड़े जरूरत,सूरज सर जी आते थे।
वर्षा मैडम कभी कभी आ,थोड़ा आश बँधाते थे।

अब सूरज का काम यहाँ है,तो वर्षा फिर आई है।
रखा समय का ध्यान नही औ, आके हमे सताई है।

हैड मेम दुर्गा आई पर,वर्षा मेंम कहाँ माने।
अपने ऑफिस बैठी दुर्गा,सुंदर सा छतरी ताने। 

लगता है शाला खुलने का,समय बढ़ाया जाएगा।
तब ही वर्षा औ सूरज का,समय मेंच हो पाएगा।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

Thursday, 26 September 2019

कविता

चूहा बिल्ली 

चूहा चूँ चूँ बोल रहा था।
कोठी को ओ खोल रहा था।
मेरी किस्मत झोल रहा था।
पक्के दाने फोल रहा था। 

बिल्ली हमने पाली एक। 
जिसमे खूबी भरीअनेक।
रातों को ओ करता चेक।
चूहा देखे करे अटेक।

पर चूहा था बड़ा चलाक।
चुपके से लेता था ताक। 
बड़ी तेज थी उसकी नाक।
बिल्ली देखे भगे तपाक। 

बिल्ली की अब बढ़ी आबादी।
पता नही कब हो ली शादी।
चूहों ने पाई आजादी।
अपने ऊपर आफत लादी।

बिल्ली चूहे ठेल रहे हैं।
माल हमारा झेल रहे हैं।
सुबे शाम ओ पेल रहे हैं।
चोर सिपाही खेल रहे हैं।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

अमृत ध्वनि छंद

अमृत ध्वनि छंद -- दिलीप कुमार वर्मा

1
जग के पालन हार प्रभु,बिनती सुनलव आज।
बिगड़ी सबो बनाय के,पूरा करदव काज।
पूरा करदव,काज हमर ला, शरण परे हन।
फँसे हवन सब,मोह मया मा,पाप करे हन।
झूठ बोल के,लूटत हावन,सब ला ठग के।
राह बता के,सुग्घर करलव,पालन जग के।
2
ऊपर वाला जानथे, कोन करे का काम।
सब ला फल ओ देत हे,नइ देखय ओ नाम।
नइ देखय ओ,नाम काखरो, पद का हावय।
जइसे करथे,करम इहाँ ओ,फल ला पावय। 
राजा हो या,रहे भिखारी,गोरा काला।
करम मुताबिक,फल देवत हे, ऊपर वाला। 
3
रसता बने बनाय लव,दे भविष्य के ध्यान।
काली उँगली झन उठय,तभ्भे पाहू मान।
तभ्भे पाहू,मान जान लव,कहना मानव। 
रसता बिगड़े,गारी खाहू, सच ला जानव।
पुरखा मनके, गलती खातिर,होगे खसता।
भाई भाई, झगरा माते, बिगड़े रसता।
4
मर जाही ओ एक दिन,जे हर जग मा आय।
राजा चाहे रंक हो,माटी मा मिलजाय।
माटी मा मिल,जाय सबोझन,कतको करलय।
हीरा मोती,सोना चाँदी, कतको भरलय।
ये धन दौलत,महल अटारी,काय बचाही। 
काल आय ले,बाँच सके ना,सब मर जाही।
5
मन के पीरा का कहँव,नइ हे कछू उपाय।
अंतस हा रोवत रथे,काम धाम नइ भाय।
काम धाम नइ,भाय जगत के,अलकर लागे।
मन हे चंचल,रुके नही घर,अन्ते भागे।
जब ले बाई,दूर बसे हे, सुध नइ तन के। 
काय बतावँव,समझ सकत हव,पीरा मन के।
6
बचपन के संगी बता,कब तक रहिबे संग।
ऊँच नीच जब हो जही, का तँय करबे तंग।
का तँय करबे,तंग बता दे,या सँग रहिबे।
रूखा सूखा,घाम छाँव के,दुख ला सहिबे।
खेलत खावत,उमर बढ़त हे, होगे पचपन। 
समे जाय ले,सुरता आवय,दिन ओ बचपन।
7
जागत सुतबे जान ले,अड़बड़ हाबय चोर।
रतिहा चुपके आ जथे,करय नहीं ओ शोर।
करय नहीं ओ, शोर सराबा, सुनले संगी।
गली गली मा, पासत रहिथे,बड़ उतलंगी।
सुन्ना घर ला, देख खुसरथे,बनथे भागत।
चोर उच्चक्का,घूमत हाबय,रहिबे जागत।
8
करिया बादर देख के,सबके मन हरसाय।
गरज चमक पानी गिरे,झूमन नाचन भाय।
झूमन नाचन,भाय सबो ला, करके हल्ला।
येती ओती,गरुवा तक हर,भागय पल्ला।
खेत खार अउ,नदिया नरवा,भरगे तरिया।
उमड़ घुमड़ के,जब बरसावय, बादर करिया।
9
पढ़ना लिखना छोंड़ के,करत हवव का काम।
बचपन बीते हे नहीं,का पाहू तुम दाम।
का पाहू तुम,दाम बता दव,मिहनत करके।
टूट जही तन,रूठ जही मन,पीरा धरके।
अभी बहुत हे, लम्बा रसता,हाबय चढ़ना।
आके इसकुल,सीखव संगी,लिखना पढ़ना।  
10
सावन मा शिवनाथ के,दर्शन बर सब जाय।
फूल पान पानी चढ़ा,मन चाहा वर पाय।
मन चाहा वर,पाय सबोझन,झोली भरथे।
भोले बाबा,अवघट दानी,पीरा हरथे।
चले कँवरिया, बोले बमबम,बड़ मनभावन।
ठनठन घण्टा,बजे शिवाला,पूरा सावन।
11
बिन पानी मछरी मरे,तइसे होवय हाल।
दूषित होवत हे धरा,सब के आगे काल। 
सबके आगे,काल हलक मा,कुछ नइ बाँचय।
पेंड़ काट के,नदी पाट के,पाँव ल खाँचय।
खाना पानी,हवा बिना अब,का जिनगानी।
घोर प्रदूषण,सुख्खा धरती,हे बिन पानी।
12 
रोटी बर तरसत रथे,कतको इहँचे लोग।
कतको मन फेकत रथे,नइ कर पावय भोग।
नइ कर पावय,भोग अन्न के,अतका रहिथे।
कोठी कोठी,भरे खजाना,दुनिया कहिथे।
सब जनता के,हक ला लूटे,बोटी बोटी।
हीरा मोती,का ओ खाही,खावय रोटी।
13
भागय नइ ओ काम ले,तन से जे लाचार। 
मिहनत करथे रात दिन,नइ मानत हे हार।
नइ मानत हे, हार कभू ओ,सदा डटे हे।
कतको आवय, आंधी संगी, कहाँ हटे हे।   
ओ प्रहरी कस,सजग रहत हे, हरपल जागय।  
जाँगर पेरय, रोटी खातिर,ओ नइ भागय।
14
लकड़ी ले कुर्सी बने,गाड़ा तखत कपाट।
टेबल चौखट पीढ़वा,चौंकी बेलन खाट।
चौंकी बेलन,खाट बना ले,झट बन जाथे।
पुतरी पुतरा,खेल खिलौना,सब ला भाथे। 
मुड़का ढेंकी,बैट बना ले, खावत ककड़ी।
पेटी तबला,कैरम खूंटी,बनथे लकड़ी।
15
राधा रोवत हे सखी,बइठे जमुना तीर।
कान्हा आवत नइ दिखे, कतका धरही धीर।
कतका धरही,धीर धरे बर,जिगरा चाही।
कोन जानथे,नटखट बिलवा,कब तक आही।
देखत रसता,चमके लागिस,चंदा आधा।
जमुना के तट,बइठे बइठे,रोवय राधा।
16
दारू अब तो छोंड़ दे,लावत हवय विनास।
कतको पी के मर जथे,कतको रहिथे लास।
कतको रहिथे,लास बरोबर,निच्चट मरहा। 
कतको झगरा,रहे मताये,जस बलकरहा।
घर कुरिया के,सोर कहाँ अब,करे बुधारू। 
बन के भकला,घूमत हावय,पी के दारू।
17
हरियर चारा देख के,गरुवा भागय खार।
कतको ठेला बांध लय, नइ पावत हे पार।।
नइ पावत हे, पार नदी के,चारा माढ़े।
गरुवा छेंके,लाठी धर के,राउत ठाढ़े।
गरुवा घूमे , खोर गली अउ,पारा पारा।
बीच सड़क मा,खाके बइठे,हरियर चारा।
18
चंदा मामा दूर हे,रहे चँदैनी संग।
रतिहा बेरा आय के,बने जमाथे रंग।
बने जमाथे,रंग रंग के,खेल दिखाथे।
आधा पूरा,चंदा मामा,सब ला भाथे।
लाख चँदैनी,चटके रहिथे,कामा कामा।
कभू कभू तो,तनिक दिखे ना,चंदा मामा।
19
धरती के रक्षा करे,सैनिक हे तैयार।
सीमा मा ठाढ़े हवय,कभू न मानय हार।
कभू न मानय,हार जही ओ,बैरी मन ले।
साहस भरके,सदा खड़े हे, तन मन धन ले। 
अपन देश बर, जान लुटाए,होथे भरती। 
बने बने तब,रहिथे भइया, सबके धरती।

रचना कार--दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

रोला

रोला

कर दे हे अँधियार,लगे बरसा हर आगे।
गरजत घुमड़त देख,बदरिया कारी छागे।
बरसत हे घनघोर, खेत भर पानी पानी।
आना जाना बंद,रुके हावय जिनगानी।

लगे सितम्बर मास,भरे दाई के कोरा।
दुर्गा दाई आय,करत हे सबो अगोरा।
पर आगे बरसात,योजना के का होही।
जेखर निकले धान,मुड़ी धर ओ हर रोही।

पानी पा हरसाय,किसनहा भाँठा वाला।
छेंकय मुहि के पार,कहय पानी झट पाला।
हो जाही अब धान,रहे नइ एक्को बदरा।
किरपा दाई तोर,धान सब जाही भदरा।

कइसे करहूँ काम, नौकरी वाला सोंचय।
सुख्खा मा बरसात,देख के मुड़ ला नोंचय।
रेन कोट ला लान,पहिर झट इसकुल जाहूँ।
जाड़ा की बरसात,जान ला महूँ बचाहूँ।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

सरसी छंद

सरसी छंद --चक्का

जीव जगत मा जब आइन हे, पाँव भरोसा ताय।
जइसन जइसन क्षमता राहय,तइसन दउड़ लगाय।

कखरो दूठन पाँव रहय ता,कखरो राहय चार।
कतको मन बिन पाँव चलत हे, कतको के भरमार।

पर जेमन के पाँख रहय ओ,अम्बर मा उड़ियाय।
दउड़इया सब जीव जगत ले,ओ आघू हो जाय।

मनखे हर अब सोंचे लागय,कइसे करँव उपाय।
जीव जगत के जम्मोझन ने,मनखे हर अघुवाय।

घोड़ा के फिर करे सवारी,सरपट दउड़ लगाय।
पर घोड़ा मा एक्के जावय,ज्यादा जा नइ पाय।

धीरे धीरे सोंचत सोंचत,पाइस एक उपाय।
लकड़ी ला फिर काट छाँट के,चक्का एक बनाय।

दू चक्का ले गाड़ी बनगे,बइठत हे दू चार।
बइला भइसा खींचन लागे,काम आय भरमार। 

सयकिल के निर्माण होय ले,सबके जागय भाग।
खड़बिड़ खड़बिड़ दउड़न लागय,छेड़ हवा सँग राग।

तीन तीन चक्का ला जोड़य, रिक्सा बने बनाय।
बइठारय दू चार सवारी,खींच तहाँ ले जाय।

धीरे से फिर ईंधन वाला,गाड़ी आइस जान।
मोटर सयकिल सरपट भागय, करय पूर्ण अरमान। 

बरसा जाड़ा घाम बचावय, अइसन करव उपाय।
चक्का फिर ओ चार लगा के,बस अउ कार बनाय।

जादा झन ला लेगे खातिर,फिर बनगे जी ट्रेन।
सरपट पटरी मा ओ दउड़य,चक्का के हे चेन।

मनखे सोंचे पाँख रहे ले,चिड़िया हर उड़ियाय।
अब उड़ियाये खातिर मनखे,सोचन लगे उपाय।

मनखे के मिहनत ले देखव,बनगे हवय जहाज।
आसमान मा ओ उड़ियावय,जेमा सबला नाज।

धरती अम्बर या हो सागर,सब मा चले जहाज।
लेगत हे राकेट इहाँ ले,चन्द्रयान ला आज।

चक्का के निर्माण होय ले,मनखे जीतय जंग।
सबले आगू भागत हावय,दुनिया देखय दंग।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार