चकोर
सास कहाँ कहिथे कुछ जी,अब तो बहु के चलथे सरकार।
सास रहे बपुरी दुबके,खटिया न मिले न मिले घर द्वार।
देत परोसत हे जइसे, तइसे उन खावत हे मन मार।
खेदत हे कतको घर ले,बपुरी निकले अब रोवत हार।
मदिरा
स्वारथ मा सब प्रेम करे,बिन स्वारथ प्रेम कहाँ मिलथे।
आवक हे जब सास करा,तब ही बहु के मन हा खिलथे।
जेकर आवक हा नइ हे, तब तो बहु के मन हा हिलथे।
रोज चलावत बाण रहे,कहिके कुछ भी छतिया छिलथे।
मदिरा
काम करे जब सास इहाँ,लइका रखवार बने घर के।
माँजत हे टठिया मन ला,अउ लीपत हे फरिया धर के।
जाँगर के चलते खुस हे, बहु काम तियारत हे भर के।
काँचत हे कपड़ा लकता,रहिथे घर सास तभो डर के।
किरीट
बाढ़ जथे लइका मन हा,अउ सास रहे सब जाँगर खोवय।
सोय रथे खटिया धर के,बपुरी चुपके चुपके अब रोवय।
हे भगवान उठा जलदी,कहिथे अब मोर सरेख न होवय।
स्वारथ के सब प्रेम रहे,बिन स्वारथ मा समसान पठोवय।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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