Friday, 31 July 2020

चौपाई

चौपाई 

मरने से पहले जी लेना। 
सोच समझ कर नैया खेना।  
जीवन नैया है मझधारा। 
चतुर सयाने उतरे पारा। 

धर्म कर्म से झोली भरते। 
मीठी बोली मुख पे धरते। 
निंदा से दूरी रखते हैं। 
जीवन अमृत फिर चखते हैं। 

मानवता की पाठ पढ़ाते। 
भला बुरा सबको समझाते। 
दीन हीन की बने सहायक। 
समरसता दे बनते नायक।  

दान धर्म का खोल पिटारा। 
मान कमाते हैं संसारा। 
भाई चारा को अपनाते। 
हाथ बटाने आगे आते। 

जीवन भर परमारथ करते। 
दुख पीड़ा जो सबके हरते। 
उसका नाव कभी ना हारे। 
ईश्वर खुद हीं पार उतारे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

बाल गीत

बाल गीत 

साँप 

साँप चले जब सर-सर सर-सर। 
पाना उड़थे फर-फर फर-फर। 
फिस-फिस फिस-फिस चीभ निकाले। 
मुसुवा मेढ़क झट कुन खाले। 

भारी भरकम अजगर होथे। 
सुस्त पड़े ओ दिन भर सोथे। 
भूख लगे हौले से हीले।
मनखे तक ला सइघो लीले।  

रहे असढिया भारी लम्बा। 
जइसे डंगनी बिजली खम्बा। 
सर-सर सर-सर दौड़ लगावय। 
खेत खार के मुसुवा खावय।

नाग साँप जहरीला भारी। 
रूप रंग हे भुरुवा कारी। 
जीव जंतु ला डस के मारे। 
मनखे तक येखर ले हारे। 

साँप करायत बड़ा सलोना। 
घर मा खुसरे ओना कोना।
भिथिया चढ़े लगावय बानी। 
येखर डसे न माँगय पानी। 

रहे ढोडिया पानी वाला। 
बिना जहर के भोला भाला। 
टिंग-टिंग कूदत जान बचावय। 
मछरी मेढ़क ला ओ खावय। 

एक रहे मुड़हेरी भाई। 
महतारी के दूध उड़ाई। 
हुदरे ले गुर्री बन जाथे। 
चुपके-चुपके घर मा आथे। 

पिटपीटी सँग लइका खेलय। 
पूछी धर के दुरिहा झेलय। 
बरसा के ये दिन मा आथे। 
गुच्छा गुच्छा ये दिख जाथे। 

रंग-रंग के साँप हजारों। 
जान बचावव दुरिहा टारो। 
कोन जानथे का कर देही। 
कोन साँप हर जी ला लेही। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

बाल गीत

बाल गीत। 

बोली 

भों-भों कुत्ता भौंक रहा है। 
अपनी ताकत झोंक रहा है। 
क्या कहता कुछ समझ न आए। 
सायद कुछ वो दूर भगाए। 

माँ-माँ गइया की है बोली। 
दूध दही से भर दे झोली। 
बच्चे को वो देख रँभाती। 
दूध पिलाने घर में आती। 

म्याऊँ-म्याऊँ बिल्ली मौसी। 
बन करके ओ रहे पड़ौसी। 
दबे पाँव ओ घर में आती। 
दूध दही सब चट कर जाती। 

काँव-काँव कर सोर मचाए। 
सुबह सवेरे छत पे आए। 
कौवे को कोई ना भाये। 
लूट-लूट रोटी ओ खाये। 

पिंजरे अंदर बैठा तोता। 
चुपके-चुपके निशदिन रोता। 
पंख कटे चलता है हौले।
इंसानों की बोली बोले।  

कुकरुस कूँ मुर्गा है बोले। 
हुई सुबह अब तो मुँह धोले। 
चिड़िया चिंव-चिंव गीत सुनाती। 
आँगन में आ हमे जगाती।।

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

बाल गीत

बाल गीत

चिड़िया रानी 

नन्ही मुन्नी चिड़िया रानी। 
छोटी है पर लगे सयानी। 
फुदक फुदक कर खेल रही है। 
हँसी खुसी सब झेल रही है। 

कभी उड़े छप्पर में जाती। 
उड़कर आँगन में फिर आती। 
कभी डाल पर झूला झूले। 
दाना चुगने को ना भूले। 

चुगती चाँवल गेहूँ रोटी। 
प्यारी प्यारी बिलकुल छोटी। 
आँगन से परछी में आती। 
थाली से वो भात उड़ाती। 

दर्पण से ओ चोंच लड़ाती। 
ठुक-ठुक ठुक-ठुक लड़ती जाती। 
दर्पण को ओ क्यों ना भाती। 
क्या दर्पण से वो घबराती। 

प्यारी प्यारी चिड़िया रानी। 
करती है अपनी मन मानी। 
सुबह सवेरे घर में आती। 
चिंव-चिंव करके हमे जगाती। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 
बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम 
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212  212 212  212  

बिन बिहाये ले जिनगी बे रस हो जथे। 
जे बिहाये त जिनगी ह फस हो जथे।

शेर जइसे दहाड़त फिरे आदमी। 
होय सादी तहाँ गाय कस हो जथे। 

रोज दुतकार खावत रथे रात दिन। 
जस कुकुर होय धोबी के तस हो जथे। 

लानबे जब बिहा के ता लूना रथे। 
चार दिन मा ही ओ हा तो बस हो जथे। 

चार झन के ये परिवार अबतक रहे। 
बाढ़ के कुछ हि दिन मा जी दस हो जथे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल

2122  2122 2122  212 

बात मतलब के कहत हँव पर समझ नइ पाय हे। 
झूठ के बेसन सनाये अंग भर लपटाय हे।  

जिंदगी भर कर गुलामी मुँड़ नवाये बीत गे। 
छोड़ देवत हे कुकुर बर तेन ला ओ खाय हे। 

मार खावत रात दिन मुँह ले तको उफ नइ करे। 
तेन ला मालिक बना करना गुलामी भाय हे। 

शेर जइसन गर्जना हाथी असन हे देह जी। 
पर बिचारा मुड़ नवाये बन रहत ओ गाय हे। 

लागथे गांधी बबा के तीन बन्दर आ फँसे।
सुन सके ना कह सके देखत तको घबराय हे। 

छोड़ दे अब तो गुलामी गाँव घर सब तोर जी।  
जाग जा पढ़ लिख बने तोला बताये आय हे। 

घोर अँधियारी मिटाये तोर जीवन ले सखा। 
देख बिहना ले सुरुज हर धूप सुग्घर लाय हे।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Thursday, 30 July 2020

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 
 बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम 
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212  212 212  212 

गाँव के खार मा एक अधवार हे। 
देवता जे बसे तेन रखवार हे। 

झन उलझबे कका राह रेंगत कभू। 
हर गली मा मिले एक मतवार हे। 

वो कहाँ आय पाथे समे मा सखी।
वो जिहाँ जाय तिहँचे तो लगवार हे।  

हाथ धोके पड़े मोर पाछू हवय।
तँय डरा झन मोरो तीर तलवार हे।

का डराथच तहूँ आय तूफान ला।
राम के नाम जब तोर पतवार हे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम 
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212  212 212  212 

भोकवा कस रथे बात मानय नही। 
सच गलत काय होथे ओ जानय नही।  

देखथे रोज सपना बड़े होय के। 
काम खातिर कभू खाक छानय नही।  

खात रहिथे कलेवा कलेचुप सखी। 
मोर खातिर कभू वो तो लानय नही। 

वो भला हे भला चाहथे लोग बर। 
काखरो बर वो गड्ढा ग खानय नही। 

दूर रहिथे नशा पान ले ओ सदा।
धर बुराई अपन घर मा नानय नही। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा  

बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम 
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212   212 212   212 

देख तो राह में कोन आवत हवय। 
जे दुपट्टा म मुखड़ा छुपावत हवय। 

छोड़ सुध बुध ल गोपी चले जात हे। 
कोन मधुबन म मुरली बजावत हवय। 

तोर खाँसी ल तो सिर्फ खाँसी कहे। 
मोर खाँसी करोना कहावत हवय। 

काल के बात ला आज तक हे धरे। 
देख कइसे के वो मुँह फुलावत हवय। 

जेन रोटी तको ला चबा नइ सकय। 
तेन कुकरी ल कइसे चबावत हवय।

भाग गे छोड़ के ओ शहर देख ले। 
जब सुने की सिपाही बलावत हवय। 

ताज देखे हजारों लगे भीड़ हे। 
पर ददा के न मरघट ल भावत हवय। 

छेद बादर म होगे हवय लागथे। 
धार मूसल सही ओ गिरावत हवय। 

पान खाके न तँय थूक देबे सखा। 
फैल जाही करोना बतावत हवय। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Tuesday, 28 July 2020

रोला

रोला- दिलीप कुमार वर्मा 

शुरुआत 

जो करते शुरुआत, सफलता वो पाते हैं। 
ज्यादा करे विचार, उलझ कर रह जाते हैं।  
मंजिल की यदि चाह, राह पग तुरत बढ़ाओ। 
बाधाओं को सोंच, ब्यर्थ मत शंका लाओ।  

कुछ ऐसे भी काम, आज तक ना हो पाया। 
सायद मन संदेह, सोंच की काली साया। 
सोंचो अच्छी बात, मगर उलझन को खोलो। 
हो अच्छा शुरुआत, शब्द कुछ शुभ शुभ बोलो। 

मन की सारी बात, रखो मत सदा दबा कर। 
बन जाएंगे शूल, आज ही कह दो जा कर। 
हो सकता शुरुआत, सुनहरे दिन की कल से। 
रख मीठी मुस्कान, कहो मत कुछ भी छल से। 

एक एक पग जोड़, ऊँचाई पा जाते हैं। 
करते जो शुरुआत, चाँद को भी पाते हैं। 
गिरते वो मैदान, सवारी जो करते हैं। 
खाक गिरे ओ लोग, चले से जो डरते हैं। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

घनाक्षरी

जीवन विकास पूरा, सब ला बताये बर, 
मछरी के रूप धर, भगवान आय हे। 

पानी ले धरा म आये, कछुवा के रूप धरे, 
धर के बराह रूप, पसुता बताय हे।

नरसिंह रूप धर, आधा पसुता म रहे,
वामन के रूप धरि, मानव कहाय हे। 

करे हे विकास जब, परसु के रूप धरि, 
राम रूप पूरा कृष्ण, जीवन सिखाय हे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 

बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Friday, 24 July 2020

गजल

गजल   
बहरे हज्ज़  मुसम्मन सालिम
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1222 1222 1222 1222

अमर होगे हवय कतकोन सेवा देश के कर के।  
लिखाये नाम सोना मा गये जब देश बर मर के।  

पहिर के खाल गीदड़ शेर के दादा बने रहिथे।
दबे रहिथे सबो नइ खोल पावय मूँह ला डर के।  

न भालू हे न बन्दर हे मदद बर राम करही का
तभे तो आजकल रावण सिया ला ले जथे हर के। 

सड़क मा होय दुर्घटना मदद कोनो कहाँ करथें। 
बचे कानूनी पचड़ा ले सबो मनखे उहाँ  टरके। 

लगाके पेंड़ बिहना कन खिंचा फोटो दिखावत हे।  सँझाती साफ कर देथे तहाँ ले गाय हा चर के। 

रचनाकार- दिलीप कुमर वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़




गजल

गजल 
बहरे मुतदारीम मुसम्मन सालिम 
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212 212 212 212  

रोज के पेट बर कुछ कमावत रहव।
जब तलक नइ मिले दाम जावत रहव। 

प्रेम के गीत मा का रखे गा हवय। 
वीरता के तको कुछ सुनावत रहव। 

ओ भगत सिंग आजाद के शौर्य ला। 
छंद मा लिख धरे ताल गावत रहव। 

झन अटकहू खड़ी लील रोटी सगा।   
देख लुगदी बनत ले चबावत रहव। 

काम आही बुढापा म सच मान ले 
रोज थोरिक अपन बर बचावत रहव।   

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Thursday, 23 July 2020

गजल

गजल 

बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम 
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212 212 212 212  

बन मँदारी नचावत रथे रात दिन। 
घोर कातिल बचावत रथे रात दिन। 

हे सुरक्षा म तैनात पलटन इहाँ।
पेंड़ लाखों खचावत रथे रात दिन।   

कइसे खुसरे हे आतंकवादी बता।
हर जगा जब जचावत रथे रात दिन। 

सब कुकुर बाँध के जेल मा ठूँस दव।
शोर भारी मचावत रथे रात दिन।

जे हदरहा रथे नइ मरय लाज जी।
जाने कइसे पचावत रथे रात दिन। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Wednesday, 22 July 2020

गजल

 गजल 

बहरे हज्ज़ मुसम्मन सालिम 
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1222 1222 1222 1222 

बता के भोकवा मोला, अपन हर घर चलावत हे। 
अरे कहिके सदा मोला अपन ओ तिर बलावत हे 

ददा के बात नइ मानय न दाई के सुनय काँही।
गले नइ दार हा तबले अपन मर्जी गलावत हे।

दलाली खोखला कर दिस हमर ये देश ला भाई।
सड़क माटी पटाये छत बिना छड़ के ढलावत हे। 

सबो झन जानथे फाँसी चढ़ाना बस हवय बाँकी। 
बने कानून अइसे हे समे बस हा टलावत हे।

दिखावत हे सबो सपना पलटही भाग जनता के।
बने सरकार ककरो भी सदा जनता छलावत हे। 

कलम के जोर मा बदलाव लाने बर लिखे पोथी।
पढ़य नइ आजकल कोनो समझ रद्दी जलावत हे 

धरे पिस्तोल अपराधी बिना डर के घुसे घर मा।
लुटइया लूट के लेगे पुलिस डण्डा हलावत हे। 

रचनाकार- दिलोप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Tuesday, 21 July 2020

गजल

 गजल 
बहरे हज्ज़ मुसम्मन सालिम 
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1222 1222 1222 1222 

मटक के चल दइस ओहा, बता मँय का करँव संगी।
छटक के चल दइस ओहा, बता मँय का करँव संगी।

सुने हँव प्रेम के बंधन बड़ा मजबूत होवत हे। 
झटक के चल दइस ओहा, बता मँय का करँव संगी।

लगे करफ्यू बसो हे बंद गाड़ी तक दिखत नइ हे। 
लटक के चल दइस ओहा, बता मँय का करँव संगी।

मया मा ताज बनवा के दिये जे मँय रहँव वोला। 
पटक के चल दइस ओहा, बता मँय का करँव संगी।

बने ओ शेरनी जइसे समझ के मेमना मोला।
हटक के चल दइस ओहा, बता मँय का करँव संगी।

दुसर के बात मा आके समझ नइ पाय सच का हे। 
भटक के चल दइस ओहा, बता मँय का करँव संगी।

चटक पानी असन मँय केश मा राहत रहे हँव जी।
फटक के चल दइस ओहा, बता मँय का करँव संगी। 

रचनाकार- दिलोप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़



 

दोहा

दोहा- दिलीप कुमार वर्मा 

सब हैं 'मैं' के बस यहाँ, 'हम' को मारे लात। 
'हम' है अपने साथ तो, 'मैं'की क्या अवकात।1। 

सदा अकेला 'मैं' रहा, रख मन में अभिमान। 
'हम' को ढूंढे अंत मे, भनक पड़े ना कान।2।

'हम' से की सुरुवात थी, बना रहा पहिचान। 
सफल हुआ 'मैं' आ गया, मन मे भर अभिमान।3 

मिले सफलता कब तलक, जो 'हम' से है दूर।
आये शरणागत सदा, 'मैं'होकर मजबूर।4।

दूर न 'हम' से जाइए, भले बड़ा हो नाम। 
'मय'का प्याला छोड़ दो, बन जाये सब काम।5।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

Sunday, 19 July 2020

गजल

गजल 

बहरे हज्ज़ मुसम्मन सालिम 
मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन

1222 1222 1222 1222  

बनाये हे बने कानून पर सब छूट जावत हे। 
बने कानून के रखवार मन जब घूँस खावत हे।  

धरे रहिबे लुका कतकोन गठरी बाँध तँय पइसा।  
कुकुर मन सूँघ के आवय तहाँ सब ला नँगावत हे

सबो हर बंद हे जब ले करोना आय बीमारी।
तभो गुरुजन उठा बीड़ा मुबाइल मा पढ़ावत हे।

कभू झन आँकबे कम पेट हाथी कस रखे नेता। 
रहे चारा सड़क पुलिया सबो ला खा पचावत हे। 

रहय जेखर करा पइसा रखे वो जेब मा कानून।
करे कतकोन घोटाला कहाँ वो हर धँधावत हे। 

ददा कंजूस बन पइसा सकेले हे बहुत भारी। 
उदाली मार लइका हर सबो धन ला उड़ावत हे। 

विदेसी मेम लाने हे बिहा करके हमर टूरा।  
बिहिनिया साँझ रतिहा रोज के नखरा उठावत हे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

पद पादाकुलक छंद

पद पादाकुलक छंद 

गजब कुँवारी कन्या लागे।  
लगे अपसरा धरती आगे।
देखत मन सब के हरसागे।
मिल जाये तो किसमत जागे।  

रूप लावणी सुग्घर साजे।  
बेनी गजरा सुग्घर राजे।
सब के अंतस घण्टी बाजे। 
यौवन आये ताजे ताजे।   

सबझन पाछू पाछू जावँय। 
एक्को झन पर नइ बतियावँय। 
सब के अंतस हा अकुलावँय। 
बात करे बर सब डर्रावँय। 

सबो खयाली रोटी पोवँय।
सोंच समे बस समझन खोवँय।
सदा टुरी बाहिर के होवय।
गाँव बसेरू मुड़ धर रोवय।

दुसर गाँव के टूरा आगे। 
देख टुरी के मन हरसागे। 
दोनो के किस्मत हर जागे। 
तहाँ उढ़रिया दुनो भगागे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़




बाल गीत

बाल गीत 

उठा उठा के पटक रहा है। 
जो भी मिलता गटक रहा है। 
थोड़ा भी ना अटक रहा है। 
पेटू हाथी भटक रहा है। 

उत्तर से दक्षिण को जाता। 
पूरब से पश्चिम में आता। 
रौंद रौंद कर रार मचाता। 
खाने की चीजें सब खाता। 

भारी भरकम हाथी राजा। 
बजा रहा है सब का बाजा।  
पत्ते देखे ताजा ताजा। 
बना रहा है सबको खाजा। 

पाँव तले में जो आता है। 
चटपट तुरते हो जाता है। 
केवल पत्ते ही खाता है। 
माँसाहार नही भाता है। 

रह रह कर ओ सूड़ उठाता। 
पानी तन पर ओ दे जाता। 
सूपा जैसे कान हिलाता। 
मक्खी मच्छड़ दूर भगाता। 

भले शेर जंगल का राजा। 
पर उसका भी बजता बाजा। 
हाथी बोले आजा आजा। 
शेर बिचारा बोले जाजा। 

बच्चों का बेचारा हाथी।
सबसे प्यारा प्यारा हाथी। 
सचमुच राज दुलारा हाथी। 
जग में सबसे न्यारा हाथी।  

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल

मार कर जिंदा किया तस्वीर में। 
डाल कर जिसने जहर दी खीर में। 

वो लड़े हमसे हमे हथियार दे। 
धार ना था जो दिए शमशीर में। 

खा गया सबकुछ बचा टुकड़ा नही।
लोग कहते खीर मिलता धीर में। 

उड़ रहा बादल जमी पर गिर पड़ा। 
भोगना पड़ता लिखा तकदीर में।  

मौत से पहले ढको तन को सही।
क्या रखा है आज दो गज चीर में। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

Friday, 17 July 2020

सुखी सवैया

सुखी सवैया 

करिया बिलवा जब आवत हे घबरावत सूरज मूँह छुपावय।
जब शेर सहीं ग दहाड़ करे धरती बपुरी तक हा घबरावय।  
धधकावत हे कड़कावत हे इठलावत ओ बिजुरी चमकावय। 
मन भावन रूप दिखा कर के हरसावत ओ बरसा बरसावय। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छतीसगढ़

Thursday, 16 July 2020

गजल

गजल 

 बहरे हज्ज़ मुसम्मन सालिम 
मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन

1222 1222 1222 1222 

यहा होरी चुनर कोरी बता तँय काय कर लेबे। 
लुकाये घर म हे गोरी बता तँय काय कर लेबे। 

पढाये तोर ओ लइका रहे हुसियार जे भारी। 
बने हैकर करे चोरी, बता तँय काय कर लेबे। 

सबो ला ज्ञान बाँटत हे जिये के हौसला खातिर।
लटक गे खुद बँधे डोरी, बता तँय काय कर लेबे। 

बनाये जेन तँय नेता दगा तोला ग देवत हे 
उड़ाये माल सब तोरी बता तँय काय कर लेबे। 

पधारे साँप हे घर मा मचावत रार हे भारी।
खुसर गे जे हवय मोरी बता तँय काय कर लेबे। 

अबड़ रोवत हवय लइका सुते नइ रात हे आधा। 
सुते नइ सुन के ओ लोरी बता तँय काय कर लेबे 

दवाई दे हवय डॉक्टर जरूरी जान के तोला। 
शुगर आगे दवा घोरी बता तँय काय कर लेबे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल  

बहरे हज्ज़ मुसम्मन सालिम 
मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलूनर

1222 1222 1222 1222 

पढ़े ला जब कबे दिन रात लइका बोर हो जाथे
दिखाथे बस पढ़त जइसे निचट फिर ढोर हो जाथे 

करे नइ काम जाँगर चोर कतको झन रथे ठलहा। 
उदाली मार सिरवाथे तहाँ ले चोर हो जाथे।  

अलाली जे किसानी मा करे परथे तहाँ परिया।  
करे बिन काम खेती खार हर कमजोर हो जाथे। 

दिखे बस पलहरा जइसे धुँआ जब छाय ऊपर मा
मिले चारों डहर ले झूम के घनघोर हो जाथे। 

रहे कतको अँधेरी रात झन घबरा कभू भाई।
पहाती रात के सुकुवा दिखे फिर भोर हो जाथे। 

मया अँधरा बना देथे समझ आवय नही काँही।
मिलन के धुन रथे तब साँप तक हर डोर हो जाथे

रहे अच्छा बुरा सन्देस फइले आग के जइसे।
लुकाये नइ सकय कोनो शहर भर शोर हो जाथे।  

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल  

बहरे हज्ज़ मुसम्मन सालिम 
मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन

1222 1222 1222 1222    

लगे सावन महीना मा घुमड़ के छाय हे बादर। 
बरस बीते बहुत के बाद अइसन आय हे बादर। 

कभू आके दिखा ठेंगा मिले बिन ओ मटक देथे। 
समे ओखरा हवय जाने, बहुत इतराय हे बादर।  

बड़ा नटखट हवय उदबित बरज कतको कहाँ माने।
गरज के जोर से हमला बहुत डरव्हाय हे बादर।

सुरुज ला ढाँक राहत देत हे आसाढ़ के लगती।
समे पहिली लगे एसो बने भदराय हे बादर। 

उठत हे जोर से लगथे प्रलय ये लान तक देही।
जवानी मा बने घपटे गजब करियाय हे बादर। 

करामत कर दिखाये हे रहे परिया परे धरती।
किसानी देख एसो के बहुत मुसकाय हे बादर। 

जवानी जोश जब मारे करय तांडव सहीं नाचा।
बड़ा भारी अपन ओ रूप तक दिखलाय हे बादर। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल  

बहरे हज्ज़ मुसम्मन सालिम 
मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन
1222 1222 1222 1222 

सदा जे खाय हे पिज़्ज़ा कहे ये भात का होथे
रहे जे बंद कुरिया मा कहे बरसात का होथे

कभू सुनसान जंगल मा भटकबे रात के बेरा
समझ आही तभे भाई भयानक रात का होथे

कमाये तोर पूंजी ला कहूँ भाई हड़प लेही
समझ मा आ जही संगी करेजा घात का होथे

बहुत बरजे न मानय जेन लइका हर रहे उदबित
जरे जब हाथ हा चट ले समझथे तात का होथे।

बिना मैदान मा आये विजेता जेन बन बइठे
लपेटा में कभू आथे समझथे मात का होथे

भरे अभिमान मा राजा सतावय रोज जनता ला
हरा दे जेन दिन जनता त जानय लात का होथे

बताये बात ला सुन के बहुत झगरा मता देथे
समझ ओ बाद मा आथे,सहीं मा बात का होथे।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

  गजल 

बहरे हज्ज़ मुसम्मन सालिम 
मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन 

1222 1222 1222 1222 

जिहाँ देखव तिहाँ हरियाय धरती आज सावन मा। 
किसानी हर तको भदराय होवत काज सावन मा।  

चमक चम चम चमकथे रोज बिजुरी सँग घटा आके।
दिखाके चाल मारत हे, गिरा के गाज सावन मा।

घटा घनघोर छाये हे जवानी मोर मा आये।
उठा के पाँख नाचत हे, तनिक नइ लाज सावन मा।

बहुत तनहा गुजरथे रात जागत रहि जथौं साथी।
बुलाले तँय कभू दे के तनिक आवाज सावन मा। 

कभू सर्दी कभू खासी उदासी हे कभू भारी।
सबो ले स्वस्थ हो जाथन, पता का राज सावन मा।  

भले सावन महीना हर रथे पावन महीना जी।
मगर जे हे मछरगिद्धा न आवय बाज सावन मा। 

चढाले जल उठा काँवर अगर भोले मनाना हे। 
लगे हे रेम मंदिर मा भगत के आज सावन मा। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल  

बहरे हज्ज़ मुसम्मन सालिम 
मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन
1222 1222 1222 1222  

करे बर काम चल जाबो, कहे ला मान सँगवारी। 
बने तँय रोज बेहड़वा, गली झन छान सँगवारी। 

नदी ला मोड़ सकथच अउ पहाड़ी टोर तक डरबे।
भुजा मा तोर ताकत हे, बने पहिचान सँगवारी। 

करे बैरी अगर धावा समझ ले आँच झन आवय।
बचाना देश ला हावय, लुटा के जान सँगवारी। 

गरज के शोर तक करथे, चमक बिजुरी डरा देथे।
बरसथे झूम के बादर, त छतरी तान सँगवारी। 

लगे सावन महीना मा फुटू के आस बड़ हावय। 
मिले जे खेत मा पिहरी धरे तँय लान सँगवारी। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Saturday, 11 July 2020

गजल

गजल  

बहरे हजज़ मुसम्मन सालिम 
मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन

1222 1222 1222 1222  

मया माटी ले करले तँय, मरे मा काम ये आही। 
दबे जब देह माटी मा, सरे मा काम ये आही।  

रखव लाठी बड़े घर मा, बने मजबूत तक होवय। 
घुसे जब चोर घर भीतर, छरे मा काम ये आही। 

पपीता आम नीबू जाम केरा अउ लगा छीता। 
अपन बारी लगा राखव, फरे मा काम ये आही।  

अभी बारिश चलत हावय, रखव सब तेल माटी के। 
रथे लकड़ी सबो गीला, बरे मा काम ये आही। 

बना बांधा कुँआ तरिया,नदी तक बांध के राखव। 
गिरे बरसात के पानी, भरे मा काम ये आही। 

कहूँ जाना हवय रतिहा, रखव हनुमान चालीसा। 
सुने आवाज घुघवा के, डरे मा काम ये आही। 

सबो घर मा रखाये हे , खरीदे जेन बोरो प्लस। 
कहाँ हावय रखव सुरता, जरे मा काम ये आही। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़