Monday, 12 April 2021

गजल

गजल
221 2122 221 2122
गुरुदेव के जनम दिन,चल आज सब मनाबो।
उँखरे सिखाय गाना,स्वागत उँखर म गाबो।

दुनिया हरे मरुस्थल,प्यास हवन हमू जी।
मिलगे कुँआ हमू ला,चल प्यास हम बुझाबो।

भटके हवन डगर ले,रसता सुझाय हावय।
गुरुदेव के कृपा ले,सब छंद सीख जाबो।

गुरुदेव के असन जी,मिलथे कहाँ जहाँ मा।
निःस्वार्थ भाव ले जे,बाँटे हमू ह पाबो।

अपने पिता दलित के,बाना हवय उठाये।
गुरुदेव के उदिम ला,सब सीख हम उठाबो।

सीखे हवन हमू जे,गुरुदेव के कृपा ले।
साधक नवा जे आही, उन ला हमू सिखाबो।

अहसान मानथन हम,गुरुदेव जे बनाये।
बइगा दिलीप जइसे,सब ला चला बनाबो।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

सखी छंद


नोनी के महतारी सुन।
नोनी खातिर कुछ तो गुन।
रसता ओखर बढ़िया चुन।
पढा लिखा के जिनगी बुन।

इसकुल ये सरकारी हे।
पढ़े इहें सब नारी हे।
फिर का के लाचारी हे।
अब नोनी के बारी हे।

सबके भाग जगावत हे।
लिखे पढ़े सिखलावत हे।
ज्ञान सबोझन पावत हे।
नान नान सब आवत हे।

अब तो तँय देरी झन कर।
तइयारी करले सुग्घर।
नाम लिखा थोरिक झन डर।
नाम कमाही ओ जब्बर।

पुस्तक कपड़ा ओ पाही।
खाना तक इहँचे खाही।
बिहना ले इसकुल आही।
संझा बेरा घर जाही।

सखी सहेली मिल जाही।
खेले कूदे बर पाही।
भाग अपन ओ सहराही।
तोरे गुन ला ओ गाही।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

सार छंद

इसकी उसकी सब की सुन ली,अब अपनी है बारी। खाली कुर्सी पड़ी हुई है,जिनकी है लाचारी।

चार पाँव रखते हैं लेकिन,खुद से चल ना पाये।
उसको भी लेजाने वाला,सुबह सुबह ही आये।

तबतक धीरज धरके कुर्सी,सुनते सबकी बानी।
जिसको समझ न आया सारे,चले गए घर जानी।

अपनी भाषा क्या समझेंगे,जो देते हैं ताली।
शांत चित्त से जो सुख पाते,ओ हैं कुर्सी खाली।

हा-हा हा-हा हँसने वाले,भला मरम क्या जाने।
कविता में क्या है गहराई,कैसे ओ पहचाने।

सार छंद में सार बात को,सहीं सहीं कहते हैं।
जो सकझेंगे अपनी बानी,वही यहाँ रहते हैं।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

चौपई छंद

माटी के कहना ला मान।
काय कहत हे सुनव सुजान।
देवय बोरा बोरा धान।
पर पहिली करलव पहिचान।

माटी हे ता धरती जान।
पथरा के का हे पहिचान।
करलव एखर सब सम्मान।
कर देथे ये पूरा दान।

जादा खातू झन तँय डार।
माटी हो जाथे बेकार।
जैविक हा करथे उपचार।
गोबर खातू ला तँय डार।

करिया माटी सोना ताय।
रंग रंग के फसल उगाय।
अरहर कपसा धान उगाव।
भारी उत्पादन ला पाव।

भुरुवा माटी सब ला भाय।
घर ईंटा खपरा बन जाय।
मूरत बर्तन बने बनाव।
घर कुरिया छाबे बर लाव।

माटी महिमा अपरम पार।
माटी मिलथे घर बन खार।
माटी ले हावय संसार।
माटी जीवन के आधार।

माटी के ये तन ला जान।
माटी मुर्दा एक समान।
जीयत भर के हे अभिमान।
माटी देवय मरे तहाँन।

पथरा बनना हे बेकार।
छीनी मा बड़ देवय मार।
माटी असन नरम हे सार।
गूँथ गूँथ सब देवय प्यार।

माटी ला तन लेप लगाय।
पोत पोत चिक्कन तन पाय।
बीमारी ला दूर भगाय।
तन शीतल पा मजा उड़ाय ।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
27-8-2019

रोला छंद

ओ अंगद का पैर, कहीं सचमुच उठ जाता।
क्या सीता को छोंड़ ,राम घर वापस आता।
बाली का था पुत्र,राम ने जिसको मारा।
अंगद को था भान,राम ने उसको तारा।

प्रभु का मिला प्रताप,रहा अंगद हरसाया।
जाके ओ दरबार,तभी तो पाँव जमाया।
बोला शीना तान,सभा में पाँव उठाओ।
कोई हो बलवान,पास मेरे तो आओ।

उठा सके जो पैर,सिया को तुम पाओगे।
वरना होगी हार,सिया को लौटाओगे।
कसम राम की आज,यहाँ अंगद है खाया।
ले के जय श्री राम,सभा में पाँव जमाया।

डिगा सके ना पाँव,रहे जे योद्धा भारी।
मेघनाथ बलवान,आय सब बारी बारी।
प्रभु पे था विश्वास,राम है बल के दाता।
ओ अंगद का पैर, भला कैसे उठ जाता।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

चौपाई

चौपाई दोहा- छेड़छाड़ करना नही,पहले सुनलो बात। पछतावोगे रात दिन,कहीं करे आघात। मुझे मार कर मरजाओगे। या बोलो तुम घर जाओगे। देख सभी को डर जाओगे। घूटन से तुम सड़ जाओगे। मन के अंदर चोर रहेगा। अंतर मन में शोर रहेगा। हरपल तुझको बात कहेगा। कैसे अंतस भला सहेगा। अपराधी ही कहलाओगे। तुम जिस ओर कभी जाओगे। करनी करके पछताओगे। सोंच भला तुम क्या पाओगे। पाप कभी ना छुप पाता है। इक दिन घाव उभर आता है। उसदिन थू थू लोग करेंगे। घरवाले बेमौत मरेंगे। काल कोठरी में जाओगे। बोलो कुछ क्या तुम पाओगे। या फाँसी का हार मिलेगा। ये जीवन बेजार मिलेगा। गलती से गलती मत करना। मुश्किल होता सदा उबरना। गाँठ बांध बातों को धरना। वरना पड़जायेगा मरना। मुझको अपने घर जाने दो। जीवन में कुछ कर जाने दो। नही किसी को हाल कहूँगी। जैसे सब दिन रही रहूँगी। दिलीप कुमार वर्मा बलौदाबाजार

शक्ति छंद

122 122 122 12
शहर के चकाचौंध ले दूर हे।
जिहाँ जिंदगी जान भरपूर हे।
कहे गाँव ओला सगा मान ले।
हँसी हे खुशी हे उहाँ जान ले।

ददा हे बबा हे कका हे इहाँ।
रहे डोकरी एक दाई जिहाँ।
रहे संग भइया ग भौजी रहे।
करे काम काकी कका जे कहे।

हँसी अउ ठिठोली म लेले मजा।
बबा जे कहे मान झन तँय सजा।
इही रंग हावय इहाँ गाँव के।
मजा पाय परिवार के छाँव के।

सगा देख तरिया म पानी भरे।
इही मेल खातिर ग जरिया हरे।
नहाये इहाँ तो सबो आय जी।
बुता काम के बात बतलाय जी।

जिहाँ लीम आमा पीपर छाँव हे।
रहे बर ग गस्ती उही गाँव हे।
ददरिया सुनावत रहे खार मा।
रँभावय ग गरुवा ह कोठार मा।

दही दूध के जान गंगा बहे।
उहें देवता मन ह आके रहे।
तभे गाँव ला गाँव कहिथे सगा।
अपन भाग आके इहाँ तँय जगा।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

घनाक्षरी

ददा ह रिसाय हावे,मुँह ला फुलाय हावे,
दाई तक बोले नही,बड़ा जंजाल हे।
बाई घर आये हावे,झगरा मताये हावे,
बिहा करना ह भाई,होगे जी के काल हे।
बाई कोती बोलबे त,दाई ह रिसाय जाथे,
दाई कोती बोलबे त,बाई लाल लाल हे।
घर के न घाट के हौं, मैं तो पुक लात के हौं
धोबी के कुकुर जस,मोर होय हाल हे।

गरज गरज जब,बदरा बरस जाथे,
तरस तरस जीव,तक हरसाय जी।
मगन मगन मन,छमक छमक छम,
थिरक थिरक कर,नाच के दिखाय जी।
डगर डगर हर,महक महक उठे,
चहक चहक कर,तन बतियाय जी।
खेत खार झूमे लागे,पग पग चूमे लागे,
हवा बउराय चले,खुशी जग छाय जी।

बेटी न बताय हावे,कहाँ ओ भगाये हावे,
जिया घबराय हावे,ददा परेसान हे।
दाई ह बिलख रोवे, दिन रात ओ न सोवे,
हाय हाय करे दाई,बेटी म परान हे ।
काय ये जमाना आये,जेला देख ते भगाये,
मान मरियादा के जी,कहाँ ओला भान हे ।
जात पात ओ न देखे,भला बुरा ना सरेखे,
काम ये कराये बैरी,मया बेईमान हे।

घर सुना सुना लागे,जब ले बेटी भगा गे,
दाई रात रात जागे, जाने कब आय जी।
खेल ओ खिलौना रोवै, कुरिया ह मान खोवै,
खटिया उतान सोवै, कोनो नइ भाय जी।
बात कछु ओ न कहे,संग संग जिन रहे,
सबो हे उदास आज,मुँह ला फुलाय जी।
माना बेटी सगा होथे,बिदा बेरा सबो रोथे,
पर जे भगाय बेटी,सबो खिसियाय जी।

महर-महर घर,अँगना महक उठे,
कहर-कहर खेत,खार ममहाय जी।
कुहुक-कुहुक जब,कोयली कुहुक पारे
तब जान लेवा मौर, अमुवा म छाय जी।
सरर-सरर सर, हवा ह चलन लागे,
हरर-हरर के गा, दिन हर आय जी।
चरर-चरर चर,चर-चर-चर बाजे,
पतझड़ होय रहे, पाना चर्राय जी।

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

Tuesday, 6 April 2021

जयकारी छंद


रेगिस्तान 

चट-चट जरत रथे जी पाँव। 
खोजे ले नइ पाबे छाँव। 
चारों डहर हवय जी रेत। 
जिहाँ मिलय नइ एक्को खेत। 

इहाँ ऊँट बस दउड़त जाय।
झट कुन मंजिल वो पहुँचाय। 
मनखे रेंगे जान गँवाय। 
पाँव धँसे ले चल नइ पाय।  

मिटे पेंड़ के नाम निशान। 
पानी इहाँ मिलय नइ जान। 
तभो लोग राहत हे मान। 
भेड़ी पालन मा दे ध्यान।

येला कहिथें रेगिस्तान। 
दिखथे जइसे हो शमसान। 
रेती बस हे चारों ओर। 
कतको देख दिखे नइ छोर।  

ये मनखे के करनी ताय। 
पेंड़ काट आफत ला लाय। 
रहिस इहों जंगल घनघोर। 
आज पेंड़ नइ बाँचे कोर। 

अब तो सबझन जावव चेत। 
धरती आज बनय झन रेत। 
लगे पेंड़ ला आज बचाव। 
खाली जगा म पेंड़ लगाव। 
जय गंगान……..

दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

बाल कविता 30

1
हाथी 

हाथी दादा आवत हे। 
जब्बर सूंड हलावत हे। 

रेंगत हावय धमरस धइया। 
दुरिहा सब हो जावव भइया।  

2
हाथी के गाड़ी 

हाथी गाड़ी एक मँगाइस। 
ओमा हथनी ला बइठाइस।  

अपन डरावल बन के बइठे। 
गाड़ी बपुरा रच रिच अइठे। 

घर घिर घर घिर करत चलत हे। 
धुँआ निकालत खूब जलत हे।  

मजा लुटे तक नइ वो पावय।
चारो चक्का फुस हो जावय।  

3
मेला 

मेला घूमे जाsहूँ। 
सरपट दौड़ लगाsहूँ। 
खई खजेना खाsहूँ।  
अब्बड़ धूम मचाsहूँ।  

4
जाँता अउ ढेंकी 

जाँता करथे घर-घर घर-घर। 
ढेंकी भुकुरुस भुकुरुस ताय। 
जाँता पीसय गहूँ चना ला। 
ढेंकी ले तो धान कुटाय। 

5
चाँटी 

खदबिद-खदबिद दउड़त रहिथे। 
जाने काय जरूरी काम। 
दिखे एकता एमा संगी। 
जेखर चाँटी हावय नाम। 

चाँटी चट करथे गुड़ शक्कर।  
तेल तको बर दउड़त आय। 
खई खजेना झामत रहिथे। 
मन्दरस खातिर जान गँवाय।  

6
पेंड़ आम के 

महूँ लगाहूँ पेंड़ आम के। 
सुने हवँव बड़ हवय काम के। 

सेवा करके बड़े बढ़ाहूँ। 
येला संगी अपन बनाहूँ। 

बड़े होय फिर फर लग जाही। 
मिट्ठू तक खाये बर आही। 

जब मन करही मँय चढ़ जाहूँ।  
बइठ मजे से आमा खाहूँ।

7
शेर 

शेर दहाड़त रहिथे अब्बड़। 
बब्बर शेर रहत हे जब्बर। 

शेर देख जम्मो थर्रावँय। 
कोनो आगू मा नइ आवँय। 

का हिरना का भालू हाथी। 
शेर रखय नइ कोनो साथी। 

जेला पावय मार गिरावय।
चीर फाड़ के चट कर जावय। 

8
घुघवा 

रात होय ले घुघवा आवय। 
पकड़-पकड़ मुसुवा ला खावय।  

आके बइठय रात अटारी। 
घूमत राहय बरछा बारी। 

उदुक-उदुक अब्बड़ नरियावय। 
जेन सुने ते हर डर्रावय। 

देख पाय नइ बिहना बेरा। 
खोर्रा मा फिर करे बसेरा। 

9
चिखला 

गाँव गली चिखला भरमार। 
चिखला ले हे खेती खार।  

लइका दउड़त बाहिर जाय।
लथपथ चिखला रहे सनाय।    

सम्हल-सम्हल के पाँव चलाव। 
बिछल जवय झन देख बचाव।

जल्दी बाजी जेखर काम। 
फदफिद फद फिर गिरे धड़ाम।

10
मुसुवा 

कस रे मुसुवा तही बता दे।  
झटकुन कहाँ लुकाथस। 
राँपा कुदरी कहाँ रखे तँय।
कइसे बिला बनाथस। 

कुटुर-कुटुर रतिहा भर बाजय। 
का तँय भला चबाथस। 
कोरा माटी रोज निकाले। 
बता कहाँ ले लाथस। 

तोर बिला हर हे सुरंग कस। 
भूल भुलइया लागे। 
तभे पार कोनो नइ पावय।  
कोन डहर तँय भागे। 

11
चिरई 

चिंव-चिंव चिंव-चिंव करे चिरइया। 
रोज बिहानी आके।  

सुते रहँव मँय रोज जगावय।
मोला गीत सुनाके। 

दिन भर दाना पानी खातिर। 
दूर-दूर उड़ियावय। 

पकड़-पकड़ के किरा मकोरा। 
लइका खातिर लावय। 

संझा बेरा घर मा आवय।  
मोरो मन बहलावय।

चिंव-चिंव चिंव-चिंव करे चिरइया। 
लोरी सुघर सुनावय।

12
मोर बबा के तर्रा मेंछा

मोर बबा के पँर्री मेंछा। 
हावय तर्रा-तर्रा। 
देखत जिवरा हर घबराथे। 
 बबा अबड़ हे खर्रा। 

होत बिहानी भर-भर रोटी। 
दबा-दबा के खाथे। 
देर कहूँ हो जय खाना मा। 
फिर भारी चिल्लाथे। 

धरे गोटानी गली निकल जय। 
देख सबो घबराथें। 
तर्रा मेंछा आगे कहिके। 
झटपट सबो लुकाथें। 

ताव मार मेंछा मा रेंगय। 
भले रहय जी पँर्रा। 
मोर बबा के तर्रा मेंछा। 
हवय बबा कस खर्रा। 

13
करोना 

दाई दाई आज बता तँय। 
होथे काय करोना। 
गाँव गली सब सुन्ना होगे। 
पर गे रोना धोना। 

बंद परे इसकुल सब हावँय। 
बने हवन घर खुसरा। 
संगी साथी के बिन दाई। 
हो गे हन खस भुसरा। 

कइसन येखर रूप बता तँय। 
कोन डहर ले आथे। 
का चाकू हथियार धरे हे। 
जेमा मार गिराथे। 

एक बार मोला मिल जावय। 
तब मँय मजा चखाहूँ। 
कान पकड़ कुटकुट ले छर के। 
ओखर नाँव मिटाहूँ।

14
ददा 

मोर ददा हे सब ले बढ़िया। 
जइसे कहिथौं करथे। 
आनी बानी खेल खिलौना। 
ला के झोली भरथे। 

पीठ चढ़ा के घोड़ा जइसे। 
सरपट दौंड लगाथे। 
किसिम-किसिम के खई खजेना। 
रोज मोर बर लाथे।  

कभू रिसाथौं अबड़ मनाथे। 
रो-रो आँसू झरथे। 
कभू कहूँ गुस्सा हो जाथौं। 
ददा तहाँ बड़ डरथे। 

15
फक्कड़ राम 

बबलू भइया फक्कड़ राम। 
करय नही एक्को जी काम। 

खाये खातिर अघुआ ताय। 
चिक्कन चिक्कन चाँटत खाय। 

अबड़ लपरहा हावय जान। 
पाक जही सुन तोरो कान। 

जेखर जाँगर सरहा होय। 
झूठ बोल अपने मुँह धोय। 

येती वोती के सब बात।
चुगली करत रहे दिन रात। 

घर समाज बर बोझा ताय। 
अइसन मन ले राम बचाय। 

16
सरकस 

भालू ढोल बजावत हे। 
बंदर नाच दिखावत हे। 

हाथी खेलत हे फुटबॉल। 
शेर दहाड़त खुसरे जाल। 

साइकल कुकुर चलावत हे ।
मिट्ठू गीत सुनावत हे।   

नोनी बाबू आवत हे। 
जोकर खूब हँसावत हे। 

17
बादर  

बादर भइया जल्दी आजा। 
पानी के बरसा बरसा जा। 

गरमी अब्बड़ बाढ़े हावय।  
धरती ला पूरा झुलसावय। 

पेंड़ तको ले पाना झर गे।  
जीव तड़फ के कतको मर गे। 

सुक्खा होगे नदिया तरिया। 
सुग्घर धरती होगे परिया। 

रसता तोरे देखत हावन। 
कइसे के हम जान बचावन। 

मर जाबो जे तँय नइ आबे। 
अभी बता कब तँय बरसाबे। 

18
भालू 

होटल पहुँचे भालू भइया। 
नाच दिखावय ताता थइया। 

माँग समोसा गप-गप खावय। 
डोसा भजिया चट कर जावय। 

मीठा देखत मन ललचा गे। 
भालू के मुँह पानी आगे। 

नाचन लागे छम्मक-छम्मक। 
ढोल बजावय ढम्मक-ढम्मक। 

रस्स मलाई बरफी खाहूँ। 
तब्भे दुसर गली मँय जाहूँ।   

अब तो भालू जिद मा आगे। 
सेठ मलाई देवन लागे। 

19
गुरुजी 

गुरुजी बन के हाथी सब ला। 
देवत राहय सीख। 
मिहनत करके खाना चाही। 
कभू न माँगव भीख। 

बंदर कहिथे साँच कहत हव।
भीख माँगना खीक। 
पेट भरे के मजबूरी ता। 
चोरी करना ठीक। 

हाथी फिर फटकारत कहिथे। 
चोरी करना पाप। 
धीरे-धीरे सबो बताहूँ। 
बइठ अभी चुप चाप। 

20
आमा  

आमा देखे मन ललचा गे।  
कइसे येला पावँव।
कोन उदिम करके आमा ला।   
झटपट अभी गिरावँव।

संग बेंदरा करँव मितानी। 
या खुद से चढ़ जावँव।
बइठ कन्हैया जइसे रुख मा। 
आम मजा ले खावँव।

कहूँ बेंदरा सब खा देही। 
फेंक दिही बस गोही।
येखर ले पथरा दे मारँव। 
काम बने सब होही।

21
कलम 

मोर कलम हे जादूगर। 
जइसे येला लेथौं धर। 

चलत रथे ये हा फर-फर।  
जइसे हवा चले सर-सर।  

कोरा कागज झट भर दय। 
काम बड़े ये हर कर दय। 

जब ले येला पाये हँव। 
हरदम अउवल आये हँव।

22
कागज के नाव 

कागज के इक नाव बनाहूँ। 
नदिया मा वोला तउराहूँ। 

बइठ तहाँ घूमे बर जाहूँ। 
दुनिया घूम मजा मँय पाहूँ। 

संग ददा दाई हर जाही। 
मोला सरवन जइसे भाही। 

नाव चले फिर छप्पक-छइया। 
हम सब कहिबो हइया-हइया।

23
मदारी 

गाँव मदारी आय हे। 
डम-डम ढोल बजाय हे।  

नाचत हावय बेंदरा। 
पहिरे चिरहा चेंदरा। 

भालू खेल दिखात हे।  
थोरिक नइ सरमात हे। 

सब के मन हरसात हे
ताली खूब बजात हे

24
कहूँ पाँख मोरो होतिस 

कहूँ पाँख मोरो होतिस ता। 
ऊपर मा उड़ियातेंव। 
बरसा के दिन जइसे आतिस। 
बादर के घर जातेंव। 

बात-बात मा सब बादर ला। 
संगी अपन बनातेंव। 
बादर के सँग घूम घाम के। 
मँय अपनो घर आतेंव। 

जइसे गरमी के दिन आतिस। 
संगी अपन बलातेंव। 
जिहाँ-जिहाँ सूखा रहितिस ता।
बादर उहाँ घुमातेंव।

25
चाँद सुरुज के झगड़ा 

सुरुज कका आगी कस गोला। 
दिनभर आगी दागय। 
चंदा मामा ठंडा-ठंडा। 
देख सुरुज ला भागय। 

धरती दाई बीच पिसागे। 
चाँद सुरुज के झगड़ा। 
एक संग दुन्नो नइ आवँय। 
गजब हवय जी लफड़ा। 

धरती दाई बीच आय ता। 
चंदा देख रिसावय। 
चंदा दूर करे बर चाहय। 
सुरुज कका नइ भावय। 

मोला दुन्नो करा मया हे। 
का मँय हाल बतावँव। 
आरी पारी देखत रहीथौं। 
संग खेल नइ पावँव। 

26
चंदा लाने पहुँचे हाथी

हाथी पाँख लगाये उड़ गे। 
पहुँचे चंदा पास। 
सूंड़ लपेट धरे हे जम के। 
काम बहुत हे खास।

गोल चाँद हथनी ला भावय।  
हाथी जब हो पास।
चंदा के हँसिया कस दिखना। 
नइ आइस हे रास। 

तभे चाँद लाने बर पहुँचे। 
हाथी अपनो संग। 
जंगल मा मंगल हो जाही। 
अजब जमाही रंग। 

27
झुन्ना झूले बेंदरा 

झुन्ना झूलत रहे बेंदरा। 
ठाँगा पुछी लपेट। 
हवा चलिस जब जोरदार तब। 
ले लिस अपन चपेट। 

टूट परिस ठाँगा हकरस ले। 
आय बेंदरा संग। 
धरती मा गिरगे भकरस ले। 
बंदर होय अपंग। 

जादा मस्ती ठीक नही हे। 
इही सँदेसा देत।
उछल कूद भारी पर जाथे। 
अब तो जावव चेत। 

28
मुसुवा राजा 

मेंछा ताने मुसुवा राजा। 
जंग लड़े बर आगे। 
देख बिलइया आगू ठाढ़े। 
पुछी टाँग फिर भागे।  

सोंचे राहय होही कोनो। 
मुसुवा अलवा जलवा। 
उठा-उठा के पटक दुहूँ फिर। 
खाये मिलही हलवा। 

पाछू पर गे रहय बिलइया। 
सरपट दउड़ लगावय। 
बपुरा मुसुवा बिला खुसर के। 
अपनो जान बचावय। 

29
मुसुवा के सपना 

मुसुवा लानिस ढोलकी। 
दे-दे ताल बजाय। 
येती वोती कूद के। 
सब ला नाच दिखाय। 

हीरो बनहूँ सोंच के। 
निशदिन जोर लगाय। 
बजा-बजा के ढोलकी। 
दिन भर नाचत जाय। 

परे चमेटा जोर से। 
गये ढोलकी फूट। 
बंद करे फिर कूदना।  
सपना गय सब टूट।

30
पेंड़ कभू गुस्सा होतिस 

पेंड़ कभू गुस्सा होतिस ता। 
करतिस गजब कमाल। 
पेंड़ कटइया मन ला थपरा 
दे के करतिस लाल। 

रकसा जइसन हाथ लमा के। 
देतिस धर के खींच। 
पटक-पटक के जीव छड़ातिस  
कहितिस मरजा नींच। 

पाँव बढ़ा के टाँग फसातिस। 
देतिस तुरते चीर। 
मोर दरद ला तँय नइ जाने। 
तोर सुनव नइ पीर। 

कभू-कभू गुस्सा होये ले। 
बन जाथे सब काम। 
सिधवा मन ला काट-काट के। 
करथें लोग तमाम। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़