ओ अंगद का पैर, कहीं सचमुच उठ जाता।
क्या सीता को छोंड़ ,राम घर वापस आता।
बाली का था पुत्र,राम ने जिसको मारा।
अंगद को था भान,राम ने उसको तारा।
प्रभु का मिला प्रताप,रहा अंगद हरसाया।
जाके ओ दरबार,तभी तो पाँव जमाया।
बोला शीना तान,सभा में पाँव उठाओ।
कोई हो बलवान,पास मेरे तो आओ।
उठा सके जो पैर,सिया को तुम पाओगे।
वरना होगी हार,सिया को लौटाओगे।
कसम राम की आज,यहाँ अंगद है खाया।
ले के जय श्री राम,सभा में पाँव जमाया।
डिगा सके ना पाँव,रहे जे योद्धा भारी।
मेघनाथ बलवान,आय सब बारी बारी।
प्रभु पे था विश्वास,राम है बल के दाता।
ओ अंगद का पैर, भला कैसे उठ जाता।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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