Friday, 6 May 2022

बासी

 सार छंद-- बासी 

समे मुताबिक नाम धराये , तीन तरह के बासी। 
पहिली बासी दुसरा बोरे, तीसर रहे तियासी। 

रतिहा बेरा भात बचे तब, पानी डार रखाथे। 
उही बिहिनिया के बासी ये, जे हर सब ला भाथे।  

इही हरे ओ असली बासी, जेखर महिमा गाथें। 
मही डार के चटनी सँग मा, जेला दुनिया खाथें।

दोपहरी के भात बचे मा, संझा पानी डारयँ। 
ते हर बोरे बासी बनथे, भुखहा मन ला तारयँ। 

गरमी के दिन बड़का होथे, चार बखत सब खाथें। 
बिहना बासी संझा बोरे, खाके सबो अघाथें।

दोपहरी के भात बचे ला, संझा जब नइ खावय।  
उही बिहनिया होय तियासी, पचपच ले हो जावय।

अमसुरहा जब रहे तियासी,  कोनो मन नइ भावयँ। 
नून डार खलखल ले धोके, मही डार सब खावयँ।

बासी हो या रहे तियासी, खावत निदिया आथे।  
पर बासी हर सब मौसम मा, सिरतो गजब सुहाथे।  

जे नइ खाये ते का जानय, कतका हे गुणकारी। 
भात तको ला तिरिया सकथे, खा देखय इक बारी। 

बिन बासी खाये गरमी हर, कइसे भला पहाही। 
उही बाँचही लू झुलसे ले, जे हर बासी खाही।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

Tuesday, 3 May 2022

पढ़ने वाला


सुबह सवेरे उठ जाता है, धो लेता नैनन जाला। 
बैठ समाधी तप करता है, लिए हाथ मोती माला। 
उसको कोई डिगा सका ना, जिसका लक्ष्य सुनिश्चित हो।
कठिन परिश्रम नित कर करके, खुश होता पढ़ने वाला। 

खेल कूद सब त्याग रखा है, कुंडी पर लटका ताला। 
दुनिया दारी छोड़ मुसाफिर, ध्यान लगा जपता माला।  
साध रहा सैयम में रहकर, गहरा मोती पाने को।
पलभर भी बर्बाद करे ना, जो सच है पढ़ने वाला। 

सागर थाह लगाना है तो, चले नहीं गड़बड़ झाला। 
मोती उसको ही मिलता है, जिसने श्रम को है पाला। 
त्याग तपस्या मूल मंत्र है, अपनी मंजिल पाने को। 
आज बंद दरवाजे भीतर, साध रहा पढ़ने वाला। 

सूरज देखो तपा रहा है, डेरा शिर पर है डाला। 
धार पसीने की बह निकली, चुभा रहा तन पर भाला। 
पर गम किसको आज यहाँ पर, जो होता हो जाने दो। 
कहाँ पता चलता है कुछ भी, जब पढ़ता पढ़ने वाला। 

भूख लगे ना प्यास लगे अब, भले पड़े अंतर छाला। 
बार-बार आवाज लगा पर, खाने को हरदम टाला। 
जिसकी भूख प्यास हो पुस्तक, ओ क्या खाना खायेगा। 
ज्ञान बढाकर प्यास बुझाता, ध्यान लगा पढ़ने वाला। 

आँख रसातल पर जा बैठा, गर्त बना दोनों गाला। 
पेट पीठ आपस में चिपके, पसली लगता कंकाला। 
पर मस्तिष्क हरा है देखो, मिलता है नित खाने को। 
कैसा है तन इसकी ले सुध, कहाँ रखे पढ़ने वाला। 

ज्ञान पिपासा कभी मिटा ना, लक्ष्य भेद भी करडाला। 
अपने को अपडेट रखा है, छूट गया कब से शाला। 
राह चला अंतिम मंजिल को, फिर भी पुस्तक हाथ रखा। 
सगा यही है मित्र यही फिर, कब छोड़े पढ़ने वाला। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार  छत्तीसगढ़