घनाक्षरी
करत-करत काम , कर डरे ते अकाम,
करनी सुधारे बर, कइसे अब करबे।
कतका बिगाड़ करे, कतका सुधार करे,
कतका लगाये परे, कतका ल भरबे।
कहाँ-कहाँ ते ह जाबे, कती-कती ले ते लाबे,
कतका बटोर भाई, कोन मुठा धरबे।
करत-करत तोर, काया तक खीर जाही,
काम पर होय नही, कराहत मरबे।
मटर-मटर मट, मट-मट-मट करे,
सुन मटकुलिया तें, नाम तो बता दे ओ।
मन मोर रीझे नही, अंतस ह भीजे नही,
नैन मटकाए गोई, काम तो बता दे तो।
कहाँ के रहैया गोरी, कती हावे घर तोरी,
कहाँ ले तें आय हच, धाम तो बता दे तो।
तोर मन काय रहे, नैन तोर काय कहे,
समझ न आवत पैगाम तो बता दे ओ।
रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार