Tuesday, 29 September 2020

घनाक्षरी

घनाक्षरी 

करत-करत काम , कर डरे ते अकाम, 
करनी सुधारे बर, कइसे अब करबे।  
कतका बिगाड़ करे, कतका सुधार करे, 
कतका लगाये परे, कतका ल भरबे। 
कहाँ-कहाँ ते ह जाबे, कती-कती ले ते लाबे, 
कतका बटोर भाई, कोन मुठा धरबे। 
करत-करत तोर, काया तक खीर जाही, 
काम पर होय नही, कराहत मरबे।  

मटर-मटर मट, मट-मट-मट करे, 
सुन मटकुलिया तें, नाम तो बता दे ओ। 
मन मोर रीझे नही, अंतस ह भीजे नही, 
नैन मटकाए गोई, काम तो बता दे तो। 
कहाँ के रहैया गोरी, कती हावे घर तोरी, 
कहाँ ले तें आय हच, धाम तो बता दे तो। 
तोर मन काय रहे, नैन तोर काय कहे, 
समझ न आवत पैगाम तो बता दे ओ। 

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा  
बलौदाबाजार

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम 
मुस्तफ़इलुन  मुस्तफ़इलुन 

2212   2212  

ले जन्म जेहर आय जी। 
मर एक दिन ओ जाय जी। 

सुत के बितादय उम्र सब।  
गुजरे समे पछताय जी। 

घर मा कुकुर के राज हे। 
बइठे सड़क मा गाय जी। 

चलथे हवा के संग मा। 
विपरीत मा घबराय जी। 

कलयुग खरावत जात हे। 
मनखे कहाँ मिल पाय जी। 

हर आदमी रकसा बने। 
अपने अपन ला खाय जी।  

पथरा म माथा फोर के। 
धरती तको पिघलाय जी। 

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Monday, 28 September 2020

मेरी बेटी

मेरी बेटी

मेरी बेटी प्यारी प्यारी। 
मेरे घर की राज दुलारी। 
मेरी अँखियों के दो तारे। 
बड़े सलौने प्यारे प्यारे।

ये हँसते रहती है पल-पल। 
जैसे नदियाँ करती कल-कल। 
पंछी बन उड़ते रहती है। 
मेरी गुड़िया सबसे चंचल। 

सूरज की लाली किरणों सा। 
सदा उजाला फैलाती है। 
पूनम की ये चाँद सरीखे। 
शीतलता जो ले आती है। 

सुबह चहकती चिड़ियों जैसी। 
मुझको गीत सुना जाती है। 
रजनी गंधा फूल सरीखे। 
घर आँगन को महकाती है। 

सागर की लहरों सी है ये । 
कभी हिलोरे दे जाती है। 
कभी झील के पानी जैसे। 
शांत भाव ये दिखलाती है। 

कभी इधर तो कभी उधर है। 
ना जाने ये किधर-किधर है। 
हवा सरीखे बहे  हमेसा । 
मिले खुशी की डगर जिधर है।  

इसे देख हर्षित होता हूँ। 
इनके सपनों में खोता हूँ। 
मुझको लगती प्यारी-प्यारी। 
मेरी है ये दुनिया सारी।

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम 
मुस्तफ़इलुन  मुस्तफ़इलुन

2212   2212 

काकी सुनावत बात हे।
बइठे कका कनवात हे।

लबरा लबारी मार के। 
उल्लू बनाये जात हे। 

घनघोर बादर छाय हे। 
जइसे लगे बरसात हे। 

जब काम हे तब राखथे। 
फिर मार देवत लात हे। 

बेटा हवेली मा रहे। 
माँ बाप खपरा छात हे। 

तँय साँप ला झन पालबे। 
करथे सखा आघात हे। 

कतको सुरक्षित रख भले। 
ले चोर जावय रात हे। 

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Sunday, 27 September 2020

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रजज़ मख़बून मरफू मुखल्ला 
मुफाइलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन मुफ़ाईलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन

1212 212 122 1212  212 122  

जनम धरे घर मा मोर आये हँसी लुटावय हमार बेटी 
चहक उठे घर महक उठे दर जे खिलखिलावय हमार बेटी। 

कभू रखे गोद मा सुलावय ददा कका अउ बबा तको हर।  
कभू झुलावत हे दाई पलना त मुस्कुरावय हमार बेटी। 

कभू अँगन मा ठुमक चलत हे कभू गली मा निकल ग जावय। 
छमक-छमक छम बजे पजनिया बने बजावय हमार बेटी। 

पढ़े लिखे के समे ह आगे चलव पढाबो ग चेत करके। 
लिखे पढ़े मा सदा हे अउवल इनाम पावय हमार बेटी।

उड़े कभू मन अकाश चाहय उड़ा सके नइ जमाना डर के। 
नजर गड़ाये रहे शिकारी कहाँ उड़ावय हमार बेटी। 

बिहा करे के करव न जल्दी अभी समे हे तनिक ठहर जव। 
अभी जमाना ल हे दिखाना का कर दिखावय हमार बेटी।

कका ले काकी बबा ले दादी ममा ले मामी नता कहाये।
ददा ले दाई बिहाय भौजी नता निभावय हमार बेटी। 

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम 
मुस्तफ़इलुन  मुस्तफ़इलुन 

2212  2212 

बिछिया हवय बड़ काम के। 
बिंदिया हवय बड़ काम के। 

माथा उठे जब दर्द तब।
निदिया हवय बड़ काम के। 

भाजी सुधारे बर बुआ। 
हँसिया हवय बड़ काम के। 

झाड़ी हटाना हे  कभू।  
टँगिया हवय बड़ काम के। 

कोनो अचानक आय ता। 
भजिया हवय बड़ काम के। 

करना हवय आराम ता। 
खटिया हवय बड़ काम के। 

त्यौहार मा पकवान बर। 
गुझिया हवय बड़ काम के। 

जब घर बसाना हे अलग। 
टठिया हवय बड़ काम के। 

अम्मठ बनाना साग हे। 
दधिया हवय बड़ काम के। 

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Saturday, 26 September 2020

गजल

 गजल -दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम 
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन 

2212   2212 

आवत हवय मन मार के। 
जावत हवय मन मार के।  

मन देय के नइ हे तभो।
लावत हवय मन मार के।

मँहगा हवय सब साग ता। 
खावत हवय मन मार के।

मन मा उदासी छाय हे। 
गावत हवय मन मार के। 

थक गे हवय कर काम जी। 
धावत हवय मन मार के। 

श्रद्धा नही परसाद मा। 
पावत हवय मन मार के।

बिलवा टुरा हे जान के।
भावत हवय मन मार के। 

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम 
मुस्ताफ़इलुन मुस्ताफ़इलुन

2212  2212 

गुण गान गावव राम के
आशीष पावव राम के।

हावय कछू तकलीफ ता
दरबार जावव राम के। 

कर आरती पूजा करव।
परसाद लावव राम के। 

दाई ददा भगवान हे।
पग सर नवावव राम के। 

कतकोन हे कहनी सगा।
लीला दिखावव राम के 

घर मा रखव पबरित जगा।
मंदिर बनावव राम के।  

अंतस अपन कर ध्यान जी।
मूरत बिठावव राम के। 

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़


गजल

 गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रमल मुसद्दस सालिम
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन

2122  2122 2122

बोर के बासी खवा दे आज मोला। 
गुण हवय कतका पता हे राज मोला। 

देश के रक्षा करे बर जम खड़े हे। 
ओ सिपाही बर सदा हे नाज मोला।  

तोर खातिर मोर हिरदे हा तड़फ थे। 
जब तहूँ तड़फे त दे आवाज मोला।

बेसरम बनके बितावत हँव समे मँय।
अब कहाँ आथे कका गो लाज मोला। 

माल खाये हँव बहुत सरकार के मँय।
लोग कहिथें चोर के सरताज मोला।

बिन करे मँय काम पावत हँव मजूरी। 
अब करे नइ आय संगी काज मोला। 

मँय शिकारी बन करे हँव काम कतको।
अब समझबे झन सगा तँय बाज मोला। 

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

दोहा

 "राम''

राम पूर्ण परमात्मा, सकल जगत आधार। 
राम कथा अविराम है, रामायण बस सार। 

जो जाने श्री राम को, वह भी है अंजान। 
ऐसी लीला राम की,  मति जस करे बखान। 

जगत पिता श्री राम हैं, जग के पालन हार। 
सुख दुख देते हैं वही, करते हैं भवपार। 

राम चराचर में बसे, सब हैं उनके रूप। 
मन से उज्ज्वल हैं सभी, तन है सभी अनूप।  

मेरे प्रभु श्री राम का, लीला अपरम पार। 
माया में जो हैं फँसे, समझ सके न सार। 

कोई कहता राम तो, रहते हैं आकाश। 
अंतर मन ढूंढे नही, जहाँ राम का वास। 

सकल जगत को तारने, लेते हैं अवतार। 
लीला धर लीला करे, चकित भये संसार।  

राम नाम संसार से, तरने को पतवार। 
निशदिन जप लो राम को, हो निश्चित उद्धार। 

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

Friday, 25 September 2020

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम 
मुस्ताफ़इलुन मुस्ताफ़इलुन

2212  2212 

बखरी भरे हे नार जी। 
तरबो इही संसार जी। 

बाढ़े हवय महगाई ता। 
बोहाय सब मझधार जी।  

गरुवा तको घूमत हवे। 
रखवार नइ हे खार जी।  

नदिया उतारे नाव ला।
नइ हे धरे पतवार जी।

परदेश जा के बस गये।  
माँ बाप हे लाचार जी। 

सपना दिखाके लूट थे।
धोखा करे हरबार जी। 

लबरा हवस अबड़े कका।
मुख ला अपन तँय टार जी।

कतको रहे अड़चन सगा। 
हिम्मत कभू झन हार जी। 

दुश्मन हजारों हे इहाँ।
रख ले बने हथियार जी। 

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

मुक्तक

मुक्तक 

दे रहा आवाज अब तो लौट आजा। 
गर वतन पे नाज अब तो लौट आजा। 
क्या रखा परदेश में जो भा गया है। 
छोड़ कर सब काज अब तो लौट आजा। 

सुन सुनाता हूँ सुहानी बात अपनी
क्या हँसी थी कल बिताई रात अपनी। 
चाँद था आकाश दूजा था जमी पे। 
मिल गया मुझको हँसी शौगात अपनी। 

दिलीप कुमार वर्मा

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महजूफ़ 
मुफाइलुन फ़ाइलातुन मुफाइलुन फेलुन

1212  1122 1212  22 

मरे रथे तको मनखे ह वोट डारत हे। 
समझ म आत हे कइसे कका ह हारत हे।   

डकार मार के खादिस हजार टन चाँउर।  
गरीब माँग थे हक ला त मुँह ल फारत हे।

कमाय कुछ नही खाये बखत बने अघुवा। 
कहे जे काम करे मुँह अपन ओ टारत हे।  

बड़े ह मार के चलदिस मरत ले मोला जी। 
तहाँ ले आय हे छोटे गजब के सारत हे।

सबो गड़ाय हे आँखी जी लूट खाये बर।  
समझ रखे हे जी हलुवा ओ देश भारत हे। 

गरीब घर म कहे रोशनी करे परही। 
बने सियान ते जा झोफडी ल बारत हे।

जे सोंचथे करे गलती तको दबा देबो।
हे मीडिया बने हुसियार शोर पारत हे। 

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

 

मुक्तक

मुक्तक 

2122  2122 2122 

रूप चंदा कस जहर भीतर भरे हे। 
आज हीरोइन नशा खातिर मरे हे। 
कोन जाने कोन फँसही जाल मा जी। 
एन सी बी देख ले पाछू परे हे। 

माल हो जब जेब में कितना मजा है। 
"माल'' पीने का यहाँ मिलता सजा है। 
माल आने से चले जो "माल'' रसते।
उन सभी का आज तो बारा बजा है। 

माल आया तो मिलाया "माल'' सबको। 
"माल''ने है कर दिया बेहाल सबको। 
माल आता जेब तो मति फिर ही जाता।
कर दिया है "माल''ने कंगाल सबको। 

"हैस गांजा माल'' हीरोइन उड़ाते। 
आज लगता है तभी तो नाच पाते। 
बेसरम बन के दिखाते जिस्म सारे।  
पाक दामन को सदा अपनी बताते। 

शेर को गीदड़ बना दे वो हँसी हो। 
बाल पन से तुम मेरे अंतर बसी हो। 
लाख चारे डाल दी ना काम आया। 
आज ऐसा क्या हुआ जो आ फँसी हो। 

शेर हिरनी को पकड़ कर रख लिया है। 
रक्त इंशानो का जब से चख लिया है। 
क्या पता कल डाल चारा फाँस ले वो। 
आज के इंशान ने भी नख लिया है। 

 कर रहे चैलेंज फोटो को दिखा के। 
हम कपल हैं बेस्ट लोगों को बता के। 
कौन जाने क्या छुपा मुस्कान पीछे।
खींच लाये हैं सभी गम को दबा के।  

सोंचता हूँ इस कपल में क्या कमी है। 
देखने के वास्ते दुनिया थमी है। 
आज बाइस वर्ष से हैं सँग निभाते। 
है यही परफेक्ट जो अबतक जमी है।

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रमल मुसद्दस सालिम 
फ़ाइलातुन  फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन 

2122  2122 2122 

दूर ले भइसा समझ के तीर आगे। 
देख के हाथी बिचारा दूर भागे। 

कोलिहा खुसरे रहय जब शेर माड़ा। 
सब समझथे शेर ला ओ मार खा गे। 

गाँव मा गोरी शहर के एक आये। 
जेन देखय तेन समझय भाग जागे। 

पाय हे पारस बड़ा इतरात हावय।  
सोन खाही रात दिन कस आज लागे

शेर बकरी मास ला नइ खात हावय। 
खून मनखे के लगत ओ स्वाद पागे। 

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रमल मुसद्दस सालिम 
फ़ाइलातुन  फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन 

2122  2122 2122  

मोर अँगना मा तुँहर का काम हावय। 
मँय चिंहत नइ हँव तुँहर का नाम हावय। 

जा कभू बाजार तब तो जान पाबे। 
खाय के सामान  के का दाम हावय। 

आज चूल्हा नइ जलय कतकोन घर मा। 
काम बिन अब पेट ला आराम हावय। 

जर जही चमड़ी निकल झन आज बाहिर। 
आग उगले कस लगत बड़ घाम हावय।  

चाँद जल करिया जही ओ देख तोला। 
दूध जइसन तोर गोरी चाम हावय। 

रात भर बइठे रहे महफ़िल सजा के। 
कोन बर बाँचे बता ये जाम हावय। 

राह थोरिक देख लेथन अउ कका के।
दिन निकल गे हे भले पर शाम हावय। 

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Wednesday, 23 September 2020

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रमल मुसद्दस सालिम 
फ़ाइलातुन  फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन

2122  2122 2122 

रूप चंदा कस जहर भीतर भरे हे। 
तोर अइसन चाल मा जनता मरे हे। 

सोंचथे शीतल हवा मा झूम जाबो। 
तीर जा के जानथे तन मन बरे हे। 

कल कलावत गात नदिया कस समझथें। 
डूबथें भीतर तहाँ चट-चट जरे हे।

फूल के खुशबू समझ घर लान डारे। 
फँस चुके रहिथे बिचारा का करे हे।  

रूप बदलत तँय रथस छड़-छड़ म गोरी। 
देख के बपुरा मुड़ी दिनभर धरे हे।  

छेड़ के तोला कका पछतात हावय। 
तोर प्रेमी मन कका ला बड़ छरे हे।  

तोर चाहत मा उड़ा गे माल जम्मो। 
बेवड़ा बनके कका रसता परे हे। 

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा  

बहरे रमल मुसद्दस सालिम
फ़ाइलातुन  फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन

2122  2122 2122 

रात के काबर सुरुज नइ आय भाई। 
का सुरुज हर रात मा घबराय भाई।  

रात के चंदा कहाँ रहिथे अकेला। 
लाख तारा संग धर के लाय भाई। 

ये बिहा लड्डू  ह लालच देत रहिथे।
जेन खावय तेन हर पछताय भाई।  

पूस के जाड़ा म हलकू हा जड़ा गे।
रात के गइया फसल सब खाय भाई।

पेर जाँगर अन्न बोवत हे किसनहा। 
दाम पर बढ़िया कहाँ वो पाय भाई। 

पाक गे हावय फसल जब काटना हे। 
देख ले बादर कहाँ ले छाय भाई।    

जूठा पतरी तीर बइठे देख काकी।  
भूख के मारे इहाँ तिरियाय भाई।

रचानाकार-- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़



दोहा

माटी

मैं माटी के पूत हँव, माटी सेवा काम। 
जबतक तन में जान हे, करँव नही आराम।

निशदिन जाँगर पेर के, भरे हवँव खलिहान। 
दुश्मन के आँखी गड़े, मारत रहिथे बान। 

अछरा ला मइलाय बर, चिखला देथे फेंक। 
बने सिपाही तन जथौं, तुरते देथौं छेंक।

लहरावत सब देख के, बैरी मन जल जाय।  
टिड्डा माहूं कस इहाँ, चुपके चुपके आय। 

माटी ला सिरजाय बर, हाजिर तन मन प्राण। 
पग काँटा कतको गड़े, कतको पर जय बाण। 

माटी ले मँय हँव बने, दुनिया माटी मोर। 
माटी मा ही मिल जहूँ, माटी तन मा जोर। 

माटी पावन हे हमर, जिहाँ जीव अम्बार।  
मिलजुल के रहिथन सबो, जइसे हो परिवार। 

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

सुंदरी सवैया

सुंदरी सवैया 

मनमोहन के मुरली सुन के, सुध गोप गुवालिन के बिसरागे। 
जस हाल रहे तस हाल सखा दउड़े सब जंगल बीच म आगे। 
सब रास रचावत हे मिल के, रतिहा जब बीत जथे तब जागे। 
मन आंनद पा मुसकावत हे, सुध आय तहाँ घर जावय भागे। 

रचानाकार--दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Tuesday, 22 September 2020

गजल

जल- दिलीप कुमार वर्मा 
बहरे रमल मुसद्दस सालिम 
फ़ाइलातुन  फ़ाइलातुन। फ़ाइलातुन 

2122  2122 2122   

मोर दाई तोर आशिष पाय हावँव। 
तोर किरपा ले जगत मा छाय हावँव। 

कोन मोला मार पाही अब बता दे। 
मँय कवच पहिरे लड़े बर आय हावँव। 

शेर कस गरजत रथौं बाहिर म मँय हर। 
सच कहँव बाई के आगू गाय हावँव। 

देखथौं कतकोन के आँखी दिखे नइ। 
ओखरो बर आज चश्मा लाय हावँव।

मँय दगा नइ कर सकवँ माटी ले संगी।
एख़रे देहे सदा मँय खाय हावँव।

कोढ़िया कतकोन मुँह ला फार बइठे।
ओखरो बर धान मँय उपजाय हावँव।  

मोर धरती मा कदम रखबे समझ ले। 
तोर बर बारूद मँय बिछवाय हावँव।

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा

बहरे मुजतस मुसमन मखबून महजूफ़ 
मुफ़ाइलुन फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फेलुन

1212  1122 1212  22 

मैं वो सहारा जे जिनगी सँवार देवत हँव। 
बहे ते बर बने तिनका उबार देवत हँव। 

गरीब जान के मोला ओ देत हे चाँउर। 
मैं रोज अद्धि ले बोतल डकार देवत हँव। 

गरीबी मा बिके घर खेत मोर पुरखा के। 
बचे न खाय के तब ले उधार देवत हँव।

रखे न जेब मे फूटी तभो ले राजा औ।
मँगे जे एक त वोला मे चार देवत हँव। 

मैं जानथौं हवे कतकोन झन इहाँ बैरी। 
नशा जहाँ चढ़े खुद ही कटार देवत हँव। 

रचानाकार-- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रमल मुसद्दस सालिम 
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन

2122  2122 2122 

बाण कजरेरी चलाये आज काबर।  
रूप चमका के गिराये गाज काबर।

जेन मन मा हे सबो ला बोल देते। 
मौन रहि के तँय छुपाये राज काबर। 

डाँट काबर खात रहिथस रात दिन तँय।
जे कहे तइसे करे नइ काज काबर। 

दाँत मा अछरा दबाये मुस्कुराके।
काय मन हाबय मरे तँय लाज काबर 

तोर रसता मोर ले विपरीत हावय।
फिर बता मोला दिहे आवाज काबर। 

रचानाकार--दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Monday, 21 September 2020

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे मुजतस मुसमन मख़बन महजूफ़ 
मुफ़ाइलुन फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फेलुन

1212  1122 1212  22 

बना डरे बने घर ला सगा बधाई हो। 
सजाय हच बने दर ला सगा बधाई हो। 

कहाँ के पाय ते पइसा मिले खजाना का।  
लुटाय हच बने हर ला सगा बधाई हो। 

बिताय रात ल शमशान मेर तँय जा के।
भगाय हच बने डर ला सगा बधाई हो। 

सुने हवँव बिके बर तो ये सोन कस होही।
सकेल डारे ते फर ला सगा बधाई हो। 

पहिर "दिलीप'' ते मुड़ हेलमेट ला निकले।
बचाय हच बने सर ला सगा बधाई हो।  

रचानाकार-- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

बाल गीत

बाल गीत 

मैं पापा की नटखट गुड़िया। 
सब कहते आफत की पुड़िया। 

उधम मचाती रहती दिनभर। 
उड़ती चिड़िया जैसे फर-फर। 

दादी को मैं खूब सताती।
कभी हाथ उसके ना आती। 

दादा की नखरीली डॉली।
"कहते वो'' हूँ नखरे वाली।

डाँट पड़े मम्मी से भारी। 
रो पड़ती गुड़िया बेचारी। 

पापा फिर सहला देते हैं। 
सारे गम वो ले लेते हैं।

फिर से रँग में आ जाती हूँ। 
प्यार सभी का पा जाती हूँ।

रचानाकार-- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़



Saturday, 19 September 2020

बाल गीत

बाल गीत 

पापा मेरे प्यारे-प्यारे। 
सब के पापा से हैं न्यारे। 

जो कहता हूँ कर देते हैं। 
मेरी झोली भर देते हैं। 

खेल खिलौने कपड़े लेते। 
जो मैं चाहूँ झट वो देते। 

मैं बोलूँ, घोड़ा बन जाते। 
अपने ऊपर मुझे बिठाते। 

जब बोलूँ, हाथी बन जाते। 
मुझे बिठा कर सूँड़ हिलाते।  

मस्ती करते शाम सवेरे। 
सबसे अच्छे पापा मेरे।

काश सभी के पापा ऐसे। 
होते मेरे पापा जैसे। 

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Friday, 18 September 2020

बाल गीत

बाल गीत 

मम्मी -मम्मी जल्दी आओ। 
बात एक हमको बतलाओ।  

सूरज दिन में क्यूँ आता है?
बोलो रात कहाँ जाता है?

रात रहे अम्बर में तारे। 
सुबह कहाँ जाते हैं सारे?

सुबह शाम पंछी आते हैं। 
आ के गाना क्यों गाते हैं?

फूलों पर भौरे मंडराते। 
बोलो भौरे क्या हैं पाते?

तितली हमको क्यों भाती है?
हाथ लगाओ उड़ जाती है। 

मछली जल में कैसे जिंदा?
उड़ती कैसे भला परिंदा? 

बोलो कब हम उड़ पाएंगे?
चंदा मामा घर जाएंगे। 

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

बाल गीत

बाल गीत 

दाई मोला बासी देदे, मँय हर इसकुल जाहूँ। 
दिनभर पढ़ लिख संगी मन सँग, संझा बेरा आहूँ। 

बढ़िया पढ़ के साहब बनहूँ, पइसा खूब कमाहूँ। 
कच्ची घर ला टोर टार के, पक्की बने बनाहूँ। 

नवा-नवा लुगरा मँय लाहूँ, अउ लाहूँ मँय धोती। 
तही पहिरबे लुगरा दाई, ददा पहिरही धोती। 

बड़का गाड़ी ले के आहूँ, हम सब घूमे जाबो। 
देश विदेश सबो ला देखत, घूम घाम के आबो।  

रंग-रंग के खाना पीना, हमरो घर मा होही। 
दाई मोरो राज करे अउ, ददा चैन से सोही। 

दूर गरीबी हमरो होही, जब मँय हर पढ़ पाहूँ। 
दाई मोला बासी देदे, मँय हर इसकुल जाहूँ। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे मुजतस मुसमन मख़बन महजूफ़
मुफ़ाइलुन फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फेलुन
1212  1122 1212  22 

हरेक बात हा ओखर लताड़ कस लागय।
कहे जो किटकिटा के दाँत जाड़ कस लागय। 

कबाड़ ले तको कतकोन घर चलत हावय। 
भले ओ घर तको ओखर कबाड़ कस लागय। 

शरीर बाढ़ गे हावय लगे बहुत भारी। 
जे देखबे त समझबे पहाड़ कस लागय। 

अवाज मा भरे हे जोश रोश आँखी मा। 
सुने म शेर के जइसे दहाड़ कस लागय। 

"दिलीप''हे बने ऊँचा सबो ल दिख जाथे। 
दिखे ओ दूर ले सब ला ओ ताड़ कस लागय। 

रचानाकार--दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Wednesday, 16 September 2020

गजल

गजल-- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महजूफ़ 
मुफ़ाइलुन फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फेलुन

1212  1122 1212  22 

कपाट बंद हे तब ले हवा ह आ जाथे। 
लगे ले पूस महीना सबो जड़ा जाथे। 

कतेक राखबे मछरी लुकाय रँधनी मा। 
मिले जे गंध बिलाई चुरा के खा जाथे। 

गरीब मस्त हे चिंता करे नही कल के। 
कमाय रोज तहाँ खाय बर ओ पा जाथे। 

अमीर सोंचथे कइसे बढ़ावँ बिजनस ला। 
करे प्रपंच ओ भारी तभो ठगा जाथे। 

चुनाव आय ले घर-घर  बनत रथे कुकरी। 
समझ से हे परे पइसा कहाँ ले पा जाथे।

कभू-कभू करे किरपा हमार कुटिया मा।
बिना घटा के ये बरसा कहाँ ले आ जाथे। 

"दिलीप''तोर कहे कोन भला मानत हे। 
ते ओ धुआँ रहे जे ठंड आय छा जाथे। 

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महजूफ़ 
मुफ़ाइलुन फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फेलुन

1212  1122 1212  22 

चमक दमक रखे अपने मकान को साहिब। 
उड़ा दिए जो मिला था ओ दान को साहिब। 

बिना चमक के न बिकता यहाँ कभी कुछ भी। 
सजा-सजा सदा रखना समान को साहिब।  

चमक उठा कभी तलवार जो निकल बाहिर। 
ओ म्यान में तभी जाए ले प्राण को साहिब।  

चमक-चमक के घटा से निहारती बिजली। 
कभी-कभी चला देती है बान को साहिब।  

सुहानी रात में चमके हजार तारें भी।
करें प्रकाश अँधेरे जहान को साहिब।  

हरेक चीज जो चमके नही ओ हो हीरा।
चमक के काँच भी लूटे नदान को साहिब। 

चमकती रोशनी सबको करीब लाती है। 
"दिलीप'' सोंच के भरना उड़ान को साहिब। 

रचानाकार--दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़