अमृत ध्वनि छंद
मरना हे जब एक दिन, फिर का सोंच विचार।
आगू पाँव बढ़ाय चल, मान कभू झन हार।
मान कभू झन, हार सखा तँय, जिनगी जी ले।
सत के मारग, पकड़ चला चल, अमरित पी ले।
कतको काँटा, गड़य पाँव मा, नइ हे डरना।
रोना धोना, छोड़ सखा अब, जब हे मरना।1।
करिया बेनी गाँथ के, गजरा सुघर लगाय।
मटकत रेंगय गाँव मा, गगरी धर के जाय।
गगरी धर के, जाय घटौना, पानी लाने।
सखी सहेली, रसता मिलगे, नइ पहिचाने।
करे सवाँगा, जइसे दुल्हन, जावय तरिया।
लाली चुनरी, काजर आँजे, बेनी करिया।2।
करिया बादर देख के, नाचय बन के मोर।
जंगल भर गूँजन लगे, पीहू पीहू शोर।
पीहू पीहू, शोर सुने ले, मन हरसावय।
घपटत बादर, हवा चले फिर, पानी आवय।
हरियर हरियर, खेत खार सब, रहे न परिया।
मोर नाचथे, जब जब आवय, बादर करिया।3।
आवय बाबा भेष मा, सब ला ठग के जाय।
झाँसा मा जे आय जी, अबड़े घाटा खाय।
अबड़े घाटा, खाय पिये मा, मन नइ लागय।
सोना चाँदी, लूट पाट के, बाबा भागय।
जे घर राहय, नारी नारी, ते घर जावय।
धोखा दे के, लुटे खजाना, बाबा आवय।4।
रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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