जंगल- दिलीप कुमार वर्मा
बहरे मज़ारिअ मुसम्मन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महजूफ़
मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलू फ़ाइलून
221 2121 1221 212
जंगल के राजनीति म कुछ खास बात हे।
का-का हवय दिलीप ह तोला दिखात हे।
राजा बने हे शेर त मंत्री सियार हे।
हर दिन शिकार करके प्रजा ला ओ खात हे।
चीता कुकुर तको परे पाछू ग खाय बर।
बन के सलाह कार ये सब ला मिटात हे।
हाथी विपक्ष मा खड़े चिंघाड़ थे बहुत।
सहयोग बेंदरा करे कुछ हो न पात हे।
भालू हे होशियार समे मा बदल जथे।
रहिथे कभू विपक्ष कभू संग जात हे।
बकरी हिरण डराय के जाही भला कहाँ।
जे दिन बचे शिकार ले ओ दिन ओ रात हे।
मरना हे एक दिन सबो ला मँय ह जान थौं।
घुट घुट मरत हवे प्रजा अइसन हलात हे।
रचनाकार--दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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