Sunday, 6 September 2020

गजल

जंगल- दिलीप कुमार वर्मा
बहरे मज़ारिअ मुसम्मन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महजूफ़ 
मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलू फ़ाइलून

221  2121 1221  212 

जंगल के राजनीति म कुछ खास बात हे। 
का-का हवय दिलीप ह तोला दिखात हे। 

राजा बने हे शेर त मंत्री सियार हे।  
हर दिन शिकार करके प्रजा ला ओ खात हे। 

चीता कुकुर तको परे पाछू ग खाय बर। 
बन के सलाह कार ये सब ला मिटात हे। 

हाथी विपक्ष मा खड़े चिंघाड़ थे बहुत। 
सहयोग बेंदरा करे कुछ हो न पात हे। 

भालू हे होशियार समे मा बदल जथे। 
रहिथे कभू विपक्ष कभू संग जात हे। 

बकरी हिरण डराय के जाही भला कहाँ। 
जे दिन बचे शिकार ले ओ दिन ओ रात हे। 

मरना हे एक दिन सबो ला मँय ह जान थौं। 
घुट घुट मरत हवे प्रजा अइसन हलात हे। 

रचनाकार--दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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