Thursday, 15 November 2018

मतदान करे बर जनजागरण गीत

मतदान करे बर आहवान गीत

सरसी छंद

चल ओ नोनी चल गा वबाबू,
आगे बड़े तिहार।
समे वार के ओट डार के,
बनवाबो सरकार।

सब मतदाता भाग्य विधाता,
अपन देश के होय।
गलती ले जब गलत बिराजय,
जन मन हर पल रोय।
सोंच समझ के काम करव जी,
मत झन हो बेकार।
एक एक मतदान मिले तब,
बन पाथे सरकार।

अपन देश के रक्षा होवय,
सब होवय खुशहाल।
सबो डहर गा हो विकास अब,
हर जन माला माल।
काम सबो के सरलग होवय,
झन हो भ्रष्टाचार।
अइसन चल सरकार बनाबो,
हे हमरो अधिकार।

दाई बाबू खेत गये हे,
चल ओला समझाव।
सबले बड़का काम यही ये,
वोट डार के आव।
कल पछतावा झन गा होवय,
अइसन करव चुनाव।
काम धाम सब आज छोंड़ के,
वोट करे बर जाव।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार

सार छंद

सार छंद 

मोरो दर मा आये राहय,बड़का एक भिखारी।
हाथ जोर ओ माँगत राहय,जाने का लाचारी। 

पहिनावा सब उज्जर उज्जर,दस झन सँग मा साथी।
ढोल बजावत आये दर मा,जइसे हो बाराती।
कहिथे मोला एक बार तो,मउका दे दव भाई।
सबो काम ला तुँहर बनाहूं, झन समझव हरजाई।
बोली मा तो मिसरी घोरे,माँगन आय दुवारी।
मउका पा के शेर बने फिर,निसदिन चले कटारी।

बड़का घर के बड़े भिखारी,छोटे घर मा आवय।
हाथ जोड़ के मूँड़ नवावय, पाँव तको परजावय।
दाई माई भइया भौजी,नाता सबो बनावय।
एक एक घर जा-जा जाके,अबड़े उन गुहरावय।
तुँहर भरोसा खड़े हवँव मँय,अब हे तुँहरो बारी।
जे चाही सब ले लव भइया,झन दव मोला गारी।

पइसा कौड़ी कपड़ा लकता,या पीले तँय दारू।
कुकरी बकरा जतका खाले,सुनले तनिक बुधारू। 
बिछिया चुटकी पैजन लेले,या लुगरा रख दाई।
कम्बल स्वेटर शॉल ओढ़ ले,सुन ले गा मोर भाई।
सब कोती खुशहाली लाहूँ, नइ गा रहे उधारी।
काबर मँय हा आये हावँव,समझव  सब लाचारी।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार

Friday, 3 August 2018

किरीट सवैया

मान कहे जिन बात बड़े मन,काबर तैं इतरावत हावच।
राह बने दिखलाय हवे,अनते तँय काबर जावत हावच ।
तोर करे करनी दुख देवय,कबार लोग सतावत हावच।
जेन बड़े मन गे करके,उखरो तँय राह मिटावत हावच।1।

ओमन जीवन सार बना,रसता सब ला दिखलाइन हावय।
जे मन राह चले उन मा,दुख थोरिक गा कब ओमन पावय।
राह चले जिनगी सँवरे, अउ संग म देश चलावत जावय।
आज सहे दुख जे हम लोगन,ते उँखरो कभु तीर न आवय।2।

नींव बनाय भरे पथरा,घर हा तब हीं बन पावत हावय।
लोग सबो ल भुलाय जथे,कतका भितरी म दबावत हावय।
जे पुरखा मन काम करे,तिन ला अब लोग भुलावत हावय।
बाढ़त हे घर ऊपर मा घर नींव सबो बिसरावत हावय।3।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार

त्रिभंगी छंद

सुन ले जग जननी,हमर सुमरनी,हम दुखियन के, दुःख हरो। 
जल्दी तुम आवव, भाग जगावव,पाप हरो माँ, पुन्य भरो। 
जग मा दुख बाढ़े,रकसा ठाढ़े,बन काली,संघार करो। 
कोनो झन रोवय,कुछ झन खोवय, अइसन माता ,भाग भरो।1। 

हम लइका तोरे,हन कर जोरे, मूँड़ नवाँ हम,मांग करें। 
अइसन दे जननी,चिंता हरनी,सब घर सुख के,फूल झरे। 
लइका जब रोवय,माँ खुश होवय,का अइसन गा,हो सकथे। 
हम आज गुहारन,मातु पुकारन,सोर हमर दाई रखथे।2। 

माता सुन बानी,जग कल्याणी,पूजन हम नइ ,जानत हैं। 
अंतस मा भरके,रूप ल धरके,मातु सदा हम ,मानत हैं। 
सब कुछ हे तोरे,कुछ नइ मोरे,का देवँव मैं, मातु बता। 
किरपा अब करदे,दुख ला हर दे,मंद मती हँव, झन ग सता।3। 

दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदा बाज़ार

Thursday, 2 August 2018

लांवणी छंद

मनखे ला मनखे सब जानव,झन भगवान बनावव जी।
करम करे धरती मा आये,करम करे फल पावव जी।

कतको मनखे बन भगवाने, लूटे बपुरा मनखे ला।
आनी बानी लालच दे के,ले लेथे सब तनखे ला।
धरम करम के पाठ पढ़ा के,डरव्हाथे  सब जानव जी।
मनखे ला मनखे सब मानव,झन भगवान ग मानव जी।

मन मे रख लव सब बिसवासे,संग सदा भगवान रहे।
धन दौलत अउ सोना चाँदी, दे दव कहिके कहाँ कहे।
श्रद्धा के दू फूल चढावव,अउ भगवान ल पावव जी।
पाखंडी मनखे पहिचानव, अब तो दूर भगावव जी।

हम सब ला भूखा ओ मारय,खुद तो माल कमावत हे।
बिना करम के डरा डरा के,लाखो पइसा पावत हे।
सुख दुख आवत जावत रहिथे,झन कोनो घबरावव जी।
मनखे सँग मनखे मिल जावव , दुख ला दूर हटावव जी।

रचना कार -दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार

Wednesday, 1 August 2018

रूप घनाक्षरी

लबरा मारे लबारी,बात कहे बारी बारी,
सुनत मोकाये संगी, देये रथे सबो कान।
मिरच मशाला डारे,मीठ मीठ दे उतारे,
सुने सब मुँह फारे, मोहनी खवाये मान।
साँच साँच सबो लागे,रहे चासनी म पागे,
सुध बुध ला भुलागे,जेन सुने तेने जान।
बात गुन लेहु भाई,कतका रहे सच्चाई,
सच अउ लबारी के,कर लेहु पहिचान।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार

मनहरण घनाक्षरी

मनहरण घनाक्षरी 
भूत ला भगाये बर, करथे प्रपंच भारी, 
आनी बानी टोटका ला,हम ला देखाय जी। 
राख के भभूत धरे,मंतर कहन लागे, 
मिरचा ला आगी डार, नीबू काटे जाय जी। 
धुँवा ला देखावय भारी,लीम डारा मारी मारी, 
मानो जस भूत धरे, चुन्दी चुंदियाय जी। 
भागे न भरम भूत,नो हे रकसा के दूत, 
जाने सब दुनिया हा, पर ओ ठगात हे। 
दिलीप कुमार वर्मा

Saturday, 24 March 2018

सुमुखी सवैया

माँ 

कहे न कहे पर जानत हे,लइका जब रोवत हे सुन माँ। 
कहाँ कब का लइका मँगथे,सब देवत हे बढ़िया चुन माँ। 
रहे मन मा सब जानत हे,सपना ल तको कइसे बुन माँ। 
कहाँ लइका पर जान सके,बइठे कइसे चुपके गुन माँ।1।