Friday, 29 January 2021

सवैया

किरीट सवैया

सोंचत हे मछरी तक काँपत का करके मँय रात बितावँव। 
बाढ़त हे अब जाड़ तको तरिया सँग मा कहुँ ना जम जावँव। 
मोर खुराक तको नइ हे अब खोज कहाँ मँय भूख मिटावँव।
शॉल मिले न मिले अँगरा कइसे करके अब जान बचावँव। 

7 भगन +तगन

बाहिर जा सकतेंव कहूँ ककरो कथरी रजिया म लुकातेंव। 
खाय तको मिलतीस तहाँ चुपके-चुपके तनियावत खातेंव। 
रोज नवा परिधान लपेट दिखावत लोगन ला इतरातेंव। 
जाड़ लगे अबड़ेच तहाँ अँगरा खुसरे मँय जान बचातेंव।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़
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212 1212 1212 1212  

जाड़ बाढ़ गे हवे बता नहाये जाय बर। 
का जरूरी हे कका नहाना भी ह खाय बर?

छोड़ के रजाई जाना हर तको न भात हे। 
जान बूझ के मरे ल जाय का नहाय बर। 

हाथ गोड़ काँपथे सुने कका ये जाड़ के।  
कोन हर बनाये जाड़ ला भला सताय बर। 

दिन घलो निकल जथे फुसुर-फुसुर रुके नही। 
ये सुरुज तको बने न आय जी तपाय बर। 

दिन बिताव शॉल ओढ़ भुर्री ताप के भले। 
रात लाद कतको कम हे जाड़ ला भगाय बर।

मुँह तको धुले नही उठे नही हे खाट ले।
रात के पहात ही लड़े बिहानी चाय बर। 

घुरघुरासी लागथे नहाय बस के नाम ले। 
पर रथे तियार मन ह आनी बानी खाय बर।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

Wednesday, 27 January 2021

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़
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212 1212 1212 1212 

रात ला बिताये बर तको ठिकाना नइ हवय। 
राख घर म ले अपन वो अब जमाना नइ हवय। 

कोन चोर बन जही त कोन मार भागही। 
माथ मा कहाँ लिखाये हे फलाना नइ हवय। 

दूर के ममा चले न दूर के बुआ चले। 
साँच पूछबे त आज कल बहाना नइ हवय। 

रोड मा तड़फ-तड़फ मरत हवय कतेक झन। 
रेंगथें कतेक पर गिरे उठाना नइ हवय। 

भूँख मा बिलख-बिलख गरीब रोत हे भले। 
खात हे कुकुर ह आदमी के खाना नइ हवय। 

जे मिले रखे चलव गलत सही न देखिहव। 
होत हे गलत भले जी मुँह बजाना नइ हवय। 

शेर राजा हे जिहाँ उहाँ कहे के काम का। 
चीर फाड़ तक दिही जी आजमाना नइ हवय। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़
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212 1212 1212 1212 

नान कन भले रथे मगर रथे चलाक जी। 
आ जथे दबे-दबे तहाँ करे वो खाक जी। 

बम धरे बड़े-बड़े कथे उठा पटक दुहूँ। 
रोज के डरा- डरा जमा डरे हे धाक जी। 

हाथी सोंचथे ये चाँटी मोर का बिगाड़ही। 
चाँटी चढ़ जथे कहूँ त काट खाये नाक जी। 

जानथव सचिन लिटिल ग मास्टर कहाय जे।  
सेन वार्न हर डरे डराय देश पाक जी। 

नान कन भले रहे ये भुसड़ी हर मगर कका। 
रात भर जगाये खून पी भरे खुराक जी। 

फाँस के गड़े ले रो डरत हवय ये आदमी। 
साँप के जहर ले आदमी मरे चटाक जी। 

नान-नान चीज काम ला करे बड़े- बड़े। 
मान ले दिलीप बात झन समझ मजाक जी। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

Tuesday, 26 January 2021

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़
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212 1212 1212 1212 

रोज के कचर-कचर जे पान खाये आत हे। 
हाल चाल देश अउ विदेश के सुनात हे। 

नेता के हे नाम काम दूसरा करत हवय।
कोन पाय कुर्सी देश कोन मन चलात हे।

जेन हे अमीर नेता ओखरे कहे करे। 
राजनीति हे गुलाम कहिके वो बतात हे। 

कोन देश शक्ति शाली कोन हर गरीब हे। 
एक पान खात जम्मो चित्र वो दिखात हे। 

कोन हे खिलाड़ी जेन खेल मा रमे हवय। 
कोन हे बिकाऊ जेन खेल मा हरात हे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

Monday, 25 January 2021

घनाक्षरी

घनाक्षरी ( सोन चिरइया ) 

सोन के चिरइया मोर, पिंजरा म बंद रहे, 
तड़फत रहे सदा, होये ल अजाद रे। 

उड़ियाना चाह के भी, उड़ वो सके न कभू, 
काखर करा ले करे, भला फरियाद रे। 

सुत तो सपूत रहे, काम ले कपूत रहे, 
आपस म लड़ मरे, लालची औलाद रे। 

परदेशी कौवा आये, छीन-छीन सब खाये, 
डरा धमका के सबो, होवत अबाद रे। 

कौवा करे काँव-काँव, दिन रात हाँव- हाँव, 
सबो परेसान रहे, कइसे के भगाय रे। 

धात-धात माने नही, प्रेम भाषा जाने नही, 
चाबे बर दौड़ पड़े, तिर तार आय रे। 

सोन के चिरइया बर, फूल भेजे घर-घर, 
सबो एक साथ मिल, आवाज उठाय रे। 

धर के मशाल चले, आपस मा मिले गले, 
कौवा ला भगाये बर, उदिम बताय रे।

धीरे-धीरे एकता के, सूत म बँधाये सबो,  
कौवा ला भगाये बर, करे तइयार हे। 

कोनो शांति राह चल, करत आंदोलन हे, 
कतको लड़े लड़ाई, करे आर पार हे।  

मार काट मचे भारी, सालों साल युद्ध जारी, 
दूनो कोती मरे पर, कहाँ माने हार हे।

लाखों बलिदान दे के, हजारों के जान लेके,  
सोन के चिरइया बर,खोले संसार हे।  

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार


Sunday, 24 January 2021

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़
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212 1212 1212 1212 

रात कारी ला भगाये जस सुरुज ह आय जी। 
मेहनत सुरुज असन ये जिंदगी के ताय जी। 

चाँद देख के चकोर सोंच मा परे हवय। 
कोन हर बनाये रूप मोर मन लुभाय जी।  

ईंट गारा ले बनाये हस बने भवन कका। 
घर तभे कहाय जब सबो म सुमता छाय जी। 

दीप ला जलाये ले अँधेरा दूर हो जथे।  
मन म जे अँधेरा तेन कइसे के भगाय जी।  

जब किसान छोड़ दय करे किसानी तब बता। 
कोन कारखाना फिर ग रोटी ल बनाय जी।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

Saturday, 23 January 2021

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़
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212 1212 1212 1212 

रूप ला निखार गोरी भाग ला सँवार ले। 
आ गे हे बुढापा चेहरा म पेंट मार ले।  

देख-देख मुस्कुरात हे टुरा पलट-पलट। 
वो कहे सके नही तहीं तनिक पुकार ले। 

देख के लजात हे कि देख के डरात हे। 
ये उही टुरी हरे कका बने उतार ले। 

टेस मार के दिखाय हाथ फेर मूँछ मा।
चेंदवा मुड़ी तको ल तोप झन उघार ले। 

हाल सोंच के अपन ते जिनगी झन खराब कर। 
चार दिन बचे समे चलाये बर उधार ले।

बीबी रोज डाँट के कराय काम रात दिन।
बाँचना हे कम से कम डराय बर कटार ले।

आज कल टुरी कहाँ मिलत हवय बिहाय बर। 
देख ले चलत हवे टुरा म दिल ल हार ले।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार


Friday, 22 January 2021

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़
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212 1212 1212 1212 

होत हे उजाड़ गाँव छोड़ के न जाव जी।
गाँव ला बनाये बर ग हाथ सब बँटाव जी। 

खेत खार हे अधार जिंदगी चलाये बर। 
बिन फसल बने नहीं ये बात सब बताव जी। 

जान ले जहान हे सम्हाल जिंदगी रखव। 
दारू पी के कार गाड़ी झन कभू चलाव जी। 

जोश-जोश मा कतेक होश खो मरत रथें।
गाड़ी जब चलाव हेलमेट भी लगाव जी।

जिंदगी म दुख कभू त सुख तको मिलत रथे।
नान-नान बात मा तो जान मत गँवाव जी। 

जेन काम कर सकव उही सदा करे करव।
होशियारी मार संगी नाक मत कटाव जी। 

लाल मुँह के बेंदरा दबे ग पाँव आत हे। 
छेंक छाँक के धरव तहाँ मरत ठठाव जी।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़
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212 1212 1212 1212 

राम नाम के सिवा कहाँ इहाँ अधार हे। 
राम नाम ला जपे तभेच बेड़ा पार हे।  

आदमी बिना कहे रहे सके नहीं इहाँ। 
चुगली मा रमे रथे मिले जहाँ भी चार हे। 

जेन भागथे इहाँ पढ़े लिखे के नाम ले।
रोज के बहाना मार देत जी बुखार हे।

आदमी के बाढ़ आय रोके ले रुके नही।
जेन कोत देखबे कतार ही कतार हे। 

गाँव छोड़ के शहर म जेन भी रहत हवे। 
गाँव के रहइया ला कहे कि वो गँवार हे।

मोर गाँव मोर देश मोर खेत कह जिये। 
तोर जान जाय ले रहे नहीं तुँहार हे। 

खेत खार गाँव छोड़ लोग जात हे शहर। 
कोन देखथे किसान पाँव मा कुठार हे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़
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212 1212 1212 1212 

काल-काल जे करे समे सदा वो खोय हे। 
काल आय ना कभू जे काल आय रोय हे।

आज के समे गवाँ जे काल मा टिके रहे।
जान लव वो जान के समे ले हाथ धोय हे।

नाम तँय कमाय बर नवा-नवा उदिम करे। 
काम एक जे करे उही के नाम होय हे। 

घण्टी ला बजा-बजा जगात हे कभू-कभू। 
भाग के उठाय ले उठे कहाँ वो सोय हे। 

तोर कान ला पकड़ समे परे म लेगही।
बात वो सुने नही जे देंवता पठोय हे। 

तोर काम देख-देख दाई अउ ददा दुखी।
काम कुछ तो कर बने जे तोर ले सँजोय हे। 

आखरी समे रहे सबो भगाय जाय जी। 
कोन पाय कोन खाय कोन हा पचोय हे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

Wednesday, 20 January 2021

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़
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212 1212 1212 1212

टेटका के दौड़ सिर्फ बारी तक ही आय जी। 
मेचका के दुनिया हा कुआँ म ही सिराय जी। 

बात गोपनी रखे कहे पचे न बात हा।
काँव-काँव करके देख सब ला वो बताय जी।

शेर जइसे राजा के जी आन बान शान देख।
भूख लागथे तभो ले घाँस नइ तो खाय जी। 

देख ले पहाड़ कस मिले हे देह हाथी ला । 
हो जथे गुलाम वो दिमाक नइ तो पाय जी। 

हाँव-हाँव ये कुकुर ह दुरिहा ले करत रथे।
बेंदरा कभू-कभू पकड़ मरत ठठाय जी। 

कोयली के बोल मीठ सब्बो ला सुहात हे।  
मन रहे दुखी तहाँ कहाँ कछू ह भाय जी।

लोमड़ी चलाक हे समे परे बदल जथे। 
जेन हे गधा इहाँ उही ल वो फँसाय जी।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

Tuesday, 19 January 2021

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़
फ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन

212 1212 1212 1212

दान पुन करे करव जी पुण्य ला भरे करव। 
पाप के कमाई खाये पाप ले डरे करव। 

लोभ मोह मा फँसे पिसाय देख जिंदगी। 
सोंच के डगर चलव जी सोंच के करे करव। 

चार दिन के जिंदगी म ऊँच नीच पाट के। 
राह मा दुखी मिले त दुःख ला हरे करव। 

जिंदगी के राह मा बहुत झने बिछल जथे।
देख झन गिरय ग थाम हाथ ला धरे करव। 

देश बर लुटाये जान जेन आन बान ले। 
तेन पाँव के तरी म फूल कस झरे करव। 

जेन खून सींच के कमाय मान हे इहाँ।
देख शान ला उँखर जी दाँत झन दरे करव। 

खेल युद्ध देखना तो दूर ले बने लगे।
जोश मा लड़ाई बीच देख झन परे करव।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्फूफ़ मक़्बूज़ मुख़न्नक सालिम
फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन

212 1222 212 1222 

डोकरा के रसता ला डोकरी निहारत हे। 
बड़ भुखाय होही जी कहिके आगी बारत हे। 

बात नइ करत हावय बेटा हर ददा ले जी।
जानथे ददा सब पर जान के तिखारत हे

श्याम खाय माखन ला रोज चोर कस आवय।
खात भर ले खावय फिर गगरी ला कचारत हे। 

केमरा के आगू मुँह बाँधना मना राहय।
आय ले करोना के कोन हर उघारत हे। 

जन्म ले गरीबी के मार ला सहे जे मन।
काम धाम करके वो भाग ला सँवारत हे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

गजल

ग़ज़ल - दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हजज़ मुसमन अख़रब मक्फ़ूफ मक्फ़ूफ मक्फ़ूफ महज़ूफ़
मफ़ऊल मुफ़ाईल मुफ़ाईल फ़ऊलुन

221 1221 1221 122

लालच म फँसे तँय कका का पाय ठगा के।   
कतको रखे चिरमोट वो ले जाही नगा के।

माटी के बने देह हा माटी म समाही। 
फोकट करे अभिमान तें मेंकब ल लगा के। 

सोना के महल मोर करा एक रहिस हे।  
जम्मो ल उझारे कका मोला ते जगा के।

पतवार के बिन नाव चलाबे भला कइसे। 
तँय घाट ला हथिया डरे मजदूर भगा के।

बइठे बबा काँपत हवे नइ शॉल न स्वेटर।
जाड़ा ल भगावत हवे बीड़ी ल दगा के। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

Sunday, 17 January 2021

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्फूफ़ मक़्बूज़ मुख़न्नक सालिम
फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन

212 1222  212 1222

बिन बुलाय पहुना हर जान के पदोवत हे। 
बैठ खाय तनतन ले तान के पदोवत हे।  

खाय बर तो हक्का हे जानथौं मगर हद हे।
आधा रात के मछरी लान के पदोवत हे।

सास मोर नइ भावय फेंक देथे खाना ला।
जानथौं बने हे पर ठान के पदोवत हे।

चार दिन ह नइ होए हे सड़क बने संगी।
बीच राह मा गड्ढा खान के पदोवत हे।

नाक के नथनिया ला नाक मा रहन दे वो। 
तोर झूले झुमका ये कान के पदोवत हे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्फूफ़ मक़्बूज़ मुख़न्नक सालिम
फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन

212  1222 212  1222 

भीख मांग जीयत हे राम के बहाना मा।  
रोज दारू पीयत हे शाम के बहाना मा। 

पाँव घर म नइ राखय घात खोर किंजरा हे।  
रात भर वो नइ आवय काम के बहाना मा। 

हे जनम के कइयाँ पर कोसथे वो महँगाई
भाजी भात खावत हे दाम के बहाना मा। 

कोढ़िया जनम के हे दोष देत दूसर ला।
बैठ के बितावत हे घाम के बहाना मा। 

चार डाँड़ नइ जानय जेन हर लिखे बर जी।
कविता ला चुरावत हे नाम के बहाना हे। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हजज़ मुसमन अख़रब मक्फ़ूफ मक्फ़ूफ मक्फ़ूफ महज़ूफ़
मफ़ऊल मुफ़ाईल मुफ़ाईल फ़ऊलुन

221 1221 1221 122

रावण ह बने ज्ञान के भंडार रहिस हे। 
अउ कुम्भकरण भाई ह खूंखार रहिस हे। 

पर एक विभीषण रहे भाई म जे छोटे। 
दोनो ल मरादिस बड़ा हुसियार रहिस हे। 

सीता बिना बनवास मा रावण मरे कइसे।
सीता के हरण मारे के आधार रहिस हे। 

लछिमन चले हे संग म का काम बता दे। 
रावण के टुरा मेघ के हथियार रहिस हे।

हनुमान बिना काम कहाँ हो भला पूरा। 
भगवान वो शिव शक्ति के अवतार रहिस हे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

Saturday, 9 January 2021

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसम्मन मक़्बूज़
मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन

1212 1212 1212 1212

बिठाय नाव मा बहुत करत नदी ल पार हे। 
सम्हल-सम्हल चलात हे जबर नदी के धार हे। 

बनाय हौसला चले पहाड़ मुड़ नवाय जी। 
अगर कहूँ डराय जान ले तहाँ ग हार हे। 

बड़ा विचित्र हाल होय लोक तंत्र मा तको।
चलाय देश ला तको कहे कि जे गँवार हे। 

लकर धकर करे कका अतेक काय हड़बड़ी। 
सम्हल-सम्हल के रेंग नइ ते गिर जबे उतार हे। 

नशा करे दिमाक नास हो जथे ये जान ले।
पता चले नही नशा म एक हे कि चार हे। 

कभू सजे सजाय हाट बाट गाँव के रहे।
शहर डहर चले सबो त गाँव सब उजार हे। 

बढ़े हवय जी दाम आज खाय के समान के।
उलझ नही ते साग बर बने हवय जी दार हे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़


गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसम्मन मक़्बूज़
मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन

1212 1212 1212 1212

बहुत जरूरी काम के कहाँ रथे धियान जी। 
लरा परा म नाम के कहाँ रथे धियान जी। 

लुटाय जात हे कका रचे हवय बिहाव जब।
खुसी म कोनो दाम के कहाँ रथे धियान जी।

लकर-धकर निकल जबे कभू कहूँ ग जाय बर।
शहर म चौक जाम के कहाँ रथे धियान जी।

रहे न खाय के फिकर समे पता कहाँ चले।
बुता चलत अराम के कहाँ रथे धियान जी

निकल गये कभू कहूँ रहे जो दोस्त यार सँग।
सफर म काम धाम के कहाँ रथे धियान जी।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसम्मन मक़्बूज़
मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन

1212 1212 1212 1212

बड़े-बड़े दिखाय स्वप्न आज खोखला लगे। 
पता चले सही गलत अवाज खोखला लगे।  

बहुत रहिस विचार एक बार सिर म ताज हो।
मिलिस बहुत प्रयास से त ताज खोखला लगे

करिस हवय प्रपंच देश ला तको हिलाय बर। 
खुलिस हवय वो राज जान राज खोखला लगे। 

बहुत कराय काम हँव जतात चित्र छाप के। 
उखड़ गये वो काम धाम काज खोखला लगे। 

पहिर घुमत रहे कभू वो जीन्स टॉप ला 'दिलीप'। 
उही ह बहु बने लजाय लाज खोखला लगे।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़
फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन

2122 1122 1122 22 

एती वोती ते बता जात हवस काबर जी।
राह एती हवे नइ आत हवस काबर जी  

रेंगना हे त बने देख के रसता मा चल। 
बिन पिये टाँग ल लहरात हवस काबर जी। 

 रात के बात ला बिसरा के बने बइठे हस। 
 फेर खाना बता नइ खात हवस काबर जी। 

थोथना तोर उतारे ले कछू नइ होवय।  
फोकटे मा इहाँ चिल्लात हवस काबर जी। 

तँय अपन मन के सबो काम ला तो कर डारे।
बिगड़ गे बात त पछतात हवस काबर जी। 

जोड़ के हाथ ला तोला वो मनावत हावय।
मान जा बात ला अटियात हवस काबर जी। 

तोर घर काम बुता नइ हे का रे सँगवरी।
येती वोती बता छुछवात हवस काबर जी।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़



गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसम्मन मक़्बूज़
मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन

1212 1212 1212 1212

बने बनाय ला बिगाड़ दे बसे उजाड़ दे। 
चलत हवय का मन बता खड़े तको उखाड़ दे।  

पता नही का मन भरे तिलिल मिलिल करत रहे।
पढ़त रहे टुरा बने तभो कका ते झाड़ दे। 

भटक गये डगर बहुत पकड़ डगर म लान जी। 
कहूँ न माने बात ता तनिक कका दहाड़ दे। 

बहुत गरब भरे पुटानी मार के चिढात हे। 
उठा-उठा पटक बला समर म तँय पछाड़ दे।

लड़े मरे के साध हे लगे ये चीन ला बहुत। 
उठा के बौना ला पटक जमीन मा ते गाड़ दे।  

तुलुल मुलुल करत हवय ये देख पाक ला तको। 
पकड़ के मार काट दे नही ते चीर फाड़ दे।

बहुत खुसी रहिस हवय मिले जे नेवता 'दिलीप'।
पता नही का सोंच तँय बलाय के लताड़ दे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Friday, 8 January 2021

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़
फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन

2122 1122 1122 22 

एती वोती ते बता जात हवस काबर जी।
राह एती हवे नइ आत हवस काबर जी  

रेंगना हे त बने देख के रसता मा चल। 
बिन पिये टाँग ल लहरात हवस काबर जी। 

 रात के बात ला बिसरा के बने बइठे हस। 
 फेर खाना बता नइ खात हवस काबर जी। 

थोथना तोर उतारे ले कछू नइ होवय।  
फोकटे मा इहाँ चिल्लात हवस काबर जी। 

तँय अपन मन के सबो काम ला तो कर डारे।
बिगड़ गे बात त पछतात हवस काबर जी। 

जोड़ के हाथ ला तोला वो मनावत हावय।
मान जा बात ला अटियात हवस काबर जी। 

तोर घर काम बुता नइ हे का रे सँगवरी।
येती वोती बता छुछवात हवस काबर जी।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़



गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़
फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन

2122 1122 1122 22 

बोर करथे कका हा रोज कहानी कहिके। 
एक ठन ला सदा कहिथे कहे नानी कहिके। 

जान के फिक्र लगे थोरको वोला नइ हे। 
वो जहर रोज पियावत रथे पानी कहिके।  

कोन करही बता जतका मया मँय हर करथौं। 
मँय सदा तोला बलाथौं गड़ी रानी कहिके। 

काम कहिथौं कभू हरदम गड़ी उल्टा करथे।
लाय धर बेलना ला बोल मथानी कहिके।  

काट जंगल ले जलाऊ रखे लकड़ी लाने।
वो चढ़ा दिस हवे बरसा म पलानी कहिके। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़


गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़
फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन

2122 1122 1122 22   

आज कल नौकरी कोनो इहाँ पावत नइ हे। 
योजना तक नवा सरकार बनावत नइ हे। 

श्याम राधा के बिना कइसे बजाही मुरली। 
नाम के छोड़ कछू ध्यान म आवत नइ हे।  

रोज बिहना के उठे काम ल करते रहिथौं।  
सास मोला तभो ले देख तो भावत नइ हे।  

नेवता पाय के घर आये सुवागत हावय।  
काम हर हो गये अब जाव जी दावत नइ हे।

ये करोना के ग रोना बता कब तक रइही। 
कोनो वैक्सीन बना झट ले इहाँ लावत नइ हे। 

बोझ बन गे हवे अब काय बतावँव तोला।
आय मिहमान ह रतियाय गे जावत नइ हे।

का पता काय धरे बोझ अपन मन भीतर। 
लान रख दे हवँव खाना तभो खावत नइ हे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसम्मन मक़्बूज़
मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन

1212 1212 1212 1212

बहुत खराब हे डगर ये जिंदगी के जान जी।
सम्हल-सम्हल के चल नही ते गिर जबे उतान जी।

लिखे हवस जे नाम ला ते रेत मा उकेर के।
लहर बहाय लेगही रहे नही निशान जी। 

अकाश मा सुरुज हवे जे रासता दिखात हे।  
तभो हवय बहुत इहाँ हपट मरे बिहान जी। 

गियास ला अँजोर मा जलाय ले भला कहाँ। 
दिया जलाय रात जेन पुण्य के समान जी। 

बहुत बढ़त हवय इहाँ गली सड़क म भीड़ हर। 
चलाव कार गाड़ी ता रखे करव धियान जी।

गरीब जान के बहुत सतात हे ये जिंदगी। 
कहाँ पता ये जिंदगी ल मोर खान दान जी। 

'दिलीप' देख ले शहर जलत हवय उदास हे। 
उदिम कछू करव नही ते नइ बचे परान जी। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसम्मन मक़्बूज़
मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन

1212 1212 1212 1212

ददा कका बबा सबो रखे हवे ग आस हे। 
टुरी दिखाय जेन ला कहे टुरा कि पास हे। 

तलास मा खपत हवय शरीर हा सियान के।
उमर बढ़े बहुत हवय मिले नही हताश हे। 

टुरा मगर कहाँ कहे रखे हवय जे चाह ला। 
बताय कब करीना अस टुरी मिले त रास हे। 

जवान के विचार ला बबा कहाँ समझ सके। 
बिहाय दिस हवय तहाँ टुरा बहुत उदास हे। 

हवे ग फूल एक ठन  हजार भौरा आय हे। 
लड़े मरे अगर कहूँ समझ तहाँ विनाश हे।  

रहे जे भाग मा मिले उदास हो लड़व नही। 
सँवार लव ये जिंदगी समझ जहू का खास हे। 

लगे भले पहाड़ कस कभू-कभू ये जिंदगी।  
दिलीप' चल बिना रुके कहाँ पहाड़ उचास हे।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़