Wednesday, 27 January 2021

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़
फ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन

212 1212 1212 1212 

रात ला बिताये बर तको ठिकाना नइ हवय। 
राख घर म ले अपन वो अब जमाना नइ हवय। 

कोन चोर बन जही त कोन मार भागही। 
माथ मा कहाँ लिखाये हे फलाना नइ हवय। 

दूर के ममा चले न दूर के बुआ चले। 
साँच पूछबे त आज कल बहाना नइ हवय। 

रोड मा तड़फ-तड़फ मरत हवय कतेक झन। 
रेंगथें कतेक पर गिरे उठाना नइ हवय। 

भूँख मा बिलख-बिलख गरीब रोत हे भले। 
खात हे कुकुर ह आदमी के खाना नइ हवय। 

जे मिले रखे चलव गलत सही न देखिहव। 
होत हे गलत भले जी मुँह बजाना नइ हवय। 

शेर राजा हे जिहाँ उहाँ कहे के काम का। 
चीर फाड़ तक दिही जी आजमाना नइ हवय। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

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