Thursday, 30 April 2020

गजल

 गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहर 1222 1222 1222 1222

उदासी छाय हे सब मा, लगे जस हार होगे हे।
फँसे हावय सबो घर मा, लगे मझधार होगे हे।    

बनावत हे बड़े पुलिया,रुके पर काम बरसों ले।
खटाई मा परे हे काम, पइसा पार होगे हे। 

नशा छोंड़व कहे सब लोग, पर मानत कहाँ हावय।
बिहनिया ले चले दारू,घरो घर बार होगे हे। 

रहे भाँठा बहुत हर गाँव, खेलन खेल हम संगी।
सबो ला घेर धनहा कस बना अब खार होगे हे।  

कभू डंका बजय जग मा, कहावय सोन के चिड़िया।
हमर ये देश हा सिरतोन अब बीमार होगे हे।

न दाढ़ी मूँछ आये हे न टूटे दाँत बचपन के।
मुड़ी मा बांध के पगड़ी बड़ा सरदार होगे हे। 

उमर कच्चा हवय नइ जान पावय का हरे दुनिया।
बिहाये बर करे जल्दी, का बेटी भार होगे हे। 

बबा बइठे मुहाटी डोकरी दाई फुलाये मुँह।
मया के रंग छलके ले लगे तकरार होगे हे। 

बने घर नाँव के जइसे, करोना हे महा सागर।
लगा के मास्क ला निकलव इही पतवार होगे हे। 

सिपाही नर्स डॉक्टर अउ सफाई जे इहाँ करथे। 
बचा के जान ये सब के, नवा अवतार होगे हे। 

घरों घर आज मोबाइल हवे टी वी तको संगी। 
सबो देखत रथे दिन रात,आँखी चार होगे हे।  

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

 

Wednesday, 29 April 2020

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे मुतकारीब मुसमन सालिम 
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन 

122 122 122 122  

थिराले तनिक छाँव में आव राही। 
चढ़े जे सुरुज साँझ के ढल ही जाही। 

घना कोहरा छाय हे जिंदगी मा। 
न जाने बिहनहा नवा कोन लाही।  

हमर काय होही जी बीते घड़ी मा। 
बुझाही दिया की अँजोरी ह आही। 

सबो राह जोहत हवय हे विधाता। 
लिखे भाग का हे ते कोने बताही। 

समंदर के लहरा तको कम लगत हे। 
उठे जेन अंतस लहर कब सिराही। 

लगे चाँद सुग्घर रहे रात पुन्नी। 
न जाने अमावस ह कइसे पहाही।  

बरस बीत गे हे जवानी सिराये। 
तभो राख राखे रखे का रखाही।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़


Monday, 27 April 2020

शक्ति छंद

शक्ति छंद- दिलीप कुमार वर्मा

सुराही म पानी ल रखले कका। 
बढ़े घाम भारी त चख ले कका। 

रहे साफ ठंडा अबड़ बेर ले। 
नवा के सुराही बने हेर ले। 
पियाथे ससन भर कहे मान ले।  
भगाथे ग गरमी सही जान ले।     

न सोना न चाँदी न ताँबा हरे। 
न काँसा न प्लास्टिक इहाँ जी भरे। 
बने शुद्ध माटी पके आग मा।   
मया सब भराये हमर भाग मा।   

रहे स्वाद सुग्घर सुहाथे बने। 
सबो जानथे अउ रखे सबझने। 
तहीं नइ मँगाये मँगाले कका।
सुराही म पानी भरा ले कका।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

पञ्चचामर छंद

पञ्चचामर छंद 
12 12 12 12 , 12 12 12 12 

जिहाँ मया मिले नही उहाँ कहाँ निवास हो।
कदम बढ़ा बढ़े चलव जिहाँ मया ग आस हो।

लगे पियास भूख जी तभो कहूँ रुकव नही।
इहाँ उहाँ जिहाँ मिले रखे मया सही सही। 

बिना मया मिले अगर रहे ग खास भोग हो।  
नरी उतर सके नही गये हजार रोग हो। 

नरम नरम ग सेज तक गड़े समान सूल जी। 
बिना मया रुकव नही करव कभू न भूल जी।  

जिहाँ मिले मया सने त माँग खाव भात जी।
जमीन सेज कस लगे जठाय घाँस रात जी।

मया सनाय बेर ला मजा म खाय राम हे।  
मया ल पाय राधिका मया बँधाय श्याम हे।  

दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Friday, 24 April 2020

जयकारी

जयकारी छंद

तहीं बता का होही मोर।
मन मा उमड़त हवय हिलोर।
बासी झटकुन देदे बोर।
दाई पइयां लागँव तोर।

मुसुवा कूदत हावय पेट।
बरतन भाड़ा तुरत समेट।
दाई अब झन कर तँय लेट।
बाँगा सँग करले तँय भेंट।

तनिक मही देबे तँय डार।
अउ आमा के लान अचार।
मुसुवा झट मँय देवँव मार।
पेट भरे तब हो उद्धार।

बासी महिमा अगम अपार
खावय मनखे मार डकार।
छत्तीसगढ़ के व्यंजन सार।
जन जन ला देवत हे तार।

दिलीप कुमार वर्मा

Thursday, 23 April 2020

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

122 122 122 

कहे बात सुन आज भाई। 
बने तँय ह कर काज भाई। 

बड़े आय विपदा हवय गा। 
सबो घर गिरे गाज भाई। 

सुरक्षा बने तँय बनाले। 
तभे सब करे नाज भाई। 

निकल झन अपन घर ले बाहिर। 
तहूँ फिर पहिर ताज भाई। 

कहे बात कतको न मानय।
तनिक तो करय लाज भाई।  

सिपाही ठठावत हे डंडा। 
न आवय तभो बाज भाई।

करोना मरे आज कइसे।
दिलीपाय नइ राज भाई। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा
122 122 122 

कका के कहे बात भावय।
बबा के कहे याद आवय।

रहे जे पुराना जमाना। 
उही के कथा सब सुनावय।

न झगरा न झंझट रहे जी। 
सबो कोत सुमता बतावय।

रहे एक सब के घठौना। 
जिहाँ शेर गइया नहावय।

चिरइया ह राहय दुवारी।  
बिहनहा सबो ला जगावय। 

सबो कोत जंगल कटाकट। 
उहाँ जाय सबझन डरावय। 

रहे साफ पानी नदी मा। 
ससन भर सबो ला पियावय।  

कहाँ आजकल ओ जमाना। 
पुराना सबो हा नँदावय। 

चले अब घरोघर म झगरा। 
त भाई ल भाई ठठावय। 

कका के कहाँ हे पुछारी। 
ददा हर तको मार खावय। 

न जंगल न झाड़ी इहाँ हे। 
सबो आज चकचक कटावय। 

दिलीपाज मा कर गुजारा।
पुराना भला कोन लावय।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा
122 122 122 

किसानी हरे काम भारी। 
तभो काम हे आज जारी। 

मिले नइ इहाँ दाम तब ले। 
करे काम लेके उधारी। 

किसानी जुआ ले बड़े हे।
तभो दाँव खेले तियारी। 

कभू रइ जथे खेत सुक्खा। 
कभू बाढ़ मारय कटारी। 

जतन जे करे तेन जाने। 
हवे आज हरियर जे बारी

इही पेट भरथे सबो के। 
ओ राजा रहे या भिखारी।   

सबो के उधारी चुका गे। 
किसनहा के कब आय पारी। 

दिलीपाज बइठे कलेचुप।
ये कमजोर हे संगवारी। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा

122 122 122 

किसनहा ह रोवत हवय जी। 
तभो धान बोवत हवय जी।  

बदे बैल सँग हे मितानी। 
तभे भूँस मोवत हवय जी।  

लगे बेर जानत हे दाई।
अँगाकर ल पोवत हवय जी। 

चलत हे गरीबी गुजारा।  
बहुत दुःख ढोवत हवय जी। 

बहे जेन आँसू नदी कस। 
उही तन ल धोवत हवय जी। 

सदा टोर जाँगर कमाथे। 
कहाँ अन्न होवत हवय जी। 

सबो जानथे ओ विधाता।
तभो देख सोवत हवय जी। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़




गजल

गजल 
122 122 122 

उमर भर करव जी पढ़ाई। 
बने सीख लेवव कढ़ाई।  

कहूँ टूट गे फइरका हर। 
बनाये बलाले बढ़ाई। 

उठाये रबे बोझ कबतक। 
जमी मा अभी दे मढ़ाई। 

निहारव न सूरत ल भाई। 
निहारव करे जे कढ़ाई। 

सहत ले सहे जात हावय। 
तहाँ फिर करे सब चढ़ाई।

दिलीप कुमार वर्मा

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा
122 122 122 

मुझे वो नही मार पाया। 
चला जो बना उनका साया।  

नदी पार था ले गया वो।
मगर शेर से छीन लाया। 

भरे क्रोध मे ठान कर वो।
मरोड़ा गला भी दबाया। 

मगर क्या हुआ वो ही जाने।
उठाया गले से लगाया। 

लगी जोर की भूख तब भी। 
मुझे वो खिला कर ही खाया। 

दिखे दो भले आज हम तो।
मगर एक दोनो की काया। 

मुझे ले गया मारने को।
कहानी उसी ने बताया। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Monday, 20 April 2020

आल्हा

आल्हा- दिलीप कुमार वर्मा 

फइलत हावय जे महमारी, तेखर कथा सुनावँव आज। 
कतका खतरा बाढ़त हावय, मण्डरावत हे बनके बाज। 

जाने कोन जगा ले आये, कुछ दिन मा दुनिया भर छाय।
दहलावत हे रार मचावत, जाने कहाँ तलक ये जाय। 

सात समंदर पार पहुँचगे, नइ बाँचत हे कोनो छोर। 
कोरोना के महमारी ले, दुनिया भर मा माते सोर। 

लगे बवंडर कस कोरोना, शहर नगर ला देत उड़ाय।
जात पात नइ देखय भाई, काल बने ये सब ला खाय।

जिहाँ जिहाँ कोरोना जावय, तिहाँ तिहाँ बनगे समशान। 
मरे रोवया नइ बाँचत हे, शहर नगर होगे वीरान। 

अजर अमर अविनासी लागय, अमर बेल जस बाढ़त जाय। 
छूत बरोबर ये महमारी, साबुत मनखे तक ला खाय। 

बात कहत लाचार करत हे, हाथ मिलावत तन मा आय।
एक जगा ले दुसर जगा मा, चढ़ समान ओ तुरते जाय।

दिखय नही ये ततका छोटे, पर मनखे ला मात खवाय। 
ये तन आवत स्वांसा रुक जय, तड़फ तड़फ मनखे मर जाय। 

कतको मनखे खटिया धरलय, कतको मनखे यमपुर जाय। 
पर मनखे कहना नइ मानय, अइसन सँवहत रहे झपाय।

साँस लेत मा हो परसानी, सुक्खा खाँसी सर्दी आय। 
अउ बुखार मा तन हर तीपय, लच्छन येखर इही बताय।

अइसन हे ता जाँच करावव, डॉक्टर ले तुरते मिल आव।
कहना ला डॉक्टर के मानव, कोरोना ले जान बचाव। 

सुनत हवन बिन लच्छन के जी, कोरोना तन मन रह जाय।
सोचव खतरा कतका हावय, कइसे करके जान बचाय।

दुनिया भर समझावत हावय, घर ले बाहिर झन गा जाव। 
जभे जरूरी तब्भे निकलव, मुँह मा सुग्घर मास्क लगाव। 

भीड़ भाड़ ले दुरिहा राहव, रहव एक मीटर जी दूर। 
बार बार साबुन ले भाई, धोना हावय हाथ जरूर। 

कोरोना तब घर नइ आवय, शासन के कहना ला मान। 
अपन सुरक्षा हाथ अपन हे, खतरा ला अब तो पहिचान।

डॉक्टर जान लगाये हावय, खड़े करोना यम के बीच। 
नर्स तको मन साथ चलत हे, जिनगी मा अमरित दय छींच। 

खड़े सिपाही छाती ताने, कोरोना ला दय ललकार। 
तुहरो जान बचाये खातिर, समझावत हे बारम्बार। 

भूत लात के बात न माने, देत सिपाही डंडा मार। 
बिन बुद्धि के मनखे मन ले, देव तको हर जावय हार। 

पर इन ला हे जान बचाना, करना अपन हवय जी काम।
आसा हे कोरोना मरही, तब्भे पाही यहू अराम।  

आशा ले आकाश थमे हे, आशा ले बरसा हो जाय। 
रख लव आशा मन मा भाई, कोरोना हर बच नइ पाय। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा  
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Saturday, 18 April 2020

सवैया

मटकावत हे गगरी धर के चिखला फदके जब हावय पाँव।
बिछले जब पाँव गिरे फद ले अब सोंचत हे कइसे घर जाँव।
फुटगे गगरी चमके बिजुरी कइसे करके भरके जल लाँव।
नइ सूझत आज गुवालिन ला,मुख ढाँकन आज मिले नइ छाँव।
दिलीप

Wednesday, 15 April 2020

शिव छंद

शिव छंद  

देख गाँव गाँव मा। शोर आम छाँव मा । 
कोयली पुकारथे। मीठ राग वारथे। 

मस्त होय जे सुने। मीठ राग ला गुने। 
आम बौर आय हे। कोयली ल भाय हे। 

आय हे बसंत हा। जाड़ के ग अंत हा। 
फूल महमहाय हे। देख रंग छाय हे। 

पान पेंड़ ले झरे। रुख लगे डरे डरे। 
सब डहर विरान हे।चरमराय पान हे। 

लाल पान जब लगे। रुख लगे दगे दगे। 
फिर बहार आय हे। फिर खुमार छाय हे।  

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

Tuesday, 14 April 2020

घनाक्षरी

घनाक्षरी 

जब से कोरोना आया, दाढ़ी मूँछ देखो छाया, 
नाई न मिले हैं भाई,बड़ा ही जंजाल है।  

जंगल सरीखे घना, मोटा मोटा हुआ तना, 
खुरदुरा हुआ देखो, मेरा पूरा गाल है।  

कुछ काले काले दिखे, लगते तेंदू सरीखे, 
सादे सादे बाँकी सारे, घाँस है कि बाल है। 

पहचान खो न जाऊँ, यही सोंच घबराऊँ, 
बाबा न समझ बाई, करे बुरा हाल है।

दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

Saturday, 11 April 2020

मुक्तक

मुक्तक 

जिसे हमने सिखाया था,वही हमको सिखाते हैं।  
हमारे चाल में गलती,सदा हमको बताते हैं।
उसे सायद नही है ज्ञान, होता है तजुर्बा क्या।
नया आया जमाना तो,हमे ओ आजमाते हैं। 

अदावो में शरारत है,शरारत में नजाकत है। 
नजाकत चाल में ऐसी,खुदा की ओ इनायत है। 
शुभानल्ला कहे जो भी,नजर भर देख ले तुझको।  
बला की खूबसूरत चाँद ले आया कयामत है। 

उसे कहदो हमारी राह पे,काँटे बिछाने को। 
बिछे जो फूल राहों पर,अभी उसको हटाने को। 
हमें ओ मखमली राहें,विरासत में नही चाही। 
बने कुछ अटपटे किस्से,बुढापे में बताने को। 

गगन में चाँद को देखा,खुशी पाया मगर था चंद। 
धरा पर देख कर तुझको,खुली आँखे हुई ना बंद।  
कयामत ढा रही हो तुम,हकीकत हो कि हो सपना। 
महकती फूल सी खुशबू,बिखरती हो लगे मकरंद।

गुनाहों को छुपाना है,करो फिर से गुनह कोई। 
जमाने को दिखाना है,करो फिर से गुनह कोई। 
मिला है ताज उनको ही,चले जो लाश के ऊपर। 
किसी को जब हँसाना है,करो फिर से गुनह कोई। 

हमे मालूम है सबकुछ,मगर हम कुछ नही कहते। 
रहे हम मौन दुनिया में, सभी के रंजो गम सहते। 
सताये हैं जमाने के, कहें तो क्या भला बोलो। 
किसी को दिख नही पाता, हमारे आँख जो बहते। 

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार


लावणी छंद

कोरोना

अइसन युद्ध कभू नइ होइस, जइसन आज चलत हावय। 
कोरोना बैरी बन आए, कोन जनी ये कब जावय। 

सबो देश मा ये कोरोना, हाहाकार मचावत हे। 
बड़े बड़े बलशाली योद्धा, थोरिक टिक नइ पावत हे। 

सबो देश हे एक पक्ष मा, दुसर तरफ कोरोना हे। 
परत हवय तब भी ओ भारी, इही बात के रोना हे। 

बम गोला बंदूक सहेजे, बल शाली जे कहलाये । 
आज उही बलशाली राजा, याचक बन के ओ आये।

अस्त्र शस्त्र बेकार पड़े हे, काम कछू ये नइ आवय। 
अइसन बैरी घर मा खुसरे, आसानी ले नइ जावय। 

भारी भरकम सेना रख के, जे मन ताकत दिखलावय। 
आज उहू कोरोना ले जी, हार मान खुसरे हावय। 

धन दौलत कुछ काम न आवय, अइसन बैरी आये हे। 
बिना लड़े लाखो जनता ला, देखव धूल चटाये हे। 

साँप देख जे बिला खुसरथे, ते डरपोक कहावत हे। 
समे परे ता इही काम हर, सब के जान बचावत हे। 

ये कोरोना अइसे बैरी, ताकत ले नइ मर पावय। 
घर मा रहिके जान बचालव, कोरोना तक मर जावय। 

धोवत रइही हाथ जेन मन, मास्क लगा बाहिर जाही। 
रहे जेन घर के भीतर मा, उही सिपाही कहलाही। 

मनखे के अवकात दिखादिस, एक वायरस कोरोना। 
ताकत ले नइ काम चले अब, हाथ बराबर हे धोना। 

दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार 

लावणी छंद

कोरोना गीत

घर हा देख  सराया नोहय, नोहय सगा धरमशाला। 
घर मा रहिके जान बचावव, आये ते खतरा टाला।  

पाई पाई जोड़ जोड़ के, सुग्घर महल बनाए तँय। 
काम धाम के भाग दौड़ में, घर के सुख नइ पाए तँय। 
आज मिले मौका हे भाई, बनजा घर के रखवाला। 

भाई बहिनी मातु पिता सँग, समे बिता ले कुछ भाई। 
पत्नी लइका के सँग रहिके, मजा उड़ा ले कुछ भाई। 
समे कभू अइसे नइ आवय, द्वार लगा रख तँय ताला। 

लइका मन सँग खेल कूद लव, मातु पिता सँग बतियावव। 
बाई के सँग हँसी ठिठोली, संग रहव सब मुसकावव। 
इही याद रह जाही संगी, बाँकी जिनगी हे काला। 

दिलीप कुमार वर्मा 

घनाक्षरी

कोरोना

ये कोरोना काल आगे,बड़ा बिकराल आगे, 
लगथे भूचाल आगे,आज सबो देश मा। 

आना जाना बंद होगे,रफतार मंद होगे, 
जिनगी ह छंद होगे, एके परिवेश मा। 

मुँह बाँध जाहू कहे, हाथ धोय खाहू कहे, 
तभे बाँच पाहू कहे,जिनगी के रेश मा। 

परिवार सँग रहौ,सुख दुख सँग सहौ, 
इही काम आही भाई,आपदा कलेश मा। 

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
9926170342