Tuesday, 26 May 2020

चौपाई

नवतप्पा- दिलीप कुमार वर्मा

सुरुज कका आँखी देखावय।
अँगरा जइसन ओ ललियावय।
धरती जरथे तावा जइसन।
दिन ये आये हावय कइसन।

रुख राई के पाना झरगे।
खेत खार सब परिया परगे।
कांदी कचरा मन ललियागे।
हवा चले ता दुरिहा भागे।

तरिया डबरी नदिया झिरिया।
पानी दर्शन नइ हे किरिया।
मरे मेचका मछरी माढ़े।
ठुड़गा रुखुवा देखत ठाढ़े।

हरर हरर बस हवा चलत हे।
उखरा रेंगत पाँव जलत हे।
जीव दिखे नइ चारो कोती।
जाने कइसन आय पनोती।

जीव जगत ला पानी चाही।
जाने बदरा कब बरसाही।
ये नवटप्पा आग लगाथे।
बिन पानी कतको मर जाथे।

घर मा खुसरे राहव भाई। 
येमा सबके हवय भलाई।
झाँझ झकोरा लू ले बाँचव।
बरसा आही फिर सब नाचव।

नवतप्पा चर दिनिया होथे।
पर कतको जिनगी ला खोथे। 
बात साँच ये कहना मानव।
बाँचे खातिर नुसखा जानव।

अपन सुरक्षा आप करव जी।
पानी पीयव प्याज धरव जी।
गमछा बांधव मुड़ मा भाई।
नइ ते हो जाही करलाई। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Sunday, 24 May 2020

रोला छंद

रोला छंद 

लहुटत हे मजदूर, गाँव के सुरता आगे। 
आये विपदा देख, शहर ले एती भागे। 
बंद परे सब काम, रहे नइ ठउर ठिकाना। 
लाँघन लइका देख, गाँव परगे जी आना। 

जाये बर परदेश, सबो झन लउहा होवय।
परे समे के मार, गाँव आये बर रोवय।
होगे सब लाचार, आय बर रेंगत भाई।  
छाला परगे पाँव, मातगे बड़ करलाई।

अपन गाँव ला छोड़, भला ये जाथे काबर। 
आय समस्या दौड़, बता फिर आथें काबर। 
इहाँ मिले जे काम, करे बर बड़ अटियाथे। 
ज्यादा के रख आश, दउड़ सब बाहिर जाथे।  

अब तो जावव चेत, कभू झन बाहिर जाहू। 
खेत खार हे गाँव, उही मा खूब कमाहू।
रूखा सूखा जेन, मिले अब खा के राहव। 
लालच मा फिर आय, कभू झन बाहिर जाहव।

दिलीप कुमार वर्मा

सखि छंद

सखि छंद-दिलीप कुमार वर्मा

शासन के कहना मानौ। बात कहत हे सच जानव। 
नोहय तनिक लबारी जी। विपदा आये भारी जी। 

आये हावय कोरोना। पर जाही सब ला रोना। 
येखर कहाँ दवाई हे। बाँचव तभे भलाई हे। 

सुरसा कस बाढ़त हावय। रकसा जस ठाढ़त हावय। 
लील डरे हे कतको ला। काय बचाही ओ तोला। 

छूये तक मा आ जाथे। तीर तार जेला पाथे। 
भीड़ भाड़ के राजा ये। खूब बजावत बाजा ये।  

मरे नही ये मारे ले। बनय नही पर हारे ले।  
येला दूर भगाना हे। पीछा जल्द छुड़ाना हे। 

कुछ तो अब करना परही। तभे हमर ले ये डरही। 
नइ ते घर घर मा आही। उठा उठा सब ले जाही। 

पहिली कोरोना जानव। डॉक्टर का कहिथे मानव। 
कइसे फिर अपनाना हे। सब ला जान बचाना हे। 

रोगी ले दुरिहा रहना। डॉक्टर के हावय कहना। 
कोनो ला नइ छूना हे। खतरा येमा दूना हे। 

नाक मूँह ले ये आथे। स्वांस नली मा घर पाथे। 
साबुन बने लगाना हे। हाथ साफ कर जाना हे। 

मीटर भर दुरिहा राहव। घर ले बाहिर जब जाहव। 
मास्क लगा के जाना हे। सब ला जान बचाना हे। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

 



रूपमाला छंद

रूपमाला 

मोर हिरदे मा खुसर गे तोर जब ले रूप। 
ठाढ़ बेरा मा तको मोला लगे नइ धूप। 
जाड़ मोला नइ जनावय पूस के ओ रात। 
आज कल मोला सुहावत हे घटा बरसात। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

रूपमाला छंद

रूपमाला छंद- दिलीप कुमार वर्मा

मोर संगी मोर साथी मोर सुनले बात। 
तोर बोली मोर मन ला देत हे आघात। 
थोरकुन पागे मया मा बोल देते बोल। 
मोर हिरदे के दुवारी आज देवँव खोल। 

तँय रिसाये मोर ले हच होय का हे बात। 
बोल बिगड़े हे तुँहर अउ बीच के हालात। 
कोन भर दे कान हावय सच बता दे तोर। 
आज देखे रूप तोरे मन डरत हे मोर। 

तोर मन शंका हवय ता आज करले दूर। 
बोल खुल के बात का हे झन रबे मजबूर। 
मँय बताहूँ बात जम्मो जेन हावय साँच। 
जानथौं मँय साँच हर नइ पाय संगी आँच।  

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़ 


दुर्मिल सवैया

दुर्मिल सवैया- दिलीप कुमार वर्मा 

करिया कहिथे कतको करले धरती पर जीव कहाँ रह पाही।  
जिन लेवत जन्म धरा पर हे उन एक समे मर के घर जाही। 
चलते रहिथे यह चक्र सदा जिन जावत हे उन हा फिर आही।
बस एक उपाय करे तरथे जिन राम भजे नित राम ल गाही।  

कतको करले कतको भरले कुछ जाय नही सँग मा सँगवारी। 
सब लूट खसोट बटोर डरे धर हाथ दिखावत आज कटारी।  
घर रोवत आज ददा बइठे अउ द्वार खड़े दुखिया महतारी। 
अब तो रुक जा चुकता करदे धरती कर बाढ़त जेन उधारी।

गदहा मनके जब राज रही तब लात तको परसाद कहाही। 
हरियाय रही जब ये धरती नइ खाय सके सनसो म सुखाही। 
जब सूख जही धरती हर जी तब देख सफाचट खूब अघाही। 
लदकाय रही कतको पथरा परही फटकार त गीत सुनाही।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Thursday, 14 May 2020

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे मुतकारीब मुसमन सालिम 
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
अरकान- 122 122 122 122 

मया मा अपन बाँध डारे हवच तँय।  
बहुत कन महूँ ला सुधारे हवच तँय। 

बहुत आय अड़चन हवय जिंदगी मा। 
कभू नइ समस्या ले हारे हवच तँय।  

रहय रूढ़िवादी डगर मा चलइया।
उहू मन के आँखी उघारे हवच तँय।  

बने जेन बलवान सेखी बघारय।
उहू ला पकड़ के कचारे हवच तँय। 

 बने बैद राजा बहुत काम आये। 
चढ़े झार बिच्छू उतारे हवच तँय।  

बिहिनिया की संझा की रतिहा के बेरा।
कभू आय विपदा ल टारे हवच तँय।  

फँसे जेन मझधार जिनगी के नइया
धरे हाथ वोला उबारे हवच तँय। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल 

 बहरे मुतकारीब मुसलमन  सालिम 
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन 

122 122 122 122 

मरे रोज लोगन नशा पान करके। 
कुकुर के असन मौत ला जाय धर के।  

कहाँ स्वर्ग जाही हवय जेन पापी। 
नरक मा समाही सबो आज मर के। 

सहे रोज पीरा उही दर्द जानय।
अगर नइ हे बिसवास ता देख जर के।

बिखेरत रथे रोज खुशबू चमन मा। 
रहे फूल पौधा या भुइया म झर के।  

कहे कोन ओला बहादुर सिपाही।  
भगे आय मैदान ले जेन डर के।

दुसर के मलाई बरोबर हे बाई।
रहे दार जइसन ग कुकरी ह घर के।   

करे जेन सेवा भलाई ल जानय। 
उही स्वर्ग जाही ये दुनिया ले तर के। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़


Tuesday, 12 May 2020

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे मुतकारीब मुसमन सालिम 
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन 
अरकान 122 122 122 122 

अकेला म आबे बहुत मार खाबे। 
कहूँ तँय बताबे बहुत मार खाबे।   

करे जेन मिहनत उही जाय आगू। 
समे जब चुराबे बहुत मार खाबे। 

नशा हर करे नाश जिनगी ल संगी। 
जे माखुर चबाबे बहुत मार खाबे। 

इहाँ नइ चले मास मदिरा समझ तँय। 
धरे घर जे लाबे बहुत मार खाबे।

बिना तँय बड़े मन के आशीष पाये। 
अपन घर बसाबे बहुत मार खाबे।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Tuesday, 5 May 2020

सार छंद

सार छंद- दिलीप कुमार वर्मा

करी घोषणा जब मुखिया ने, मेरा मन हर्षाया।
बंद रहोगे घर के अंदर, बात मुझे ये भाया। 

काम नही करने जाना है, घर मे मौज उड़ाएँ।
खीर बतासे हलुवा पूड़ी, रोज बना कर खाएँ।

बहुत हो चुकी काम कमाई, भाग दौड़ थी भारी। 
हुआ लॉक डाउन है भाई, अब अराम की बारी। 

समय बिताया कुछ दिन हँस कर, अब तो है लाचारी। 
घर के अंदर बंद हुए हैं, बोर हुए अब भारी। 

सब्जी काटो रोज रोज फिर, पोछा रोज लगाओ। 
अत्याचार करे हैं बाई, प्रभु जी हमे बचाओ। 

इससे अच्छा ओ अच्छा था, सुबह काम से जाते। 
मेल मिलाप सभी से करते, साँझ ढले घर आते। 

अब तो अत्याचार हुआ है,बंधन जरा हटाओ। 
खोल लॉक डाउन मुखिया जी, तरस जरा अब खाओ।  

कोरोना की बात ठीक है, है भारी बीमारी। 
पर हम मर जाएंगे घुटकर, समझो कुछ लाचारी।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Monday, 4 May 2020

अमृत ध्वनि छंद

अमृत ध्वनि छंद 

पके पपीता लाल हे, खाना हे ता आव। 
कटे छटे तइयार हे, जतका चाहव खाव। 
जतका चाहव, खाव मजे से, बढ़िया हावय। 
जेन दउड़ के,पहिली आवय,पहिली पावय। 
झन पछताहू, कहिदेथौं जब, होजय रीता। 
खाना हे ता, आवव संगी, पके पपीता। 

दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 
बहरे मुतकारीब मुसमल सालिम 
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन

बड़े के कहे मान गंगा नहाले। 
तरे जिंदगी जान गंगा नहाले। 

बटोरत रहे जिंदगी भर खजाना।  
समे आय कर दान गंगा नहाले।

चलत राह राही थिरा ले तनिक जी। 
भजन के करत पान गंगा नहाले। 

कहाँ धाम चारो भटकबे कका तँय। 
बबा के रखे ध्यान गंगा नहा ले। 

पढ़े जा पढ़े जा ये जिनगी गढ़े जा।
त डुबकी लगा ज्ञान गंगा नहाले। 

चढ़े चार काँधा चले जब मुसाफिर। 
सँगे जाय शमसान गंगा नहाले। 

धरम के डगर मा करत काम नेकी। 
बना के तैं पहिचान गंगा नहाले। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा  
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़


Saturday, 2 May 2020

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा
बहरे मुतकारीब मुसमल सालिम 
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन

बहर- 122 122 122 122 

बिहिनिया नहाना बहुत काम आथे। 
भजन गीत गाना बहुत काम आथे। 

रखव नेक साथी अपन जिंदगी मा। 
मितानी निभाना बहुत काम आथे। 

चढ़ाई के पहिली विभीषण तलासव। 
कमी के बताना बहुत काम आथे।  

रहे एक नारद लड़ाये के खातिर। 
उहू ला मनाना बहुत काम आथे।   

सिपाही दिखे ता नमस्ते करव जी। 
परे जाय थाना बहुत काम आथे। 

कभू घूम आवव दुसर देश ला जी।
छुपे बर ठिकाना बहुत काम आथे। 

तिरे तीर मच्छर ह गाना सुनावय।
त ताली बजाना बहुत काम आथे।  

सुने जेन चारी खवावत हे गारी। 
सुने ला छुपाना बहुत काम आथे।  

मुसीबत घड़ी मा बनव जी सहायक।
रहे धन लुटाना बहुत काम आथे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़ 

गजल

गजल  

बहरे मुतकारीब मुसमन सालिम 
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
बहरे 122 122 122 122 

घरो घर सफाई ल मजदूर करथे। 
लिपाई पुताई ल मजदूर करथे।   

भरे अन्न कोठी सबो के घरो घर। 
फसल के कटाई ल मजदूर करथे।  

बड़ा शान मारे अटारी दिखाके। 
ओ ईंटा चुनाई ल मजदूर करथे। 

बड़े कारखाना के मालिक भले तँय। 
तुँहर बर कमाई ल मजदूर करथे।   

बनाये हवच बांध छेंके नदी ला। 
पछीना तराईं ल मजदूर करथे। 

बुझावत हवव प्यास पानी पलो के।
नहर के खुदाई ल मजदूर करथे। 

दिखावत चलत हच पहिर जेन कपड़ा।
उहू के सिलाई ल मजदूर करथे।   

रहे रेशमी या कि सूती के लुगरा
सबो के कताई ल मजदूर करथे। 

बनाये पहाड़ी बड़े भव्य मंदिर। 
ओ पथरा चढ़ाई ल मजदूर करथे। 

लगे जाड़ भारी त कइसे बचे तँय। 
ओ स्वेटर बुनाई ल मजदूर करथे। 

कभू जान आफत फँसे जिंदगी मा। 
तुँहर बर लड़ाई ल मजदूर करथे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़


Friday, 1 May 2020

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे मुतकारीब मुसमल सालिम 
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन

122 122 122 122

पुराना जमाना बहुत याद आथे। 
रहँव जे ठिकाना बहुत याद आथे। 

बिहनिया घड़ी मा बजे सात बेरा।
नदी ताल जाना बहुत याद आथे।   

बँधाये रहे भैंस भइसा घरो घर।
ओ गरुवा चराना बहुत याद आथे। 

चले रेसटिप खेल संझा गली मा।
घरोघर लुकाना बहुत याद आथे। 

मँझनिया मँझनिया रहे संग साथी।
डुबक के नहाना बहुत याद आथे।

कुकुर संग ले के धरे हाथ लाठी ।
ओ बन्दर कुदाना बहुत याद आथे। 

हवय पेट पीरा बनाके बहाना।
ओ शाला ले आना बहुत याद आथे।  

रखे टोर छीता लुकाये जे भूँसा।
अकेल्ला म खाना बहुत याद आथे।

खुसर के दुसर के जी बारी बियारा। 
ओ खीरा चुराना बहुत याद आथे। 

चुराये रहँव एक रुपिया कभू ता। 
ददा के ठठाना बहुत याद आथे। 

समे पंख बांधे उड़ागे गगन मा। 
लड़कपन के गाना बहुत याद आथे।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल  
बहर- 122 122 122

धरम के डगर मा चले चल। 
गुनत काय हावस कले चल।

जिहाँ घोर अँधियार हावय। 
उहाँ तँय दिया बन जले चल। 

दुसर बर डगर ला बना दे। 
अपन राह उरभट भले चल। 

पछीना बहा जेन खाथे।
उखर जी सुरुज नइ ढले चल। 

भले मार पत्थर गिरावय। 
बने आम रुखुवा फले चल। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़