गजल
बहर- 122 122 122
धरम के डगर मा चले चल।
गुनत काय हावस कले चल।
जिहाँ घोर अँधियार हावय।
उहाँ तँय दिया बन जले चल।
दुसर बर डगर ला बना दे।
अपन राह उरभट भले चल।
पछीना बहा जेन खाथे।
उखर जी सुरुज नइ ढले चल।
भले मार पत्थर गिरावय।
बने आम रुखुवा फले चल।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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