अमृत ध्वनि छंद
पके पपीता लाल हे, खाना हे ता आव।
कटे छटे तइयार हे, जतका चाहव खाव।
जतका चाहव, खाव मजे से, बढ़िया हावय।
जेन दउड़ के,पहिली आवय,पहिली पावय।
झन पछताहू, कहिदेथौं जब, होजय रीता।
खाना हे ता, आवव संगी, पके पपीता।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
No comments:
Post a Comment