Thursday, 14 May 2020

गजल

गजल 

 बहरे मुतकारीब मुसलमन  सालिम 
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन 

122 122 122 122 

मरे रोज लोगन नशा पान करके। 
कुकुर के असन मौत ला जाय धर के।  

कहाँ स्वर्ग जाही हवय जेन पापी। 
नरक मा समाही सबो आज मर के। 

सहे रोज पीरा उही दर्द जानय।
अगर नइ हे बिसवास ता देख जर के।

बिखेरत रथे रोज खुशबू चमन मा। 
रहे फूल पौधा या भुइया म झर के।  

कहे कोन ओला बहादुर सिपाही।  
भगे आय मैदान ले जेन डर के।

दुसर के मलाई बरोबर हे बाई।
रहे दार जइसन ग कुकरी ह घर के।   

करे जेन सेवा भलाई ल जानय। 
उही स्वर्ग जाही ये दुनिया ले तर के। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़


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