Thursday, 26 September 2019

कविता

चूहा बिल्ली 

चूहा चूँ चूँ बोल रहा था।
कोठी को ओ खोल रहा था।
मेरी किस्मत झोल रहा था।
पक्के दाने फोल रहा था। 

बिल्ली हमने पाली एक। 
जिसमे खूबी भरीअनेक।
रातों को ओ करता चेक।
चूहा देखे करे अटेक।

पर चूहा था बड़ा चलाक।
चुपके से लेता था ताक। 
बड़ी तेज थी उसकी नाक।
बिल्ली देखे भगे तपाक। 

बिल्ली की अब बढ़ी आबादी।
पता नही कब हो ली शादी।
चूहों ने पाई आजादी।
अपने ऊपर आफत लादी।

बिल्ली चूहे ठेल रहे हैं।
माल हमारा झेल रहे हैं।
सुबे शाम ओ पेल रहे हैं।
चोर सिपाही खेल रहे हैं।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

अमृत ध्वनि छंद

अमृत ध्वनि छंद -- दिलीप कुमार वर्मा

1
जग के पालन हार प्रभु,बिनती सुनलव आज।
बिगड़ी सबो बनाय के,पूरा करदव काज।
पूरा करदव,काज हमर ला, शरण परे हन।
फँसे हवन सब,मोह मया मा,पाप करे हन।
झूठ बोल के,लूटत हावन,सब ला ठग के।
राह बता के,सुग्घर करलव,पालन जग के।
2
ऊपर वाला जानथे, कोन करे का काम।
सब ला फल ओ देत हे,नइ देखय ओ नाम।
नइ देखय ओ,नाम काखरो, पद का हावय।
जइसे करथे,करम इहाँ ओ,फल ला पावय। 
राजा हो या,रहे भिखारी,गोरा काला।
करम मुताबिक,फल देवत हे, ऊपर वाला। 
3
रसता बने बनाय लव,दे भविष्य के ध्यान।
काली उँगली झन उठय,तभ्भे पाहू मान।
तभ्भे पाहू,मान जान लव,कहना मानव। 
रसता बिगड़े,गारी खाहू, सच ला जानव।
पुरखा मनके, गलती खातिर,होगे खसता।
भाई भाई, झगरा माते, बिगड़े रसता।
4
मर जाही ओ एक दिन,जे हर जग मा आय।
राजा चाहे रंक हो,माटी मा मिलजाय।
माटी मा मिल,जाय सबोझन,कतको करलय।
हीरा मोती,सोना चाँदी, कतको भरलय।
ये धन दौलत,महल अटारी,काय बचाही। 
काल आय ले,बाँच सके ना,सब मर जाही।
5
मन के पीरा का कहँव,नइ हे कछू उपाय।
अंतस हा रोवत रथे,काम धाम नइ भाय।
काम धाम नइ,भाय जगत के,अलकर लागे।
मन हे चंचल,रुके नही घर,अन्ते भागे।
जब ले बाई,दूर बसे हे, सुध नइ तन के। 
काय बतावँव,समझ सकत हव,पीरा मन के।
6
बचपन के संगी बता,कब तक रहिबे संग।
ऊँच नीच जब हो जही, का तँय करबे तंग।
का तँय करबे,तंग बता दे,या सँग रहिबे।
रूखा सूखा,घाम छाँव के,दुख ला सहिबे।
खेलत खावत,उमर बढ़त हे, होगे पचपन। 
समे जाय ले,सुरता आवय,दिन ओ बचपन।
7
जागत सुतबे जान ले,अड़बड़ हाबय चोर।
रतिहा चुपके आ जथे,करय नहीं ओ शोर।
करय नहीं ओ, शोर सराबा, सुनले संगी।
गली गली मा, पासत रहिथे,बड़ उतलंगी।
सुन्ना घर ला, देख खुसरथे,बनथे भागत।
चोर उच्चक्का,घूमत हाबय,रहिबे जागत।
8
करिया बादर देख के,सबके मन हरसाय।
गरज चमक पानी गिरे,झूमन नाचन भाय।
झूमन नाचन,भाय सबो ला, करके हल्ला।
येती ओती,गरुवा तक हर,भागय पल्ला।
खेत खार अउ,नदिया नरवा,भरगे तरिया।
उमड़ घुमड़ के,जब बरसावय, बादर करिया।
9
पढ़ना लिखना छोंड़ के,करत हवव का काम।
बचपन बीते हे नहीं,का पाहू तुम दाम।
का पाहू तुम,दाम बता दव,मिहनत करके।
टूट जही तन,रूठ जही मन,पीरा धरके।
अभी बहुत हे, लम्बा रसता,हाबय चढ़ना।
आके इसकुल,सीखव संगी,लिखना पढ़ना।  
10
सावन मा शिवनाथ के,दर्शन बर सब जाय।
फूल पान पानी चढ़ा,मन चाहा वर पाय।
मन चाहा वर,पाय सबोझन,झोली भरथे।
भोले बाबा,अवघट दानी,पीरा हरथे।
चले कँवरिया, बोले बमबम,बड़ मनभावन।
ठनठन घण्टा,बजे शिवाला,पूरा सावन।
11
बिन पानी मछरी मरे,तइसे होवय हाल।
दूषित होवत हे धरा,सब के आगे काल। 
सबके आगे,काल हलक मा,कुछ नइ बाँचय।
पेंड़ काट के,नदी पाट के,पाँव ल खाँचय।
खाना पानी,हवा बिना अब,का जिनगानी।
घोर प्रदूषण,सुख्खा धरती,हे बिन पानी।
12 
रोटी बर तरसत रथे,कतको इहँचे लोग।
कतको मन फेकत रथे,नइ कर पावय भोग।
नइ कर पावय,भोग अन्न के,अतका रहिथे।
कोठी कोठी,भरे खजाना,दुनिया कहिथे।
सब जनता के,हक ला लूटे,बोटी बोटी।
हीरा मोती,का ओ खाही,खावय रोटी।
13
भागय नइ ओ काम ले,तन से जे लाचार। 
मिहनत करथे रात दिन,नइ मानत हे हार।
नइ मानत हे, हार कभू ओ,सदा डटे हे।
कतको आवय, आंधी संगी, कहाँ हटे हे।   
ओ प्रहरी कस,सजग रहत हे, हरपल जागय।  
जाँगर पेरय, रोटी खातिर,ओ नइ भागय।
14
लकड़ी ले कुर्सी बने,गाड़ा तखत कपाट।
टेबल चौखट पीढ़वा,चौंकी बेलन खाट।
चौंकी बेलन,खाट बना ले,झट बन जाथे।
पुतरी पुतरा,खेल खिलौना,सब ला भाथे। 
मुड़का ढेंकी,बैट बना ले, खावत ककड़ी।
पेटी तबला,कैरम खूंटी,बनथे लकड़ी।
15
राधा रोवत हे सखी,बइठे जमुना तीर।
कान्हा आवत नइ दिखे, कतका धरही धीर।
कतका धरही,धीर धरे बर,जिगरा चाही।
कोन जानथे,नटखट बिलवा,कब तक आही।
देखत रसता,चमके लागिस,चंदा आधा।
जमुना के तट,बइठे बइठे,रोवय राधा।
16
दारू अब तो छोंड़ दे,लावत हवय विनास।
कतको पी के मर जथे,कतको रहिथे लास।
कतको रहिथे,लास बरोबर,निच्चट मरहा। 
कतको झगरा,रहे मताये,जस बलकरहा।
घर कुरिया के,सोर कहाँ अब,करे बुधारू। 
बन के भकला,घूमत हावय,पी के दारू।
17
हरियर चारा देख के,गरुवा भागय खार।
कतको ठेला बांध लय, नइ पावत हे पार।।
नइ पावत हे, पार नदी के,चारा माढ़े।
गरुवा छेंके,लाठी धर के,राउत ठाढ़े।
गरुवा घूमे , खोर गली अउ,पारा पारा।
बीच सड़क मा,खाके बइठे,हरियर चारा।
18
चंदा मामा दूर हे,रहे चँदैनी संग।
रतिहा बेरा आय के,बने जमाथे रंग।
बने जमाथे,रंग रंग के,खेल दिखाथे।
आधा पूरा,चंदा मामा,सब ला भाथे।
लाख चँदैनी,चटके रहिथे,कामा कामा।
कभू कभू तो,तनिक दिखे ना,चंदा मामा।
19
धरती के रक्षा करे,सैनिक हे तैयार।
सीमा मा ठाढ़े हवय,कभू न मानय हार।
कभू न मानय,हार जही ओ,बैरी मन ले।
साहस भरके,सदा खड़े हे, तन मन धन ले। 
अपन देश बर, जान लुटाए,होथे भरती। 
बने बने तब,रहिथे भइया, सबके धरती।

रचना कार--दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

रोला

रोला

कर दे हे अँधियार,लगे बरसा हर आगे।
गरजत घुमड़त देख,बदरिया कारी छागे।
बरसत हे घनघोर, खेत भर पानी पानी।
आना जाना बंद,रुके हावय जिनगानी।

लगे सितम्बर मास,भरे दाई के कोरा।
दुर्गा दाई आय,करत हे सबो अगोरा।
पर आगे बरसात,योजना के का होही।
जेखर निकले धान,मुड़ी धर ओ हर रोही।

पानी पा हरसाय,किसनहा भाँठा वाला।
छेंकय मुहि के पार,कहय पानी झट पाला।
हो जाही अब धान,रहे नइ एक्को बदरा।
किरपा दाई तोर,धान सब जाही भदरा।

कइसे करहूँ काम, नौकरी वाला सोंचय।
सुख्खा मा बरसात,देख के मुड़ ला नोंचय।
रेन कोट ला लान,पहिर झट इसकुल जाहूँ।
जाड़ा की बरसात,जान ला महूँ बचाहूँ।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

सरसी छंद

सरसी छंद --चक्का

जीव जगत मा जब आइन हे, पाँव भरोसा ताय।
जइसन जइसन क्षमता राहय,तइसन दउड़ लगाय।

कखरो दूठन पाँव रहय ता,कखरो राहय चार।
कतको मन बिन पाँव चलत हे, कतको के भरमार।

पर जेमन के पाँख रहय ओ,अम्बर मा उड़ियाय।
दउड़इया सब जीव जगत ले,ओ आघू हो जाय।

मनखे हर अब सोंचे लागय,कइसे करँव उपाय।
जीव जगत के जम्मोझन ने,मनखे हर अघुवाय।

घोड़ा के फिर करे सवारी,सरपट दउड़ लगाय।
पर घोड़ा मा एक्के जावय,ज्यादा जा नइ पाय।

धीरे धीरे सोंचत सोंचत,पाइस एक उपाय।
लकड़ी ला फिर काट छाँट के,चक्का एक बनाय।

दू चक्का ले गाड़ी बनगे,बइठत हे दू चार।
बइला भइसा खींचन लागे,काम आय भरमार। 

सयकिल के निर्माण होय ले,सबके जागय भाग।
खड़बिड़ खड़बिड़ दउड़न लागय,छेड़ हवा सँग राग।

तीन तीन चक्का ला जोड़य, रिक्सा बने बनाय।
बइठारय दू चार सवारी,खींच तहाँ ले जाय।

धीरे से फिर ईंधन वाला,गाड़ी आइस जान।
मोटर सयकिल सरपट भागय, करय पूर्ण अरमान। 

बरसा जाड़ा घाम बचावय, अइसन करव उपाय।
चक्का फिर ओ चार लगा के,बस अउ कार बनाय।

जादा झन ला लेगे खातिर,फिर बनगे जी ट्रेन।
सरपट पटरी मा ओ दउड़य,चक्का के हे चेन।

मनखे सोंचे पाँख रहे ले,चिड़िया हर उड़ियाय।
अब उड़ियाये खातिर मनखे,सोचन लगे उपाय।

मनखे के मिहनत ले देखव,बनगे हवय जहाज।
आसमान मा ओ उड़ियावय,जेमा सबला नाज।

धरती अम्बर या हो सागर,सब मा चले जहाज।
लेगत हे राकेट इहाँ ले,चन्द्रयान ला आज।

चक्का के निर्माण होय ले,मनखे जीतय जंग।
सबले आगू भागत हावय,दुनिया देखय दंग।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

घनाक्षरी

घनाक्षरी

देख ताक चलो भाई,हो ना जाये करलाई,
सड़क के बीच बीच,यमराज वास हे।
खाय के अघाये हावे,बैठ पगुराय हावे,
गरुवा ह आये हावे,रोड आये रास हे।
कोनो येला लेगे नही,छोड़े हावे लाय कहीं,
घूम घूम खाये देखौ,खेत खार नास हे।
भर्री भाँठा हा छेकागे,सब गरुवा बंधागे,
घर ले निकाल देखो,खेदे आस पास हे।1।

छोटे गाड़ी टकराथे, गाड़ी वाला गिर जाथे,
हाथ पाँव टूट जाथे, मुड़ फूट जाय जी।  
झन रफतार जाहू,गरुवा सड़क पाहू,
हारन बजाहू भले,घुँच नइ पाय जी।
कार बस टकराथे, जान गरुवा के जाथे,
कभू कभू बस कार, नरवा धँसाय जी।
जान ल बचाय बर, चलहू सम्हल कर,
हेलमेट पहिरे ओ, हुसियार ताय जी।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार 24-9-19

Sunday, 1 September 2019

हमर परिवार 3

दोहा-कथा कहँव रघुचन्द के,जिकर किसानी काम।
     माटी के सेवा करय,नइ पावय आराम।1।

चौपाई
जादा ओ पढ़ लिख नइ पाइन। खेती मा फिर हाथ बटाइन।
ब्याह रचाइन ओ फेकन ले। घर भर डारिन ओ अन धन ले।

मिहनत कस मजबूत किसनहा। भर्री भाँठा करदिस धनहा।
खेत खार मा जाँगर पेरय। बन कचरा ला दिनभर हेरय।

दुख रघुचन्द तको बिसरागे। छः छः लइका जब घर आगे।
आँगन मा किलकारी छा गे। देख खुशी बाँही छतरागे।

नाम बीरबल हावय बड़का। अउ रमेश हे दूसर लड़का।
तीसर नाम महेश धराये। तब धनेश छन्नू हर आये।

कुंती नाम बहिन इक राहय। दया मया मा सबझन चाहय।
बाल पने मा सरग सिधारे। दवा दुआ सब्बो जब हारे।

लइका मन ला खूब पढ़ाइन। पाँव खड़ा होना सिखलाइन।
हँसी खुशी ले ब्याह रचाइन। पाँच बहुरिया घर मा लाइन।

भरे भरे घर अँगना हावय। जइसन चाहिन तइसन पावय।
सीधा सादा हे जिनगानी। सुग्घर ओखर हवय कहानी।

दोहा-अबतक ओ मिहनत करे,हाड़ा हे मजबूत।
      टँग टँग रेंगत देख के,भाग जथे यमदूत।2।

हमर परिवार 2

दोहा-नाथू के लइका बड़े,रघुनन्दन हे नाम। 
    कतका बड़ परिवार हे, करत हवय का काम।1।
       
चौपाई
रघुनन्दन के होइस फेरा। जाने कोन समे का बेरा।
पर्रा मा दुलहन बइठारिन। धरे धरे भाँवर ला पारिन।

ओ लइका जल्दी बिसरागे। ऊपर वाला ला ओ भा गे।
फिर दूजा ले ब्याह रचाइन। सुकवारो ला घर ले आइन।

रघुनन्दन के किसमत जागे। देख नौकरी ओ हर पा गे।
बने ग्राम सेवक हे संगी। दूर करिन जे घर के तंगी।

रामायण सुग्घर ओ गाथे। बढ़िया पेटी तको बजाथे।
बीमारी तक दूर भगाथे। दवा पाय बर जे मन आथे।

रघुनन्दन देखव हरसागे। जब खुशहाली घर मा आगे।
चार पुत्र मारय किलकारी। आइन जग मा बारी बारी।

बड़का नाम नरेंद्र कहाइन। मँझला नाम विरेंदर पाइन।
अंतर मँझला रहे सुरेंदर। छोटे राम कुमारा सुंदर।

पालिन पोषिन सुख दे आगर। जइसे लहरा मारय सागर।
लइका मनके ब्याह रचाइन। चार बहुरिया घर मा लाइन।

दोहा-काम करत राहय जिहाँ,खेती डरिस सकेल।
    कोसमंदी ला छोंड़ के,बसगिन हवय भुकेल।2।

हमर परिवार 1

दोहा-रायसिंह के पुत्र दो,नाथू तातू नाम।
       भारी विपदा झेल के,पाइन हवय मुकाम।1।

चौपाई
नाथू तातू लइका राहय। देखे जेमन तेमन काहय।
हैजा आइस हावय भारी। छागे जिनगी मा अँधियारी।

दाई ददा ह सँघरा मरगे। घर कुरिया हर सुन्ना परगे।
तातू दूध पिये बर रोवय। रोवत रोवत ही ओ सोवय।

कका बड़ा मन उन ला पालिन। कहिथे माल सबो ला खा लिन।
भर भर कोठी धान सिरागे। मटिया लेगे हे कस लागे।

नाम सोनिया नाथू जोही। मनभौतिन तातू के होही।
कर बिहाव घर वापस आइन। सुग्घर जिनगी ला उन पाइन।

नाथू तातू घर किलकारी। लइका आइस बारी बारी।
तीन पुत्र दू पुत्री पागे। नाथू देखव तो हरसागे।

रघुनन्दन रघुचन्द कहाइन। अउ रघुवीर सखा कस पाइन।
झुनिया पुनिया राहय बहिनी। तिखर मया के अउ का कहिनी।

खोरबाहरा खोरबाहरिन । छोटे रामकृपाल रहे गिन।।
तीनो लइका तातू पावय। किलकारी ले घर भर जावय।

दोहा-नाथू तातू संग मा,करिन अबड़ हे काम।
     पढा लिखा लइका सबो,पाइन हवय आराम।2।