Tuesday, 30 June 2020

विधाता छंद

विधाता छंद 

1222 1222 1222 1222 

कभू तँय मोर आँगन मा, बरस जा रे घटा कारी। 
परे सुक्खा हवय कब ले, हमर घर खेत अउ बारी। 
फसल के आस मा बइठे, करे तइयार हँव खेती। 
मरत हे भूँख मुसुवा हा, निहारे आ तनिक येती। 

झुलस गे पेंड़ पौधा मन, सुरुज के ताप अइसे हे। 
भुला गे लोग मन जम्मो, घटा के रंग कइसे हे। 
दिखा दे रूप ला तँय हा, बता दे काम का हावय। 
बरस जा झूम के बादर, फसल सब सांस ले पावय। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

दुर्मिल सवैया

दुर्मिल सवैया 

112×8

करिया बदरा घिर आवत हे लगथे बरसा घनघोर करे। 

गरजे घुमड़े बिजुरी चमके कड़कावत ओ बड़ शोर करे।

नरियावत हे झिंगुरा मिचका बड़ शोर मचावत बोर करे।

पर देख भयानक रूप घटा दुबके रहिजौं मन मोर करे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

विधाता छंद

जवानी

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जवानी के कहानी मा , बुढापा टाँग मारत हे। 
न जाने कोन जीतत हे, न जाने कोन हारत हे। 
लड़कपन के कहानी ला, जवानी मार खाये हे। 
जवानी हार मत जावय, बुढापा तीर आये हे। 

चढ़ा के बाल मा रंगत, सजाये रूप ला भारी। 
जवानी छोड़ मत जावय, करत हे आज तइयारी। 
समे रोके कहाँ रुकथे, उदिम कतको करव भाई। 
ढहे घर जे रहे जुन्ना, मचे फिर खूब करलाई। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा  
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Saturday, 27 June 2020

लावणी छंद

लावणी छंद- दिलिप कुमार वर्मा
बिरह गीत
जबले भौजी गाँव गये हे, भइया बड़ पछतावत हे।
संझा बिहना उसर पुसर के,कुकरी बकरा खावत हे।

ओखर गम मा डूबे रहिथे,दारू ला पीयय भारी।
आनी बानी बना बना के,पीरा खाना हे जारी।

संगी मन सकलाये रहिथे,ओखर पीरा बांटे बर।
करुहा करुहा दारू पी थे,अउ मछरी रस चांटे बर।

सब झन देवत रहे दिलासा,भौजी जल्दी आ जाही।
जुरमिल पीरा ला हर लेबो,दारू तको सिरा जाही।

भइया थोरिक धीरज धरलव,गम तोरो दुरिहा जाही।
गोवा घूमे चल गा जाथन,उहचे पीरा मिट पाही।
 
दुनिया गम मा रहे अकेला,बिरहा बन पछताथे जी।
जब ले भइया बिरहा होगे, निसदिन मौज उड़ाथे जी।

कहिथे दुनिया जब पीरा हे, तब तँय मौज उड़ा ले जी।
गम मा गम के छोडव गाना,सुख के गाना गाले जी।

सुरता करथे रात रात भर,जाने भौजी कब आही।
दारू मुर्गा अभी उड़ावय, जाने कब पीये पाही।

गाज गिरे भइया के छाती,अतका पीरा होवत हे।
गम ला झेले दारू पी के,झर झर आँसू रोवत हे।

भइया के दुख दूर करे बर, सब संगी मन आवव जी।
दारू मछरी कुकरी बकरा,अउ चखना धर लावव जी।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

सार छंद

अकतरिया

अकतरिया ला अकती के दिन, दाई पहिर निकल गे।
खोजत हावय ददा भँदइ ला,भाग लगत हे छल गे।

खेत खार के उखरा माटी, पाँव छिला तक जाही।
काँटा खूटी पाँव गड़े ता, हाय हाय चिल्लाही।

करे किसानी जाना हावय, अकती के दिन आगे। 
बिना भँदइ के जाही कइसे, मोरो मन अकुलागे।

बेरा चढ़ही घाम सताही, काम कहाँ कर पाही।
अब तो मिल जा तहूँ भँदइया, ददा खेत मा जाही।

खोजत खोजत देख परिस जी, खूँटी रहे टँगाये। 
पहिर भँदइ ला चले ददा हर, मन ही मन हरसाये।

दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

चौपाई

नवतप्पा- दिलीप कुमार वर्मा
चैपाई
सुरुज कका आँखी देखावय।
अँगरा जइसन ओ ललियावय।
धरती जरथे तावा जइसन।
दिन ये आये हावय कइसन।

रुख राई के पाना झरगे।
खेत खार सब परिया परगे।
कांदी कचरा मन ललियागे।
हवा चले ता दुरिहा भागे।

तरिया डबरी नदिया झिरिया।
पानी दर्शन नइ हे किरिया।
मरे मेचका मछरी माढ़े।
ठुड़गा रुखुवा देखत ठाढ़े।

हरर हरर बस हवा चलत हे।
उखरा रेंगत पाँव जलत हे।
जीव दिखे नइ चारो कोती।
जाने कइसन आय पनोती।

जीव जगत ला पानी चाही।
जाने बदरा कब बरसाही।
ये नवटप्पा आग लगाथे।
बिन पानी कतको मर जाथे।

घर मा खुसरे राहव भाई। 
येमा सबके हवय भलाई।
झाँझ झकोरा लू ले बाँचव।
बरसा आही फिर सब नाचव।

नवतप्पा चर दिनिया होथे।
पर कतको जिनगी ला खोथे। 
बात साँच ये कहना मानव।
बाँचे खातिर नुसखा जानव।

अपन सुरक्षा आप करव जी।
पानी पीयव प्याज धरव जी।
गमछा बांधव मुड़ मा भाई।
नइ ते हो जाही करलाई। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

सावन गीत

रचना- दिलीप कुमार वर्मा

भोले जी के डमरू बाजे हैं डमा डम
चले हैं काँवरिया नाचे हैं छमा छम
अकड़ बम अकड़ बम 
अकड़ बम-बम बम-बम बम

नदिया के पानी धरे हे काँवर मा
भोले बाबा ल मनाये चले हैं सावन मा
पाँवे हे उखरा परत हे छाला रे
गेरुवा के बाना नरी में माला रे।
लइका अउ बुढ़वा कहाँ इहाँ हे कम
उही हर जाथे जेखर म हावय दम।
अकड़ बम अकड़ बम
अकड़ बमबम बमबम बम

सावन महीना मंदिर म मेला रे
भींड़ भगत के बाढ़े ठेली के ठेला रे।
सबो धरे हावय लोटा म पानी रे
फूल बेल पतिया हावय चढ़ानी रे।
बाजत हावय घण्टा कोई धरे न दम
बोले जयकारा बोले हैं बम बम
अकड़ बम अकड़ बम
अकड़ बमबम बमबम बम

भोले जी के डमरू बाजे हैं डमा डम

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

सावन गीत

रचना- दिलीप कुमार वर्मा

भोले बाबा ला मनाये चला जाबो
काँवर धर पानी भर के।
सावन महीना लगे पावन महीना
अपनो भाग जगाबो जगाबो
भोले बाबा ला

भोले बाबा भोला भाला
ओ भोला भंडारी हे।
अवघट दानी दान करत है
अब तो हमरो बारी हे।
चल नहला फूल पान चढाबो
चरनन माथ नवाबो नवाबो
भोले बाबा ला

बाबा के हे दूर नगरिया
पर झन तुम घबराहव जी।
हिम्मत करलव आस बंधा लव
तब तो दर्शन पाहव जी।
संगी साथी संग चलाचल
चल जयकार लगाबो लगाबो
भोले बाबा ला

पाँव पड़े छाला मत देखव
बस भोले के ध्यान धरव।
सुख दुख देने वाला भोले
बस भोले के नाम जपव।
अंतर यामी सब जानत हे
का दुख हम ह बताबो बताबो
भोले बाबा ला।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

लावणी छंद

लावणी छंद गीत

फिर से सावन आगे सजना,देख धरा तक हरियागे।
तँय नइ आये तोर दरस बिन,जग सुन्ना सुन्ना लागे।

सबो मनावय भोले बाबा,जल तो महूँ चढ़ावत हँव।
सबझन झोली भर ले जावय, मँय कइसे नइ पावत हँव।
खड़े दुवारी रसता जोहत,फिर से ये सावन आगे।
तँय नइ आये तोर दरस बिन,जग सुन्ना सुन्ना लागे।

बरसा के पानी ला पाके,धरती मजा उड़ावत हे।
हरियर हरियर घाँस उगा के,झूम झूम लहरावत हे। 
अंतस मोरो बरगे आगी,मन अँधियारी हा छागे।
तँय नइ आये तोर दरस बिन,जग सुन्ना सुन्ना लागे।

हमर परोसिन के नोनी हा,जे घर मा खेले आवय।
चल दिस हे ससुराल दुलौरिन,लइका धर मइके लावय।
आँखी मा सब देखत देखत,समे देख कइसे भागे।
तँय नइ आये तोर दरस बिन,जग सुन्ना सुन्ना लागे।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार30-7-2019

रोला छंद

रोला छंद 

बबा कहे जे बात, आज जम्मो सच होगे। 
पुरखा मनके ज्ञान, कोन रद्दा मा खोगे। 
कहाँ सियानी गोठ, आज पाबे सँगवारी। 
लइका मनके राज, काज बिगड़े बड़ भारी। 

घर मा हवय सियान, रखाये मूरत जइसे। 
चलय नही कुछ बात, बता बोलय वो कइसे।  
देखत वो रह जाय, गजब आये लाचारी। 
बिगड़त हे घर द्वार, समस्या हावय भारी 

कतको देत निकाल, छोड़ आश्रम मा आवय।   
घर मा रहे सियान, आज कतको नइ भावय।
बबा कहावय कोन, आज लइका नइ जानय। 
ददा कहे जे बात, कहाँ लइका अब मानय।

अब नइ मिलय सियान, रहय जे पहिली घर घर। 
बिन गलती औलाद,काँप जावय तब थर थर। 
राखय सब ला बांध, पिरोये सुमता डोरी।  
भरे रहय परिवार, घरो घर कोरी कोरी। 

अब तो नइ हे आस, पुराना दिन ओ आही।  
नाती पंथी संग, बबा हर कब रह पाही। 
जतका हे परिवार, आज सब एकल होगे। 
टूटत हवय समाज, मनुज करनी ला भोगे।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Thursday, 18 June 2020

लावणी छंद

लावणी छंद- दिलीप कुमार वर्मा 

राहु केतु बन पाक चीन हर, हमला बड़ डरव्हावत हे। 
भारत माँ ला लीले खातिर, चुपके चुपके आवत हे। 

पाक ग्रसे कश्मीर तरफ ला, मार ठहाका हाँसत हे। 
चीन ग्रसे लद्दाख डहर ला, भलुवा जइसन नाचत हे। 

धीरे धीरे देश लीलही, तइसन येमन लागत हे। 
हमर देश के मुखिया मन हर, काबर नइ तो जागत हे। 

डटे सिपाही सीमा राखे, अपनो जान गँवावत हे। 
बिना मिले आदेश बिचारा, काँही कर नइ पावत हे। 

एक बार आदेश मिलय ता, चटनी असन बना देही। 
बठवा चीनी चाँटत रइही, पापी पाक पना लेही। 

धरती पानी अउ अगास ले, बरसा बम गोला करही। 
बैरी मन ला पटक पटक के, कपड़ा सहीं निचो डरही। 

चीरत फाड़त रार मचावत, जब सेना आगू जाही। 
चीनी पाकी थरथर काँपत, कहाँ बतर भागे पाही। 

हमर देश के आन बान ला, बैरी मन ललकारे हे। 
अब तो जागव हिंदुस्तानी, बीस सिपाही मारे हे। 

दम खम जब दिखलाना हे तब, कफ़न बांध के काम करव। 
बीस सिपाही वो मन मारे, बीस लाख तुम मार डरव। 

हमर देश के पावन माटी, बैरी मन झन पाँव धरय। 
अइसन सबक सिखावव वोला,  दुस्साहस झन कभू करय। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Wednesday, 17 June 2020

त्रिभंगी छंद

त्रिभंगी छंद- दिलीप कुमार वर्मा

बादर हर छागे, बरसा आगे, बने चलत हे पुरवाही। 
अब सुरुज लुकागे, गरमी भागे, रुख़राई सब हरसाही। 
बरसत हे पानी, परवा छानी, खेत खार सब हाँसत हे। 
बाजत हे बाजा, लउकय आजा, दादुर कूदत नाचत हे।  

धर चलय नँगरिहा, टुकना चरिहा, धान भरे ले जावत हे।
जोंतत हे नाँगर, पेरत जाँगर, छेड़ ददरिया गावत हे। 
बइला सँगवारी, खाय तुतारी, अपन भाग सहरावत हे।  
हे सखा किसनहा, बोवय धनहा,काँधा अपन मिलावत हे।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Tuesday, 2 June 2020

सार छंद

सार छंद- दिलीप कुमार वर्मा 

दर्पण 

घर के भिथिया मा लटके तँय, जम्मोझन ल निहारे। 
बड़ा भाग मानी तँय दर्पण, सब ला तहीं सँवारे। 

चाहे छितका कुरिया घर हो, चाहे महल अटारी। 
आनी बानी रूप बनाये, रहिथच तँय सँगवारी।  

सबझन तोला झाँकत रहिथे, आके बारी बारी। 
करय सवाँगा देख देख के, घर के सब नर नारी।

रहे नाहनी कुरिया लटके, अउ सेलून सजाये।  
दाढ़ी छोलत बाल कटावत, देखत मन ला भाये। 

कपड़ा चश्मा के दुकान मा, काम बहुत तँय आये।  
कइसन फैसन सुग्घर दिखही, सब ला तहीं बताये। 

दू चकिया चर चकिया गाड़ी, जब तँय हा लग जाथच।  
बने तीसरा आँखी तँय हर, पाछू तको दिखाथच। 

रहे तहीं पनडुब्बी ऊपर, सब ले बने लुकाके।
तोर सहारा हमर सिपाही, बैरी मन ला ताके।

एक बार राजा दशरथ हर, तोला देखे राहय। 
अंतस मन ला झाँक डरिन अउ, राम राज ओ चाहय। 

कतको अंतस ला दिखलाले, अब मनखे नइ मानय।  
लीप पोत के करे बराबर, बस फैसन ला जानय। 

अपन काम करते रहना हे, चाहे झूठा मानय।  
साँच दिखाना काम हवय जी, तेला दर्पण जानय। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़