Tuesday, 2 June 2020

सार छंद

सार छंद- दिलीप कुमार वर्मा 

दर्पण 

घर के भिथिया मा लटके तँय, जम्मोझन ल निहारे। 
बड़ा भाग मानी तँय दर्पण, सब ला तहीं सँवारे। 

चाहे छितका कुरिया घर हो, चाहे महल अटारी। 
आनी बानी रूप बनाये, रहिथच तँय सँगवारी।  

सबझन तोला झाँकत रहिथे, आके बारी बारी। 
करय सवाँगा देख देख के, घर के सब नर नारी।

रहे नाहनी कुरिया लटके, अउ सेलून सजाये।  
दाढ़ी छोलत बाल कटावत, देखत मन ला भाये। 

कपड़ा चश्मा के दुकान मा, काम बहुत तँय आये।  
कइसन फैसन सुग्घर दिखही, सब ला तहीं बताये। 

दू चकिया चर चकिया गाड़ी, जब तँय हा लग जाथच।  
बने तीसरा आँखी तँय हर, पाछू तको दिखाथच। 

रहे तहीं पनडुब्बी ऊपर, सब ले बने लुकाके।
तोर सहारा हमर सिपाही, बैरी मन ला ताके।

एक बार राजा दशरथ हर, तोला देखे राहय। 
अंतस मन ला झाँक डरिन अउ, राम राज ओ चाहय। 

कतको अंतस ला दिखलाले, अब मनखे नइ मानय।  
लीप पोत के करे बराबर, बस फैसन ला जानय। 

अपन काम करते रहना हे, चाहे झूठा मानय।  
साँच दिखाना काम हवय जी, तेला दर्पण जानय। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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