Saturday, 27 June 2020

सार छंद

अकतरिया

अकतरिया ला अकती के दिन, दाई पहिर निकल गे।
खोजत हावय ददा भँदइ ला,भाग लगत हे छल गे।

खेत खार के उखरा माटी, पाँव छिला तक जाही।
काँटा खूटी पाँव गड़े ता, हाय हाय चिल्लाही।

करे किसानी जाना हावय, अकती के दिन आगे। 
बिना भँदइ के जाही कइसे, मोरो मन अकुलागे।

बेरा चढ़ही घाम सताही, काम कहाँ कर पाही।
अब तो मिल जा तहूँ भँदइया, ददा खेत मा जाही।

खोजत खोजत देख परिस जी, खूँटी रहे टँगाये। 
पहिर भँदइ ला चले ददा हर, मन ही मन हरसाये।

दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

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