Saturday, 31 August 2019

गजल

गजल
221 1222 221 1222
माटी के ये पुतला मन ,पथरा ल मनावत हे।
पूजा ल करे भारी,जाने का पावत हे।

भगवान कहाँ आही, बइमान हवय दुनिया।
जब काम परे तभ्भे,सुध देव के आवत हे।

गगरी म भरे पानी,कब तक ले बने रइही।
पर जाय उहाँ कीड़ा,जल जे न हटावत हे।

इनशान के दुनिया में,इनशान कहाँ मिलथे।
हैवान भरे जग मा,जन जन ल सतावत हे।

दुनिया म जे आये हे, ओ मर के रही इक दिन।
माया म फँसे जे हे, ओमन ह डरावत हे।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

सखी छंद

सखी छंद
जय होवय अब तीजा के।

तीजा के दिन हर आगे।
जीजा के मनवा जागे।
एस करे तइसे लागे।
जाने कोन डहर भागे।

दीदी ला सँग लाये हौं।
पर कुछ भाँपत आये हौं।
मन मा बात दबाये हौं।
नइ मँय बात उठाये हौं।

करे बहाना ओ जाही।
दारू मुर्गा ओ लाही।
संगी साथी मन आही।
अबड़ मजा जीजा पाही।

दीदी ला ओ डर्राथे।
आँखी देखे थर्राथे।
पीये बर बाहिर जाथे।
घर आये ले घबराथे।

अब तो रहे छहेल्ला हे।
घर तक पूरा हेल्ला हे।
पीयत रही ढकेल्ला हे।
छूटे गर के ठेल्ला हे।

रोज जमेटो ले आही।
आनी बानी के खाही। 
दीदी लाँघन रह जाही।
जीजा ओती मोटाही।

जय होवय अब तीजा के।
मरना नइ हे जीजा के।
दावत होही पीजा के।
घर जावत हँव जीजा के।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

सखी छंद

तीजा ले घर आये हे।
मुड़ मा सबो उठाये हे।
येती ओती धाये हे।
जे समान नइ पाये हे।

मजा उड़ाए हँव भारी।
अब चुप्पी के हे पारी।
चलत हवय ओखर आरी।
मोर शेरनी कस नारी।

अब तो गाय बनाही जी।
हाँव हाँव चिल्लाही जी।
जम्मो काम कराही जी।
निशदिन हुकुम चलाही जी।

जाने कब ओ दिन आही।
जे दिन ये मइके जाही।
तभे तराना मन गाही।
अंग अंग हर हरसाही।

हर महिना तीजा आवय।
भाई आके ले जावय।
तेन बात मोला भावय।

गजल

गजल
221 1222 221 1222
मँय तोर मया खातिर,आगी ले गुजर जाहाँ।
धुतकार भले कतको,मँय तोर करा आहाँ।

मँय धीर धरइया हँव,जल्दी न हवय मोला।
भँवरा के सहीं रइहँव,तब तोर मया पाहाँ।

अवकात भले नइ हे, दू जून के रोटी के। 
पर तोर मया पाये,मँय चाँद तको लाहाँ।

खेती हे न बारी हे, घर हे न दुवारी हे।
पर तोर रहे खातिर,मँय ताज ल बनवाहाँ।

गदहा के असन बोली,सुर बांस बजे फटहा।
अरमान जगाये बर,मँय गीत तको गाहाँ।

बस हाड़ बचे हावय, पर जान बचे हावय।
मन तोर लुभाये बर,मँय मार तको खाहाँ।

मजनू न बनँव मँय हा, मँय हीर तको नो हँव।
कलजुग के मयारू हँव,मँय मार के मर जाहाँ।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

घनाक्षरी

मनहरण घनाक्षरी - दिलीप कुमार वर्मा
तीजा तिहार
(1)
तीजा के तिहार आये, मन मोरो हरसाये,
भाई लेगे आही मोला, आँखी फरकत हे।
दाई ले मिलाप होही, खुसी मोरो बाप होही,  
छोटे बहिनी ल देखे, मन तरसत हे।
कब रतिहा पहाये, भाई मोरो घर आये,
मन तक अकुलाये, नींद न परत हे।
बेरा कहूँ होही भाई, जीव मोर छूट जाही,
जलदी से आजा लेगे,  जिवरा बरत हे।

(2)
सबो सँगवारी आही, पोरा धर भाँठा जाही,
आनी बानी बतियाही, भाई अब आव रे।
बेरा हा चढ़त हावे, मन हा ढरत हावे,
आँखी भर आये झन, सूरत दिखाव रे।
आशा मोरो टूटे झन, मन मोरो रूठे झन,
रसता निहारत हौं, झन खाना भाव रे।
बदला ते झन लेना, माफ मोला कर देना,
झगरा ओ बचपन, आज भूल जाव रे।

(3)
भाई भाई घर आगे, आँखी देख भर आगे,
खुशी के ये आँसु मोरो, रोके ना रुकत हे।
महूँ तीजा माने जाहूँ, सखी सँग मिल आहूँ,
सोंच सोंच हिरदे हा, देख सुसकत हे।
लागे मोरो पाँख जागे, भाई जब घर आगे,
मनवा अगास उड़े, दुनिया झुकत हे।
काम में न मन लागे, दुख सबो बिसरागे,
मन मा उमंग छागे, पाँव थिरकत हे।

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार (छत्तीसगढ़)

Sunday, 4 August 2019

गीत

सुन सजना सावन आगे,देख धरा तक हरियागे।
तँय नइ आये तोर दरस बिन,घर सुन्ना सुन्ना लागे।

भोले बाबा सबो मनावय,जल तो महूँ चढ़ावत हँव।
सबझन झोली भर ले जावय, मँय कइसे नइ पावत हँव।
खड़े दुवारी रसता जोहत,फिर से ये सावन आगे।
तँय नइ आये तोर दरस बिन,घर सुन्ना सुन्ना लागे।

बरसा के पानी ला पाके,धरती मजा उड़ावत हे।
हरियर हरियर घाँस उगा के,झूम झूम लहरावत हे। 
अंतस मोरो बरगे आगी,मन अँधियारी हा छागे।
तँय नइ आये तोर दरस बिन,घर सुन्ना सुन्ना लागे।

हमर परोसिन के नोनी हा,जे घर मा खेले आवय।
चल दिस हे ससुराल दुलौरिन,लइका धर मइके लावय।
आँखी मा सब देखत देखत,समे देख कइसे भागे।
तँय नइ आये तोर दरस बिन,घर सुन्ना सुन्ना लागे।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार30-7-2019

चौपई

जयकारी छंद - दिलीप कुमार वर्मा

आय हरेली के त्यौहार,हरियर दीखय खेती खार।
बइठ सगा झन तँय मन मार,मिहनत नइ होवय बेकार।

नाँगर रपली राँपा लान,जेन भरोसा बोये धान।
धो के फूल चढावव जान,पूजव येला देव समान।

गुरहा चीला बने बनाव,सब अवजार म भोग लगाव।
श्रद्धा के अंतस रख भाव,सबझन सुग्घर आशिष पाव।

गरुवा बर तँय आंटा सान, अउ खम्हार के ले आ पान।
नून डार लोंदी तँय लान,गरुवा खाही अमरित जान।

जंगल के कांदा दशमूल, बने पकावव रख के चूल।
सबो खवावव हो झन भूल,गरुवा के मिटही सब सूल।

रो रो लइका करय अलाप,ओखर बर तँय गेंड़ी खाप। 
रचरिच रचरिच करही जाप,चिखला के नइ पावय ताप।

नोनी बाबू खुडवा खेल,मल्ल युद्ध कस पेलम पेल।
फुगड़ी खोखो बिल्लस ठेल, आही देखे रेलम रेल।

छत्तीसगढ़ के हरे तिहार,जेमा खुशियाँ हे भरमार।
जुरमिल रहिथे सब नर नार, जानय अब येला संसार।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ

गजल

221 2122 221 2122

मनखे अजीब हावय,जाने कहाँ ले आथे। 
हपटत रहे मरत ले,मरथे तभेच जाथे।

कुकरा रिसाय हावय, नइ हे हमर पुछारी।
सूते रहे जवनहा, बज के घड़ी जगाथे

गरमी म सब पियासे, पीये मिले न पानी।
बरसात के महीना, पानी सबो बहाथे।

नदिया ल बाँध डारव, तरिया बनाव भाई।
पानी करव इकट्ठा,गरमी म काम आथे।

बखरी गड़े बबा हा,कोड़त हवय ग बारी।
गोभी पताल भाटा, घर मा तभेच पाथे। 

घर मा कुकुर बँधाये,गरुवा रहे सड़क मा।
जइसन मिले न खाना,तइसन कुकुर ह खाथे।

काबर दिलीप सोंचे, दुनिया के काय होही।
देखत हवय विधाता,सब ला उही नचाथे।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार