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मनखे अजीब हावय,जाने कहाँ ले आथे।
हपटत रहे मरत ले,मरथे तभेच जाथे।
कुकरा रिसाय हावय, नइ हे हमर पुछारी।
सूते रहे जवनहा, बज के घड़ी जगाथे
गरमी म सब पियासे, पीये मिले न पानी।
बरसात के महीना, पानी सबो बहाथे।
नदिया ल बाँध डारव, तरिया बनाव भाई।
पानी करव इकट्ठा,गरमी म काम आथे।
बखरी गड़े बबा हा,कोड़त हवय ग बारी।
गोभी पताल भाटा, घर मा तभेच पाथे।
घर मा कुकुर बँधाये,गरुवा रहे सड़क मा।
जइसन मिले न खाना,तइसन कुकुर ह खाथे।
काबर दिलीप सोंचे, दुनिया के काय होही।
देखत हवय विधाता,सब ला उही नचाथे।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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