Sunday, 4 August 2019

गजल

221 2122 221 2122

मनखे अजीब हावय,जाने कहाँ ले आथे। 
हपटत रहे मरत ले,मरथे तभेच जाथे।

कुकरा रिसाय हावय, नइ हे हमर पुछारी।
सूते रहे जवनहा, बज के घड़ी जगाथे

गरमी म सब पियासे, पीये मिले न पानी।
बरसात के महीना, पानी सबो बहाथे।

नदिया ल बाँध डारव, तरिया बनाव भाई।
पानी करव इकट्ठा,गरमी म काम आथे।

बखरी गड़े बबा हा,कोड़त हवय ग बारी।
गोभी पताल भाटा, घर मा तभेच पाथे। 

घर मा कुकुर बँधाये,गरुवा रहे सड़क मा।
जइसन मिले न खाना,तइसन कुकुर ह खाथे।

काबर दिलीप सोंचे, दुनिया के काय होही।
देखत हवय विधाता,सब ला उही नचाथे।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

No comments:

Post a Comment