Thursday, 18 July 2019

रूपमाला छंद

बरसात

कोन जाने कब हवा हर,मोर कोती आय।
संग मा करिया घटा के,हाथ धर के लाय।
कब गरज दय घड़ घड़ाघड़, कब चमक चमकाय।
मोर जिवरा ला बुझादय,झूम के बरसाय।

देख के करिया घटा ला,बाढ़ गे कुछ आस।
ये हवा लहरात हावय,आज हे कुछ खास। 
झूम के बरसा बरसही,आय तभ्भे साँस।
चार दिन जे बेर होही,हो जही सब नाँस।

खेत मा उखरा गड़त हे, फाट गे दनगार।
धान मन बाती बराये, लाल होगे खार।
पर किसनहा रात दिन,जोहत हवय आगास।
आज नइ ते काल गिरही,मन रखे हे आस।

रे हवा अब तँय बतादे,होय कब बरसात। 
रासता जोहत सबो के,बीत गे कइ रात।
तँय सवारी अस घटा के,चढ़ तुही मा आय।
एक घानी लान येती, झूम के बरसाय।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

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