सार छंद
जाने कोन डहर चलदिस हे, ये बरसा के पानी।
उमड़ घुमड़ गरजत ललचाइस, छा गे रहिस जवानी।
धान बुवाई सब कर डारिन,धनहा डोली भर्री।
पानी नइ गिरही ता संगी,बन जाही सब दर्री।
हवा चलत हे सुरसुर सुरसुर,फुरहुर तन हा लागे।
हो जावय पानी के बरसा,तभे भाग हर जागे।
निच्चट देख निटोर दिए हे, जाने अब का होही।
खेत खार उखरा गड़ही अउ,धरती दाई रोही।
सावन के महिना आवत हे,सुख्खा नदिया नरवा।
काँवरिया पानी नइ पावय,जर जाही अब तरवा।
भोले बाबा मारे गरमी, ताण्डव नाच दिखाही।
हाहाकार मचे धरती मा, सब के बया भुलाही।
धरती दाई तको पुकारे,हे बरसा तँय आजा।
तन मन रूखा सूखा होगे, अब तो प्यास बुझा जा।
लइका मन सब रोवत हावय,देखत हे मुँह फारे।
करिया बदरा अब तो आजा,पानी तँय बरसा रे।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार 12-7-2019
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