Sunday, 15 March 2020

निधि छंद

निधि छंद 

ये गरब गुमान। करथे नुकसान। 
कहना अब मान। कहिथे ग सियान। 

सुमता म चलाव। सब संग बलाव। 
राखव अब ध्यान। मनखे पहिचान। 

धन काम न आय। अपने बिसराय। 
लालच जब छाय। अपने ल लड़ाय। 

रिसता ल निभाव।सब काम बनाव। 
जिनगी सुघराव। अबड़े सुख पाव। 

मधुरस कस बोल। सुख के रस घोल। 
अपने ल टटोल। कर झन तँय झोल। 

रहिबे जब साथ। आही सब हाथ। 
निहरा अब माथ। हो जबे सनाथ। 

दिलीप कुमार वर्मा

Friday, 13 March 2020

लावणी

लावणी छंद कोरोना 

अबड़ तपत तँय हवच करोना, ये धरती मा आके तँय। 
कइसे अड़बड़ बाढ़त हावच, गीला मौसम पाके तँय। 

सर्दी खाँसी तको बढ़ाये, अउ बुखार तन मा लाये। 
स्वांस क्रिया मा बाधा लाके, पूरा तन भर तँय छाये। 

एक जघा ले दुसर जगा तँय, छूत बरोबर आ धमके। 
जेन जगा मा भीड़ भांड हे, तेन जगा मा तँय चमके। 

हाथ मिलाना भारी परगे, पूरा तन अधिकार करे। 
आज आदमी एक दुसर ले, बात करे बर तको डरे। 

हमरो दिन आही कोरोना, ओ दिन तोला बतलाबो। 
मच्छर जइसे मसल मसल के, बहुत बहुत हम सुख पाबो। 

तोर असन ला भूंज भाँज के, चटनी तको बना देबो। 
एक बार गर्मी आवन दे, गिनगिन के बदला लेबो। 

दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार