निधि छंद
ये गरब गुमान। करथे नुकसान।
कहना अब मान। कहिथे ग सियान।
सुमता म चलाव। सब संग बलाव।
राखव अब ध्यान। मनखे पहिचान।
धन काम न आय। अपने बिसराय।
लालच जब छाय। अपने ल लड़ाय।
रिसता ल निभाव।सब काम बनाव।
जिनगी सुघराव। अबड़े सुख पाव।
मधुरस कस बोल। सुख के रस घोल।
अपने ल टटोल। कर झन तँय झोल।
रहिबे जब साथ। आही सब हाथ।
निहरा अब माथ। हो जबे सनाथ।
दिलीप कुमार वर्मा