Sunday, 15 March 2020

निधि छंद

निधि छंद 

ये गरब गुमान। करथे नुकसान। 
कहना अब मान। कहिथे ग सियान। 

सुमता म चलाव। सब संग बलाव। 
राखव अब ध्यान। मनखे पहिचान। 

धन काम न आय। अपने बिसराय। 
लालच जब छाय। अपने ल लड़ाय। 

रिसता ल निभाव।सब काम बनाव। 
जिनगी सुघराव। अबड़े सुख पाव। 

मधुरस कस बोल। सुख के रस घोल। 
अपने ल टटोल। कर झन तँय झोल। 

रहिबे जब साथ। आही सब हाथ। 
निहरा अब माथ। हो जबे सनाथ। 

दिलीप कुमार वर्मा

No comments:

Post a Comment