लावणी छंद
मोर ब्यथा ला सुन सब हाँसे, अउ का जोक सुनाहूँ जी।
मोर देह के सुंदरता ला, जेला मँय बतलाहूँ जी।
देह भयंकर हाथी जइसे, पेट भिंदोल कहाये हे।
गुड़गुड़ गुड़गुड़ करे रातदिन, जाने काय भराये हे।
समे तको ला ये नइ जानय, पड़वा जइसे नरियाथे।
लाज तको नइ आवय कहिके, गारी देवत सब जाथे।
कुछ मन हाँसत रहिथे खुलखुल, बजे शंख कस भारी जी।
ओ का जानय मोर देह के, कइसन हे लाचारी जी।
कुरता पहिरँव बटन लगे नइ, पेंट बोचकत जावत हे।
अइसन होगे पेट मोर की, कनिहा तको गँवावत हे।
हाथ पाँव पीपर कस गोला, मुंडी लगे सुपाड़ी जी।
आँखी खुसरे चीनी जइसन, नाक कान जस काड़ी जी।
लइका ला दिखला के कहिथे, हाथी वो दे आवत हे।
बिना सूंड़ के धम्मस धम्मस, कइसे चाल दिखावत हे।
तहीं बता अब काय करँव मँय, अइसन भारी काया के।
गढ़े विधाता कइसन मोला, दानव जइसन माया के।
लोगन कहिथें चटर पटर अउ, मुर्ग मुसल्लम ला छोंड़व।
सादा खाना मटका पानी, योगा ले नाता जोड़व।
तहीं बता अइसन खाना ले, मोर असन का जी पाहूँ।
येखर ले अच्छा हे भइया, हाथी रहिते मर जाहूँ।
रचनाकार-- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़