Monday, 31 August 2020

लावणी छंद

लावणी छंद 

मोर ब्यथा ला सुन सब हाँसे, अउ का जोक सुनाहूँ जी। 
मोर देह के सुंदरता ला, जेला मँय बतलाहूँ जी। 

देह भयंकर हाथी जइसे, पेट भिंदोल कहाये हे। 
गुड़गुड़ गुड़गुड़ करे रातदिन, जाने काय भराये हे। 

समे तको ला ये नइ जानय, पड़वा जइसे नरियाथे। 
लाज तको नइ आवय कहिके, गारी देवत सब जाथे। 

कुछ मन हाँसत रहिथे खुलखुल, बजे शंख कस भारी जी। 
ओ का जानय मोर देह के, कइसन हे लाचारी जी। 

कुरता पहिरँव बटन लगे नइ, पेंट बोचकत जावत हे। 
अइसन होगे पेट मोर की, कनिहा तको गँवावत हे। 

हाथ पाँव पीपर कस गोला, मुंडी लगे सुपाड़ी जी। 
आँखी खुसरे चीनी जइसन, नाक कान जस काड़ी जी। 

लइका ला दिखला के कहिथे, हाथी वो दे आवत हे। 
बिना सूंड़ के धम्मस धम्मस, कइसे चाल दिखावत हे। 

तहीं बता अब काय करँव मँय, अइसन भारी काया के। 
गढ़े विधाता कइसन मोला, दानव जइसन माया के।  

लोगन कहिथें चटर पटर अउ, मुर्ग मुसल्लम ला छोंड़व। 
सादा खाना मटका पानी, योगा ले नाता जोड़व। 

तहीं बता अइसन खाना ले, मोर असन का जी पाहूँ। 
येखर ले अच्छा हे भइया, हाथी रहिते मर जाहूँ। 

रचनाकार-- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

बाल गीत

बाल गीत 

पहले सब के नाना नानी। 
कहती थीं हर रोज कहानी। 

दादी दादा भी कहते थे। 
जब सब मिलजुल कर रहते थे।   

पापा पापा बात बताओ। 
दादी को अपने घर लाओ। 

मम्मी मम्मी कहो कहानी। 
या फिर घर ले आओ नानी। 

क्यों मोबाइल से हम खेलें। 
बोलो टीवी को क्यूँ झेलें।

खेल खिलौने हम खेलेंगे। 
दादी नानी हम ले लेंगे।

हमे कहानी ही सुनना है। 
सुंदर सपनों को बुनना है। 

रचनाकार--दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

बाल गीत

बाल गीत 

बादर करिया घिर आये हे। 
अँधियारी जग मा छाये हे। 

चिड़िया डर के भागत हावय। 
घुघवा तक हर जागत हावय।  

माल मवेसी घर आवत हे। 
सुनव कोलिहा नरियावत हे। 

मेढ़क तक टर्राये लागिस। 
झिंगुरा गीत सुनाये लागिस। 

घड़-घड़  बादर गरजावत हे।
जम्मो झन ला डरह्वावत हे। 

चमक-चमक के बिजुरी चम-चम। 
फोटो खींचत हावय झम-झम। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Sunday, 30 August 2020

लावणी छंद

लावणी छंद 

कभू जवानी इहों रहिस हे, जिहाँ बुढापा छाये हे। 
कसे कसे सूरत मा अब तो, झुर्री अबड़ छबाये हे। 

करिया बादर रहिस मुड़ी मा, उहू तको पतराये हे। 
उत्तर दक्षिण अउ पश्चिम मा, घटा सबो तिरियाये हे। 

जतका करिया रहिस घटा सब, सादा होवत जावत हे। 
कतको मारँव पेंट तभो ले, जम्मो बाहिर आवत हे। 

साठ किलो के अस्सी होगे, लागत तन हे बड़ भारी। 
पेट बने लम्बोदर जइसे, लगे भयंकर बीमारी। 

चलना तक अब दूभर होगे, बइठे कुर्सी टोरत हँव। 
हाथ पाँव हाथी कस लागे, करम ठठा मुँड़ फोरत हँव। 

बीपी शूगर बाढ़त हावय, चलत साँस हर फूल जथे। 
श्वसन क्रिया तक लगे थकासी, कनिहा तक हर झूल जथे। 

ब्याम करव सब ला मँय कहिथौं, पर खुद से नइ हो पावय। 
कहाँ होय अनुलोम विलोम ह, बिहना उठना नइ भावय।

खाना पीना आधा होगे, तब ले तन नइ टोरत हे। 
बइठे ठलहा लम्बोदर कस, मुँह बस लाई फोरत हे। 

रचनाकार-- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Saturday, 22 August 2020

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

 बहरे कामिल मुसम्मन सालिम 
मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन 

11212  11212 11212  11212 

कती गे रहेच बता सगा बड़ा बेर मा ते ह आत हच।   
का मिले हवय ते बता सगा मुँ मा दाब कइसे ग खात हच।

जगा कोन मेर जे गे रहे बड़ा सोंच मा तें दिखे सगा।
धँ इहाँ करे धँ उहाँ करे अभी आय हच अभी जात हच। 

ददा के कहे कभू बात ला बने सोंच के तें हा देख ले।  
कहे पर के बात ल मान के ते का पाय अउ ते का पात हच।

पता नइ चले ये हा सोंच ये सबो जानथे करे तोर जी। 
लगे हे उहाँ जे मशीन हे ओ ह देखथे का लुकात हच । 

कती बर लुकाके धरे हवच न ते सोंच की ओ न जानही
खुले नइ रहे भले मोटरी ओ ह जानथे का ते लात हच। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

सवैया

मत्तगयन्द सवैया 

हे गणराज सुनो बिनती मझधार फँसे हँव पार करो जी। 
तोर बिना अब जीवन के रसता न दिखे उपचार करो जी। 
मानत हौं दुख मा सुमिरौं सुख मोर हरे मत रार करो जी। 
जीवन नाव हिलोरत हे अब थाम बने उपकार करो जी। 

मदिरा सवैया

आवत हौ सुनथौं धरती तुम मूषक वाहन मा चढ़ के। 
जोहत हे रसता सब तो घर तोर इहाँ बढ़िया गढ़ के। 
हे गणराज दवा धर लानव काम करौ अपने बढ़ के। 
देख बिमार हवे सब भक्त बने करदौ कुछ तो पढ़ के।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Thursday, 20 August 2020

छन्न पकैया

छन्न पकैया 

छन्न पकैया छन्न पकैया, लइका पन के खेला। 
भौरा बाँटी गिल्ली डंडा, कोहा मेली मेला। 

छन्न पकैया छन्न पकैया, खेल रेस टिप आजा। 
पैरा कुरिया चढ़े पठउँहा, गोड़ा तरी लुकाजा। 

छन्न पकैया छन्न पकैया, पिट्ठुल गजब सुहावय। 
खपरा ऊपर खपरा राखे, मारत पुक छरियावय। 

छन्न पकैया छन्न पकैया, ओ डंडा पचरंगा। 
डण्डा ला डण्डा ले मारे, खेल बड़ा हे चंगा। 

छन्न पकैया छन्न पकैया, धर के गड्डी जाना। 
गली गली मा दउड़त रहना, साँझ ढले घर आना। 

छन्न पकैया छन्न पकैया, गरमी बइठ बितावय। 
तीरीपासा तिग्गा गोंटा, खेल भोटकुल भावय। 

छन्न पकैया छन्न पकैया, चिखला के दिन आगे। 
छड़ा गड़उला बंगाला अउ, गेंड़ी गजब मचागे। 

छन्न पकैया छन्न पकैया, तरिया भरजय भारी। 
दउड़ दउड़ के कूद लगाना, पार लगाना जारी। 

छन्न पकैया छन्न पकैया, खेल कबड्डी खोखो। 
नून तेल बिल्लस सुर रस्सी,रंग बिरंगा चोखो। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Wednesday, 19 August 2020

श्रृंगार छंद

श्रृंगार छंद 

छमक छम पायल के हे शोर। 
निकल के रेंगय गोरी खोर। 
टुरा मन के मन उठे हिलोर। 
करेजा मारन लागे जोर। 

दाँत मोती जइसन चमकाय। 
रूप ला चंदा जस उजराय।  
आँख मा काजर सुघर अँजाय।
बने बेनी नागिन लहराय।  

कमरिया लचकावत बलखाय। 
होठ ले मंद मंद मुसकाय।  
सरम के घूँघट दे हे डार।  
झाँक के देखत हे संसार।

मचल जय जे देखय इक बार। 
टपक जावत हे सब के लार। 
उमरिया बाली पर बलखाय। 
सबो ला चाल म अपन रिझाय। 

सबो के मन मा हे अहसास। 
मिले के राखे हावय आस। 
सबोझन आथें रख विश्वास। 
नजर काखर बर होही खास। 

गाँव के गोरी हर ये जान। 
समझबे येला झन नादान। 
बना के ऊल्लू दिही घुमाय। 
दिखावा थोरिक ये नइ भाय। 

भरे नखरा के हवय खदान। 
मगर रेंगत हे बन अनजान। 
लड़कपन जइसे ओ इठलाय। 
गली मा रेंगत जब भी जाय।

समझ भोली झन आबे तीर। 
नही ते देही इज्जत चीर।
गाँव के गोरी ये पहिचान। 
तान के थपरा देही मान। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

 

Monday, 17 August 2020

बाल गीत चाटी


चाटी के रेला आवत हे। 
कोन जनी काहाँ जावत हे। 

संग संग तँय चल रे मोनू। 
पता चले ये का खावत हे। 

इंजन जइसे एक चलत हे। 
डब्बा कस चल का पावत हे। 

मुँह मा काये सबो दबाये।
जाने ये सब का लावत हे। 

रँधनी खोली मा खुसरत हे। 
का इहँचे सबके दावत हे?

चाटी खाना जानय मोनू। 
गुड़ शक्कर अबड़े भावत हे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

दोहा

दोहा 

हाड़ मास ले तन बने, ईंटा गारा जान। 
जइसे ढहे मकान हर, तइसे मरण समान।1।

का लेके आये रहे, जाबे का धर साथ। 
धन दौलत इंहचे रहे, जाबे खाली हाथ।2।

पाँच तत्व के मेल ले, हो काया निर्माण। 
अपन अपन मा लीन हो, उड़ जाथे जब प्राण।3। 

मर के जाथे जीव सब, जेन जगा ले आय।
जइसे बरसे जल सबो, सागर मा मिल जाय।4। 

आज उँखर बारी हवय, काली बारी  मोर। 
कोन अमर हावय इहाँ, परसों बारी तोर।5।

लइका ले बुढुवा सबो, जे दुनिया मा आय। 
मरना तो निश्चित हवय, बारी बारी जाय।6।   

मोर मरे ले कोन हर, रोही भला बताव। 
सब स्वारथ के प्रेम ये, रोना रहे दिखाव।7। 

बेटा रोथे बाप बर, कोन करे अब काम। 
सब्बो जिम्मा मोर हे, नइ पाहूँ आराम।8।

जे दिन बेटा हर मरे, बाप जोर से रोय। 
लाठी टूटे हाथ के, कहाँ गुजारा होय।9।

बाई दुनिया छोड़ के, चलदिस हे परलोक।  
दूसर बाई लान लय, पति कब करथे शोक।10।

पति जब सरग सिधार लय, बाई करत विचार। 
सबो सवाँगा छूट गय, बिरथा हे संसार।11।

जतके स्वारथ मा जुड़े, ततके ततके रोय। 
बिन स्वारथ बिंदास हे, अंतस कुछ नइ होय।12 

बुढ़वा बुढ़िया के मरे, कोनो हर नइ रोय। 
बने करिस चलदिस कहे, धरती बोझा होय।13।

लइका जब मरजाय तब, बाप तको पगलाय। 
सपना चकना चूर हो, रोवय करम ठठाय।14। 

एक सखा अइसे रहे, बिन स्वारथ संताप। 
लेन देन कुछ ना रहे, फिर भी करे विलाप।15। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Saturday, 15 August 2020

श्रृंगार छंद

श्रृंगार छंद 

फहर गे झंडा चारो ओर। 
अजादी के गूँजत हे शोर। 
पताका अम्बर मा लहराय। 
देख के मनवा खुसी मनाय। 

मोर अंतस मा उठे हिलोर। 
करेजा मारत हावय जोर। 
लगत हे अब्भी दउड़त जाँव। 
चीन ला जा के मजा चखाँव। 

बने ब्यापारी भीतर आय। 
पाँव चारो कोती फइलाय। 
बेंच के सस्ता हमला माल। 
चले हे चीनी मन हर चाल। 

इहाँ के बोरिस हे ब्यापार। 
करिन ब्यापारी ला लाचार। 
अपन मनमानी खूब चलाय। 
हमर ले बहुँते माल कमाय। 

करे अँगरेजन मन जे हाल। 
आज चीनी के हावय चाल।   
सिपाही भीतर तक ले आय। 
गुलामी फिर से झन आ जाय। 

सुनव रे संगी होजव एक। 
बात मँय आज कहत हँव नेक। 
त्याग दव चीनी के सामान। 
मुसीबत घर मा अब झन लान। 

विरोधी भाखा ला दव छोंड़। 
दिशा सोंचे के अब दव मोड़। 
करव सब शासन ला मजबूत। 
एकता के दव सबो सबूत। 

सिपाही तब होही बलवान।  
डरे नइ अपन लुटाये जान।
बचाही हमर देश के मान।  
तिरंगा फहर दिखाही शान। 

गूँजही भारत के जय कार। 
चीन तब जाही हम ले हार।  
दुबारा कर नइ पाही वार। 
देश हमरो होही दमदार। 

आज के दिन सब कसम उठाव। 
सबो भारतवासी कहलाव।  
अनेको हावय हमरो रंग।
रहन पर भाई चारा संग।  

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़




श्रृंगार सवैया संग


यशोदा घर गोपी मन आयँ। 
कन्हैया के करनी ल बतायँ। 
सुनावैं लल्ला के उत्पात। 
यशोदा थोरिक नइ पतियात। 

यशोदा सुन ले लल्ला तोर।  
करे नुकसान घघरिया फोर। 
चुरा के माखन ला ओ खाय। 
फोर के घघरी ओ हर आय।

अब गोपिन बात हमार सुनौ तुम झूठ शिकायत नाहि करौ।  
हमरो ललना बड़ छोटन हे तुम फोकट चोर न नाम धरौ।
ललना घर माखन खावत हे बिन फोकट ना तुम कान भरौ। 
लबरी लबरी तुम गोपिन हौ तुरते मुख टारत भाग टरौ। 

कन्हैया हावय कहाँ बताव। 
अभी ओला आघू मा लाव।  
पूछ ले ओखर ले सब बात। 
चोर हे तब्भे देख लुकात। 

लबारी नोहय सच तँय मान। 
कन्हैया ला थोरिक पहिचान। 
बड़ा नटखट होगे हे जान। 
पूछ ले धर के ओखर कान। 

सुन रे ललना इन गोपिन हा कुछ तोर शिकायत आय कहे।  
तुम फोरत हौ घघरी मटका अउ माखन खावत धाय कहे। 
सच बात कहौ नहिते सुन लौ करनी कर दण्ड ल पाय कहे। 
मुख माखन तोर लगे कइसे किसना अब साँच बताय कहे। 

बतावँव सुन ले मइया मोर। 
कहे सब मोला माखन चोर। 
भला मँय काबर बता चुरावँ। 
खाय जब माखन घर मा पावँ 

शिकायत जम्मो हे बेकार। 
सबो झन मोला करथे प्यार। 
मया के खातिर सबझन आय। 
बात मा तोला सब बिलमाय। 

अब तो सब जान डरे हव की किशना हर माखन ला नइ खाये। 
घघरी तक फोर सके नइ ये फिर काबर झूठ  कहे बर आये। 
समझावत हौं फिर से तुम ला तुँहरो करनी हमला नइ भाये।  
फिर झूठ कहे बर आहव ता भगवान तको तुम ला न बचाये। 

चलव री ये तो नइ पतियाय। 
मया के पट्टी आँख बँधाय। 
करे जे किशना हर ये बार। 
बाँध के रस्सी रखबो डार। 

दिखाबो किशना के करतूत। 
मानही तब्भे देख सबूत। 
किशनवा देखे अउ मुसकाय। 
गोप गोपी खिसियावत जाय। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़


श्रृंगार छंद


पढ़े बर लइका हर नइ आय।  
खेल खेलत ओ दिन ल बिताय।
ददा दाई के चल नइ पाय।  
गुरूजी कइसे भला पढाय। 

धरे बसता जावत हे रोज। 
जाय ओ नदिया कोती सोज। 
करत हे मछरी घोंघी खोज। 
इहाँ सब लइका मन के फ़ौज।  

तभो ले लइका होगे पास। 
भले तँय नइ करबे बिसवास।  
पढ़ाई होगे सत्यानास। 
नियम ये आये जब ले खास।  

कभू लइका ला झन तँय मार। 
बात मा तक तँय झन फटकार। 
नही ते हो जाबे लाचार। 
सजा मिल जाही सुन ले यार।

गुरूजी निच्चट हे मजबूर। 
रहत हे लइका मन ले दूर। 
भराये ऊर्जा हे भरपूर। 
मगर सब होगे चकना चूर।

बता अब कइसे होही हाल। 
समस्या होगे हे बिकराल।  
पढ़ाना अब होगे जंजाल। 
गलत नइ हावय काखरो दाल। 

छहेल्ला लइका खेलय खोर। 
गुरूजी होवत हावय बोर। 
सबो लइका मन होगे ढोर। 
नियल ला अब तो देवव छोर।  

गुरूजी नोहय रकसा जान। 
पढ़ाई सिरतो होही मान।  
गुरू ला थोरिक तो पहिचान।
करइया शिक्षा के ओ दान।  

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

श्रृंगार छंद


रात के चंदा हावय गोल। 
तनिक ओ गोरी कुछ तो बोल। 
रिसाये झन रइ तँय चुपचाप। 
सोंच के बाढ़य अंतस ताप। 

करेजा मोरो मत फट जाय। 
मनावत जान हलक मा आय। 
बता का होये हावय बात। 
मनावत झन बीतय जी रात। 

टीटही आके करे पुकार। 
कहत हे मोला झन तँय हार। 
चँदैनी आसमान मा छाय। 
संग ओ मोला दे बर आय। 

कहे तोला हावय का कोन ?  
बता दे नाम कहे कुछ जोन। 
अभी देहूँ ओला फटकार।  
मान जा अब तो तँय हर यार। 

बता का लुगरा के हे चाह।  
धरा दँव मइके के का राह। 
सोन के लेबे का तँय हार।  
बोल गोरी अब तो मुह फार। 

कहूँ जाये के हवय विचार। 
दिखा के लाहूँ सब संसार। 
तनिक लादे गोरी मुस्कान। 
हलक मा अटके हावय जान। 

देख ले सुकुवा तक हर आय।  
मनावत रतिहा सबो पहाय। 
पिला दे गोरी अब तो चाय। 
मोर ले कुछ अब कहा न जाय।  

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़



श्रृंगार छंद

देव दानव के होथे मेल। 
करे हे जेमन भारी खेल। 
मथे सागर ला मिलके जान।   
करे ओ पूरा हे अरमान। 

मथानी बनगे हवय पहाड़। 
बीच सागर मा देइस गाड़। 
बड़े रस्सी के  राहय चाह।
वासुकी नाग निकालिस राह। 

देवता पुछी डहर तिरियाय। 
खड़े दानव मुँह कोती जाय।  
खींच थे आगू पाछू डोर। 
लगावत हावय दूनो जोर। 

हाल नइ पावत हवय पहाड़। 
लगे खूँटा कस देहे गाड़। 
रूप कछुवा के धर भगवान। 
भार पर्वत के धर लिस जान। 

मथानी चले लगिस दिनरात। 
मिलत हे धीरे से सौगात। 
जहर हर निकलिस पहिली जान। 
नाथ शिव भोला करलिस पान।  

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़




श्रृंगार छंद

श्रृंगार छंद 

करे गोरी सोला श्रृंगार। 
नरी मा पहिरे हावय हार। 
बाँह मा पहुँची ला पहुँचाय। 
हाथ मा चूड़ी ला खनकाय। 

संग मा ककनी कड़ा सजाय। 
अँगूठी अँगड़ी मा पहिराय। 
नाक के नथली गजब सुहाय। 
कान के झुमका मन ला भाय।  

कमर करधनिया कड़क कसाय। 
पाँव के पायल शोर मचाय। 
चुटुक ले चुटकी ताल मिलाय। 
माथ के बिंदिया गजब सुहाय।  

नवा लुगरा के सुग्घर रंग। 
पोलखा मैचिंग पहिरे संग। 
आलता माहुर पाँव लगाय।  
हथेली मेंहदी सुघर रचाय। 

लगाये आँखी काजर कोर। 
गजब सोहे मुहरंगी तोर। 
माथ मा टिकली ला चटकाय। 
रूप गोरी के निखरत आय। 

केश मा सुग्घर पाटी पार। 
मांग सिंदूर भराये सार। 
मुड़ी मा घुँघटा दे हे डार। 
करे गोरी सोला श्रृंगार।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Friday, 14 August 2020

घनाक्षरी


खेलत खेलत खेल, जमुना म गेंद गिरे, 
ग्वाल बाल सोंचत हे, गेंद कोन लाय जी। 
जमुना म नांग रहे, दाई ददा सब कहे, 
जान ल गँवाये बर, कोन उहाँ जाय जी। 
किशन कन्हाई चले, जमुना म गेंद लेहे, 
सखा सब बरजे हे, नइ पतियाय जी।
कालिया ल नाथ डरे, गेंद धर फन चढ़े,
मुरली बजाय कान्हा, नाच के दिखाय जी। 

सुन वो यशोदा सुन, तोर ललना के गुन, 
चोरी करे माखन ल, घर मा ओ आय ओ।  
भले नानकन हावे, बड़ा उतलङ्ग हावे,
धर के अपन सँग,सखा तक लाय ओ। 
सिका मा बँधाय रहे, तेला न बचाय येतो,
खोजी खोजी चारो कोती, माखन ल खाय ओ  
तोर नटखट कान्हा, बड़ा हलाकान करे, 
माखन ल खाय फिर, घड़ा फोर जाय ओ।  

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

श्रृंगार छंद

श्रृंगार छंद 

बरस दिन मा आइस बरसात। 
गिरत हे पानी पूरा रात। 
नदी कस बनगे हावय खोर। 
रात भर गूँजत राहय शोर। 

भरे घर कुरिया अउ कोठार
अँगन ले बरवट परछी पार।
रात भर छान्ही ले चुचवाय। 
देख रेला भारी बोहाय।  

तउर के खटिया निकलय खोर। 
बाँध के राखे लाँबा डोर। 
रखे कुर्सी पेटी उफलाय। 
जाँघ भर पानी भीतर आय। 

भसक गे भिथिया हर कोठार। 
बँधाये राहय गरुवा चार। 
तुरत गरुवा ला देहँव खेद। 
मोर घर भँग-भँग ले हे छेद। 

पठउँहा राखे राहँव धान। 
सबो हर फिल गे हवय सियान।  
बता हम कोन डहर अब जान। 
रात भर होवत हन हलकान। 

परोसी तक हावय परसान। 
समझ नइ आवय काहाँ जान। 
यहा दे मछरी तक हर आय। 
साँप मुसुवा मन तक सकलाय। 

साँप हर मुसुवा ला नइ खाय। 
इकट्ठा रहिके जान बचाय। 
मुसीबत के बेरा सब एक। 
देत हावय ये शिक्षा नेक। 

जाग मनखे तँय अब तो जाग।  
मुसीबत के बेरा झन भाग। 
आय दुश्मन ला मार भगाव। 
आज सब एक जगा जुरियाव। 

बोल के भारत के जयकार।  
करे हँव दुश्मन मा जब वार। 
नींद हर खुलगे संगी मोर। 
सबो सपना के राहय शोर। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़







Monday, 10 August 2020

रोला छंद

रोला- दिलीप कुमार वर्मा 

राजा बेटा मोर, तोर सुरता आवत हे। 
चल दे तँय बनवास, मोर जिवरा जावत हे। 
कइसे दुख बीसराँव, समझ कुछ नइ आवत हे। 
तोर बिना घर द्वार, तनिक अब नइ भावत हे।  

लइकापन के तोर, खेल बड़ सुरता आवय। 
अँगना परछी खोर, तोर चलना बड़ भावय। 
चिखला रहच सनाय, ददा के कोरा जावच। 
नहलाये ल बलाँव, मोर तिर तँय नइ आवच। 

चल दे गुरुकुल छोंड़, पढ़े बर जोरे जोरा।
सुन्ना होगे फेर, ददा दाई के कोरा। 
आये बरसों बाद, लगिस घर खुशियाँ आगे। 
चल दे मुनि के संग, फेर अँधियारी छागे। 

बइठे करम ठठाँव, करँव का तहीं बता दे। 
कर ले सुग्घर बिहाव, बहू घर तँय हर ला दे। 
सच होइस हे ख्वाब, मगर अलहन हर आगे। 
चल दे तँय बनवास, मरे जस मोला लागे।  

अरे दुलरुवा मोर, राम तँय जल्दी आजा।  
सुन्ना हे घर बार, बनाबो तोला राजा।
आँखी हर पथराय, तोर रसता ला जोहत। 
भरत तको पछताय, राज ला बोहत बोहत।

कौशिल्या के हाल, राम ला कोन बतावय। 
रोवत हे दिन रात, सँदेसा कइसे जावय। 
मया बँधे हे तार, सदा लेगत लानत हे।
कइसन काखर हाल, दुनो झन सब जानत हे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Sunday, 9 August 2020

मुसुवा

मुसुवा 

मटर मटर मुसुवा हर करथे। 
देखत मोरो अंतस जरथे। 
दे मारँव डंडा कस लागे। 
पर मुसुवा हर खट ले भागे। 

घर मा आके उधम मचाथे। 
खाये के सब जिनिस ल खाथे। 
कपड़ा लगता कुतर डरत हे। 
घर भर मा ओ बिला करत हे। 

छोटे ले बड़का बड़ हावँय। 
खाये बर इहँचे सब आवँय। 
रतिहा बेरा किचकिच करथें। 
नींद हमर जम्मो वो हरथें। 

एक बार गुस्सा मा आके। 
पनही दे मारेंव उठाके। 
परगे ओ टीवी मा जाके। 
रोना आथे आज बता के।  

तब ले गुस्सा अंतस रखथौं। 
तहीं बता अउ का कर सकथौं। 
गणपति के वाहन अब मानँव। 
देव तुल्य मुसुवा ला जानँव। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

1222 1222 1222 1222  

मया सब के महूँ पावँव बता मँय का करँव भाई। 
बने बादर अभी छावँव बता मँय का करँव भाई। 

ददा दाई हवय बीमार सीमा मा हवय जाना।
बता कइसे भला जावँव बता मँय का करँव भाई। 

चना के झाड़ मा मोला चढ़ाके ओ धकेले हे। 
उठे मँय नइ सकत हावँव बता मँय का करँव भाई  

गजब वो मुँह फुलोये हे मनाये बात नइ मानय। 
तियासी भात ला खावँव बता मँय का करँव भाई

बहुत जिद्दी हवय लइका मँगत हे चाँद ला के दे।
कहाँ ले चाँद मँय लावँव बता मँय का करँव भाई। 

सुते दाई हवय बिंदास लइका मोर रोवत हे।
कइसे लोरी भला गावँव बता मँय का करँव भाई। 

बलाये वो रहे रतिहा कुदावत हे कुकुर मोला। 
बचाये जान मँय धावँव बता मँय का करँव भाई। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल


बहरे रजज़ मख़बून मरफ़ू मुखल्ला 
मुफ़ाईलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन मुफ़ाईलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन

1212 212 122 1212 212 122  

उहाँ अमीरी न हे गरीबी जिहाँ मया के बजार भाई। 
सजे सजाये सबो मिलत हे जिहाँ चले नइ उधार भाई।  

बिना लड़े जीत कइसे होही समर म आके अभी दिखावव। 
उही मजा ला चखे हमेसा भले मरे जीत हार भाई।

बड़ा बड़ौना बताये सब ला बड़ा मजा ले पनीर खाये। 
कहाँ दबाये ले ओ दबत हे सबो बतावय डकार भाई।

बड़ा अमीरी के रौब झाड़े खवाय तँय सब ला लेग होटल।
उधार बाँकी अभी तलक हे करे न वापस हमार भाई।

सबो सवाँगा भले करे तँय दिलीप बिंदी बिना अधूरा
कहाँ सुहाथे कढ़ी तको हर बता डले बिन लगार भाई 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल


बहरे रजज़ मख़बून मरफ़ू' मुखल्ला 
मुफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाऊलुन मुफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाऊलुन

1212 212 122 1212 212 122

लहू बहा के मिले अजादी, बिगड़ न जावय सम्हाल राखव।
नजर गड़ाये हवय परोसी, न लूट खावय सम्हाल राखव।

बना के भाई मया लुटाये, मगर दगा वो करे हमेसा। 
भले बटे एक बार धरती, न फिर बँटावय सम्हाल राखव।

बबा बनाये रहिस घरौंदा, उजाड़ डारिस हवय ग नाती।
लुटा लुटा के कमाये धन ला,मजा उड़ावय सम्हाल राखव। 

कटात जावत हे पेड़ भारी, उजाड़ जंगल वीरान होगे।
जमीन माफिया खुसर के देखव, न घर बनावय सम्हाल राखव। 

दसा बिगाड़त हे चंद मनखे, दिशा सुधारे सबो ल परही। 
बनत रहिन हे जे चोर राजा, न फेर आवय सम्हाल राखव।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Friday, 7 August 2020

घनाक्षरी

एसो झन आबे दीदी, तीजा पोरा माने बर, 
कोरोना ह करत हे, भारी हलाकान ओ। 

एहू कोती कोरोना हे, उहू कोती कोरोना हे, 
सबो कोती कोरोना ले, छूटत परान ओ। 

मोला कहूँ होही दीदी, तहूँ ला तो होई जाही,   
तोला कहूँ होही मोर, छूट जाही जान ओ।  

एसो तीजा घर मा ही, रही के मना ले दीदी, 
लुगरा ला भेज देहुँ, बात मोरो मान ओ। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़