रात के चंदा हावय गोल।
तनिक ओ गोरी कुछ तो बोल।
रिसाये झन रइ तँय चुपचाप।
सोंच के बाढ़य अंतस ताप।
करेजा मोरो मत फट जाय।
मनावत जान हलक मा आय।
बता का होये हावय बात।
मनावत झन बीतय जी रात।
टीटही आके करे पुकार।
कहत हे मोला झन तँय हार।
चँदैनी आसमान मा छाय।
संग ओ मोला दे बर आय।
कहे तोला हावय का कोन ?
बता दे नाम कहे कुछ जोन।
अभी देहूँ ओला फटकार।
मान जा अब तो तँय हर यार।
बता का लुगरा के हे चाह।
धरा दँव मइके के का राह।
सोन के लेबे का तँय हार।
बोल गोरी अब तो मुह फार।
कहूँ जाये के हवय विचार।
दिखा के लाहूँ सब संसार।
तनिक लादे गोरी मुस्कान।
हलक मा अटके हावय जान।
देख ले सुकुवा तक हर आय।
मनावत रतिहा सबो पहाय।
पिला दे गोरी अब तो चाय।
मोर ले कुछ अब कहा न जाय।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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