चाटी के रेला आवत हे।
कोन जनी काहाँ जावत हे।
संग संग तँय चल रे मोनू।
पता चले ये का खावत हे।
इंजन जइसे एक चलत हे।
डब्बा कस चल का पावत हे।
मुँह मा काये सबो दबाये।
जाने ये सब का लावत हे।
रँधनी खोली मा खुसरत हे।
का इहँचे सबके दावत हे?
चाटी खाना जानय मोनू।
गुड़ शक्कर अबड़े भावत हे।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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