Wednesday, 19 August 2020

श्रृंगार छंद

श्रृंगार छंद 

छमक छम पायल के हे शोर। 
निकल के रेंगय गोरी खोर। 
टुरा मन के मन उठे हिलोर। 
करेजा मारन लागे जोर। 

दाँत मोती जइसन चमकाय। 
रूप ला चंदा जस उजराय।  
आँख मा काजर सुघर अँजाय।
बने बेनी नागिन लहराय।  

कमरिया लचकावत बलखाय। 
होठ ले मंद मंद मुसकाय।  
सरम के घूँघट दे हे डार।  
झाँक के देखत हे संसार।

मचल जय जे देखय इक बार। 
टपक जावत हे सब के लार। 
उमरिया बाली पर बलखाय। 
सबो ला चाल म अपन रिझाय। 

सबो के मन मा हे अहसास। 
मिले के राखे हावय आस। 
सबोझन आथें रख विश्वास। 
नजर काखर बर होही खास। 

गाँव के गोरी हर ये जान। 
समझबे येला झन नादान। 
बना के ऊल्लू दिही घुमाय। 
दिखावा थोरिक ये नइ भाय। 

भरे नखरा के हवय खदान। 
मगर रेंगत हे बन अनजान। 
लड़कपन जइसे ओ इठलाय। 
गली मा रेंगत जब भी जाय।

समझ भोली झन आबे तीर। 
नही ते देही इज्जत चीर।
गाँव के गोरी ये पहिचान। 
तान के थपरा देही मान। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

 

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