श्रृंगार छंद
करे गोरी सोला श्रृंगार।
नरी मा पहिरे हावय हार।
बाँह मा पहुँची ला पहुँचाय।
हाथ मा चूड़ी ला खनकाय।
संग मा ककनी कड़ा सजाय।
अँगूठी अँगड़ी मा पहिराय।
नाक के नथली गजब सुहाय।
कान के झुमका मन ला भाय।
कमर करधनिया कड़क कसाय।
पाँव के पायल शोर मचाय।
चुटुक ले चुटकी ताल मिलाय।
माथ के बिंदिया गजब सुहाय।
नवा लुगरा के सुग्घर रंग।
पोलखा मैचिंग पहिरे संग।
आलता माहुर पाँव लगाय।
हथेली मेंहदी सुघर रचाय।
लगाये आँखी काजर कोर।
गजब सोहे मुहरंगी तोर।
माथ मा टिकली ला चटकाय।
रूप गोरी के निखरत आय।
केश मा सुग्घर पाटी पार।
मांग सिंदूर भराये सार।
मुड़ी मा घुँघटा दे हे डार।
करे गोरी सोला श्रृंगार।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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