Saturday, 15 August 2020

श्रृंगार छंद


पढ़े बर लइका हर नइ आय।  
खेल खेलत ओ दिन ल बिताय।
ददा दाई के चल नइ पाय।  
गुरूजी कइसे भला पढाय। 

धरे बसता जावत हे रोज। 
जाय ओ नदिया कोती सोज। 
करत हे मछरी घोंघी खोज। 
इहाँ सब लइका मन के फ़ौज।  

तभो ले लइका होगे पास। 
भले तँय नइ करबे बिसवास।  
पढ़ाई होगे सत्यानास। 
नियम ये आये जब ले खास।  

कभू लइका ला झन तँय मार। 
बात मा तक तँय झन फटकार। 
नही ते हो जाबे लाचार। 
सजा मिल जाही सुन ले यार।

गुरूजी निच्चट हे मजबूर। 
रहत हे लइका मन ले दूर। 
भराये ऊर्जा हे भरपूर। 
मगर सब होगे चकना चूर।

बता अब कइसे होही हाल। 
समस्या होगे हे बिकराल।  
पढ़ाना अब होगे जंजाल। 
गलत नइ हावय काखरो दाल। 

छहेल्ला लइका खेलय खोर। 
गुरूजी होवत हावय बोर। 
सबो लइका मन होगे ढोर। 
नियल ला अब तो देवव छोर।  

गुरूजी नोहय रकसा जान। 
पढ़ाई सिरतो होही मान।  
गुरू ला थोरिक तो पहिचान।
करइया शिक्षा के ओ दान।  

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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