श्रृंगार छंद
बरस दिन मा आइस बरसात।
गिरत हे पानी पूरा रात।
नदी कस बनगे हावय खोर।
रात भर गूँजत राहय शोर।
भरे घर कुरिया अउ कोठार
अँगन ले बरवट परछी पार।
रात भर छान्ही ले चुचवाय।
देख रेला भारी बोहाय।
तउर के खटिया निकलय खोर।
बाँध के राखे लाँबा डोर।
रखे कुर्सी पेटी उफलाय।
जाँघ भर पानी भीतर आय।
भसक गे भिथिया हर कोठार।
बँधाये राहय गरुवा चार।
तुरत गरुवा ला देहँव खेद।
मोर घर भँग-भँग ले हे छेद।
पठउँहा राखे राहँव धान।
सबो हर फिल गे हवय सियान।
बता हम कोन डहर अब जान।
रात भर होवत हन हलकान।
परोसी तक हावय परसान।
समझ नइ आवय काहाँ जान।
यहा दे मछरी तक हर आय।
साँप मुसुवा मन तक सकलाय।
साँप हर मुसुवा ला नइ खाय।
इकट्ठा रहिके जान बचाय।
मुसीबत के बेरा सब एक।
देत हावय ये शिक्षा नेक।
जाग मनखे तँय अब तो जाग।
मुसीबत के बेरा झन भाग।
आय दुश्मन ला मार भगाव।
आज सब एक जगा जुरियाव।
बोल के भारत के जयकार।
करे हँव दुश्मन मा जब वार।
नींद हर खुलगे संगी मोर।
सबो सपना के राहय शोर।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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