श्रृंगार छंद
फहर गे झंडा चारो ओर।
अजादी के गूँजत हे शोर।
पताका अम्बर मा लहराय।
देख के मनवा खुसी मनाय।
मोर अंतस मा उठे हिलोर।
करेजा मारत हावय जोर।
लगत हे अब्भी दउड़त जाँव।
चीन ला जा के मजा चखाँव।
बने ब्यापारी भीतर आय।
पाँव चारो कोती फइलाय।
बेंच के सस्ता हमला माल।
चले हे चीनी मन हर चाल।
इहाँ के बोरिस हे ब्यापार।
करिन ब्यापारी ला लाचार।
अपन मनमानी खूब चलाय।
हमर ले बहुँते माल कमाय।
करे अँगरेजन मन जे हाल।
आज चीनी के हावय चाल।
सिपाही भीतर तक ले आय।
गुलामी फिर से झन आ जाय।
सुनव रे संगी होजव एक।
बात मँय आज कहत हँव नेक।
त्याग दव चीनी के सामान।
मुसीबत घर मा अब झन लान।
विरोधी भाखा ला दव छोंड़।
दिशा सोंचे के अब दव मोड़।
करव सब शासन ला मजबूत।
एकता के दव सबो सबूत।
सिपाही तब होही बलवान।
डरे नइ अपन लुटाये जान।
बचाही हमर देश के मान।
तिरंगा फहर दिखाही शान।
गूँजही भारत के जय कार।
चीन तब जाही हम ले हार।
दुबारा कर नइ पाही वार।
देश हमरो होही दमदार।
आज के दिन सब कसम उठाव।
सबो भारतवासी कहलाव।
अनेको हावय हमरो रंग।
रहन पर भाई चारा संग।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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