Thursday, 18 July 2019

रूपमाला छंद

बरसात

कोन जाने कब हवा हर,मोर कोती आय।
संग मा करिया घटा के,हाथ धर के लाय।
कब गरज दय घड़ घड़ाघड़, कब चमक चमकाय।
मोर जिवरा ला बुझादय,झूम के बरसाय।

देख के करिया घटा ला,बाढ़ गे कुछ आस।
ये हवा लहरात हावय,आज हे कुछ खास। 
झूम के बरसा बरसही,आय तभ्भे साँस।
चार दिन जे बेर होही,हो जही सब नाँस।

खेत मा उखरा गड़त हे, फाट गे दनगार।
धान मन बाती बराये, लाल होगे खार।
पर किसनहा रात दिन,जोहत हवय आगास।
आज नइ ते काल गिरही,मन रखे हे आस।

रे हवा अब तँय बतादे,होय कब बरसात। 
रासता जोहत सबो के,बीत गे कइ रात।
तँय सवारी अस घटा के,चढ़ तुही मा आय।
एक घानी लान येती, झूम के बरसाय।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

Friday, 12 July 2019

समे बड़ा बलवान

समे बड़ा बलवान,रे भाई समे बड़ा बलवान।
नइ जाने ते गुस्सा करथे,जान अरे नादान।
रे भाई समे बड़ा बलवान।

जे सब्जी ठंडा मा आथे,कौड़ी दाम बेंचाथे।
फेंकत रहिथे बारी वाला,दाम कहाँ ओ पाथे।
ओ सब्जी बरसा मा खाबे,देबे भारी दाम
रे भाई समे बड़ा बलवान

गोभी बंधी सेमी भाटा, ये ठंडा मा आथे। 
भारी मँहगा लाल टमाटर,धारे धार बोहाथे।
काला कब कब खाना हावय,समे जरा पहिचान।
रे भाई समे बड़ा बलवान

गरमी राखे सुकसी खाले,खाले जीमी कांदा।
रखिया मखना बरी बनाले,नोहय संगी फांदा।
आमा लाल कलिंदर खाले,इही बचाथे जान।
रे भाई समे बड़ा बलवान

बरसा मा पटवा भाजी अउ,रमकलिया हे बारी।
बरबट्टी खीरा अउ कुंदरू,मिले करेला भारी।
डोंड़का फोकट मा मिल जाथे,बात कहँव सच मान।
रे भाई समे बड़ा बलवान

मँहगाई के रो झन रोना,जइसे हाबय खाले। 
बे मौसम के सब्जी भाजी,खा के मजा उडाले।
समे परे रसता म फ़ेंकाथे, जइसे मरे समान।
रे भाई समे बड़ा बलवान।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

सार छंद

सार छंद

जाने कोन डहर चलदिस हे, ये बरसा के पानी।
उमड़ घुमड़ गरजत ललचाइस, छा गे रहिस जवानी।

धान बुवाई सब कर डारिन,धनहा डोली भर्री।
पानी नइ गिरही ता संगी,बन जाही सब दर्री।

हवा चलत हे सुरसुर सुरसुर,फुरहुर तन हा लागे।
हो जावय पानी के बरसा,तभे भाग हर जागे।

निच्चट देख निटोर दिए हे, जाने अब का होही।
खेत खार उखरा गड़ही अउ,धरती दाई रोही।

सावन के महिना आवत हे,सुख्खा नदिया नरवा।
काँवरिया पानी नइ पावय,जर जाही अब तरवा।

भोले बाबा मारे गरमी, ताण्डव नाच दिखाही।
हाहाकार मचे धरती मा, सब के बया भुलाही।

धरती दाई तको पुकारे,हे बरसा तँय आजा।
तन मन रूखा सूखा होगे, अब तो प्यास बुझा जा।

लइका मन सब रोवत हावय,देखत हे मुँह फारे।
करिया बदरा अब तो आजा,पानी तँय बरसा रे।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार 12-7-2019

Sunday, 7 July 2019

जयकारी छंद

बबा कहे मँय घर नइ जाँव,साधु बने जिनगी ल बिताँव।
भीख माँग के मँय हर खाँव,भले सड़क मा मँय सुत जाँव।

बहू तनिक मोला नइ भाय,बात बात मा बात सुनाय।
थारी लोटा पटकत जाय, बेटा ला ओ रोज दबाय।
थोर थोर देथे ओ खाय, सुख्खा रोटी ला परसाय।
दूध दही ला देत लुकाय, मुसुर मुसुर कुरिया मा खाय। 
बबा कहे

मँय कुरिया बइठे रह जाँव,बाँचे खोंचे ला मँय पाँव।
घर मा दुख के हावय छाँव,पर सुरता आथे ओ गाँव।
संगी साथी के भरमार,बइठन हम जे तरिया पार।
घूमे जावन हम तो खार, छूटत हावय ओ संसार।
बबा कहे

मोर बनाये ओ घर द्वार,दया मया के ओ संसार।
जब ले संगी गे जग पार, जिनगी हर होगे बेकार।
अब तो नाती घर नइ जाँव,मया उहाँ थोरिक नइ पाँव।
भजे छूट जय पुरखा गाँव, साधु बने जिनगी ल बिताँव।
बबा कहे

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

लावणी छंद हिंदी

हे मनु के सन्तानों सुन लो,अंतस मन क्या कहता है।
ऊपर वाला कहीं रहे ना,ओ अंतस में रहता है।

गलती करने से घबराते,उस पर जरा विचार करो।
क्यों डरता है पहले पहले,पलभर उसमें ध्यान धरो।
हाथ कँपा के मन अकुला के,हमसे ओ कुछ कहता है।
ऊपर वाला कहीं रहे ना,ओ अंतस में रहता है।

मार काट जो तुम करते हो,अपने हीं सग भाई से।
अपना हीं तो खून बहाया,कुछ ना मिले लड़ाई से।
देख तुम्हारी करतूतों को,अंतस रोता रहता है।
हे मनु के सन्तानों सुन लो,अंतस मन क्या कहता है।

लाख मना करता है फिर भी,बात कभी ना तू माने।
अपनी करनी से अंतस को,पीड़ा दे क्यों ना जाने। 
करता कोई भरता कोई,सब अंतस हीं सहता है।
ऊपर वाला कहीं रहे ना,ओ अंतस में रहता है।

काँप रहे हो हाथ पैर औ, अंतस भी धिक्कार रहा।
सोंच जरा करने से पहले,अंतस मन क्या अभी कहा।
गलती कर पछताया जो तूँ,आँसू फिर क्यों बहता है।
ऊपर वाला कहीं रहे ना,ओ अंतस में रहता है।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

सखी छंद

पथरा

पथरा हावय बड़ भागी।नइ लागय ओला दागी।
कतको छीनी मा मारै। पर पथरा हर नइ हारै।

धरती मा हावय भारी।लाली सादा अउ कारी। 
कोड निकालत हे ओला। टोरत फोरत हे चोला।

नींव बनाय अटारी के। परदा बनथे बारी के।
सड़क बने बर बिछ जाथे।पचरी बन के सुख पाथे।

जाँता ले रोटी खाले।सिलपट्टा चटनी पाले।
बेलन चौकी बन जाथे।सब पथरा ला सहराथे।

पुलिया बनथे नाली के। आमा टोरय डाली के।
टूट बने पथरा रेती।काम हमर आये सेती।

चमचम कुँआ बँधाये हे।पूल नदी के भाये हे।
अँगना कुरिया परछी मा।कटे न भाला बरछी मा।

लाल किला हे लाली के।झन समझव ये काली के।
ताजमहल हावय सादा।जग मा जे चर्चित जादा।

पथरा के ताँबा लोहा।लागय पथरा बन कोहा ।
सिरमिट बनथे पथरा के।खान बने सब खतरा के।

पूजत हे मनखे तोला।देव असन करके चोला।
भगवन ला खोजत हावै।देख सबो मन सुख पावै।

बिन पथरा के का होही।रीड़ धरा अपने खोही।
धरती दलदल बन जाही।जीव जगत सब दुख पाही।
दिलीप कुमार वर्मा

सखी छंद

ब्यथा कुकुर के

व्यथा कुकुर के सुन लौ जी।काय कहत हे गुन लौ जी।
काबर ओला दुख देथौ।नाम उखर काबर लेथौ।

मनखे ले गलती होथे।कुकुर बिचारा हा रोथे।
मनखे हर गारी खाथे।कुत्ता तब ओ कहलाथे।

अइसन का मजबूरी हे।कहना कुकुर जरूरी हे?
कुत्ता के का गलती हे।नाम डहर का चलती हे।

जादा जब गुस्सा जाथे।मनखे अब्बड़ चिल्लाथे।
खून पिये बर तक सोंचे।कुकुर सुने ता मुड़ नोंचे।

मनखे ला जइसे मारौ।गोंदा गोंदा कर डारौ।
खून हमर झन पीहौ जी।का अइसन तुम जीहौ जी।

हम तो करथन रखवाली।काम हमर नइ हे जाली। 
सेवा हमर कहानी हे।सँग तुहँरे जिनगानी हे।

मनखे जइसन झन जानौ।बात कहत हँव सच मानौ।
मनखे मन देथे धोखा।काम उखर नइ हे चोखा।

हम साथी अँधियारी के।खेत गली अउ बारी के।
का मनखे हर कर पाथे।ठुड़गा देखे डर्राथे।

अब तो कहना ला मानौ।काम हमर का हे जानौ।
नाम हमर झन लेहौ जी।अतके बस कर दैहौ जी।
दिलीप कुमार वर्मा

सखी छंद

मोर गली तँय झन आबे।आबे ता बड़ दुख पाबे।
मोर गली मा काँटा हे।चाब दिही बड़ चाँटा हे।

खटके सबके आँखी मा।वार करे सब पाँखी मा।
एक कदम नइ चल पाबे।देखे सब जेती जाबे।

ताना मार रुला देही।कहिके अबड़े सुख लेही।
आँसू पोछ न पाबे तैं।रो रो कहाँ बताबे तै।

बैरी अबड़ जमाना हे ।अबतक बहुत पुराना हे।
पहिनावा ला नइ भावै।अइसन तक मनखे हावै।

सँघरा कइसे चल पाबे।ताना सुन के पछताबे।
लुगरा बिन ये छोरी हे ।देखव निच्चट गोरी हे।

कइसन बहू कुवारी हे।लगथे शहरी नारी हे।
माँग तको सुन्ना हावै।हाथ धरे सँग सँग जावै।

लाज सरम सब छोड़े हे।कइसन नाता जोड़े हे।
मुड़ ढाँके तक नइ जानै।नता गुता ला नइ मानै।

जब ये सब ला सुन पाबे।तभे रहे बर तँय आबे।
तब तक बंद दुवारी हे।मोरो तो लाचारी हे।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार