Thursday, 31 December 2020

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन

1222 1222 1222 

गरीबी मा झुलस जाथे ये जिनगानी। 
कहाँ सुख चैन ला पाथे ये जिनगानी। 

न खाये के ठिकाना हे न कुरिया के। 
तभो आराम फरमाथे ये जिनगानी। 

कभू सूखा कभू जाड़ा जनावत हे। 
सबो मौसम ल अपनाथे ये जिनगानी। 

दुसर के शान शौकत देख जल जाथे।
गरीबी सोंच पछताथे ये जिनगानी। 

कहूँ मिल जाय धन दौलत अचानक से।
उड़ा के खूब इरताथे ये जिनगानी।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
1222 1222 1222 

मया मा तोर पगलाये हवँव मँय हा। 
बिना सोंचे इहाँ धाये हवँव मँय हा। 

रहिस मुर्दा समझ लकड़ी चढ़े हँव मँय। 
नदी ला पार कर आये हवँव मँय हा। 

समझ रस्सी चढ़े हँव साँप ला धर के। 
तभे तोला इहाँ पाये हवँव मँय हा।

भजन करहूँ सदा मँय राम के संगी। 
गड़ी तोरे कसम खाये हवँव मँय हा। 

दरश होही हवय बिस्वास मोला जी। 
भजन बस राम के गाये हवँव मँय हा।

लिखे हँव राम के गुण ला रमायण मा। 
जिहाँ आदर्श दरसाये हवँव मँय हा। 

सुने समझे उही जाने रमायण ला। 
हजारों प्रश्न सुलझाये हवँव मँय हा।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़








गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन

1222 1222 1222 

उमर ढल गे मगर हे जान अभी बाँकी। 
बढ़ाये मूँछ दाढ़ी शान अभी बाँकी। 

झड़े सब दाँत मुँह खाली मुड़ी टकला।
भले आँखी गये पर कान अभी बाँकी। 

चपल डारे हवय भाँठा नदी नाला। 
गनीमत हे बचे गौठान अभी बाँकी। 

गँवाये बेग लहुटा दिस भला मानुष।
भरोसा हे हवय ईमान अभी बाँकी।

खवाये भोज हम सब ला बला के तँय। 
खतम नइ होय हावय पान अभी बाँकी।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़









गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन

1222 1222 1222 

नहा के जेन हर आही मजा पाही। 
फरा चीला तको खाही मजा पाही। 

बबा तापत हवय आगी जला भुर्री। 
बबा तिर जेन हर जाही मजा पाही। 

जड़ावत लोग जाड़ा मा बहुत हावँय। 
रजाई जे धरे लाही मजा पाही। 

लगे बरसात तब पानी अबड़ चूहे ।
जे छानी ला बने छाही मजा पाही।

समे मा काम निपटा के रहे आघू।
उही हर गीत ला गाही मजा पाही।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़








Wednesday, 30 December 2020

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन

1222 1222 1222 

गरम पानी पिये ले तर गला होथे। 
पिये जे जाड़ मा ठंडा बला होथे। 

कहानी मा मजा आथे मगर जानव।
कहानी ला तको कहना कला होथे।

करे बर दान पइसा खोज झन तँय हर।
गिरे तक ला उठाये ले भला होथे। 

लगे मौसम हवय बारिश सम्हल ले चल। 
सटक जाबे गली तक दल दला होथे।  

पिये झन जाव छट्ठी चाय ला भाई।  
उहाँ के चाय निच्चट ढल ढला होथे।

बहुत बाढ़त हवय फेसन के बीमारी। 
पहिरथे तेन कतको झलझला होथे। 

कहाँ रोटी बने आँटा इहाँ भाई।
गरीबी मा हमेसा पलपला होथे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़







गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन

1222 1222 1222 

सुने हँव तोर बेटी के बिहा होही। 
बिहाबे मोर बेटा सँग त का होही। 

कमाथे चार पइसा रोज सट्टा मा। 
बताहूँ नइ कहूँ तोला दगा होही। 

पिये दारू परे रहिथे सड़क नाली। 
अभी भी वो सुते कोनो करा होही। 

करे तँय खून भागत हस बता कइसे।
कहाँ ले बाँचबे तोला सजा होही।

करे चोरी उही हरदम सजा पावय। 
ठगी डाँका करइया के नफा होही। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़






गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन

1222 1222 1222 

हमू मन चाँद मा जा घर बनाबो जी। 
उड़ा के रोज जाबो रोज आबो जी। 

हवय संसो मगर मन मोर एक्के ठो। 
उहाँ हम काय पिबो काय खाबो जी।  

सगा जाबो रबो हम चाँद मा जा के। 
मगर सोंचव उहाँ ले काय लाबो जी।

बिना मिहनत मिले नइ खाय बर भाई। 
कमाबो रोज तब्भे खाय पाबो जी। 

सबो झन जात हें तीरथ बरथ एसो। 
उँखर सँग जा हमू गंगा नहाबो जी। 

सुने हावँव भरे पानी हवय मंगल। 
उड़ा के एक दिन मंगल म जाबो जी। 

बनाबो खेत घर कुरिया लगाबो पेंड़। 
उहाँ जा के अपन बस्ती बसाबो जी। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन

1222 1222 1222

करोना के कहर फइले हवय भारी। 
इहाँ चारो डहर फइले हवय भारी। 

उगावत हें फसल सब तीन घम-घम ले। 
सबो कोती नहर फइले हवय भारी। 

जवानी मा तको बीमार होवत हे। 
प्रदूषण के जहर फइले हवय भारी।

लगा के सेंट रेंगे लागथे कोनो। 
गली भर मा महर फइले हवय भारी। 

चुनावी जंग मा अब जीत हो जाही। 
इहाँ मोरे लहर फइले हवय भारी। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Tuesday, 29 December 2020

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन

1222 1222 1222

बिगड़थे बात ज्यादा फेंक झन संगी। 
परे फिर लात ज्यादा फेंक झन संगी। 

डराथें लोग सुनके भूत के किस्सा। 
भयानक रात ज्यादा फेंक झन संगी। 

कहानी मा कहानी जोड़ कहि डारे। 
समझ नइ आत ज्यादा फेंक झन संगी। 

कहे तँय खाच नइ बिन दार एको दिन।
पता अवकात ज्यादा फेंक झन संगी। 

झुलस गे पाँव कहिथस आज गरमी मा।
कहाँ हे तात ज्यादा फेंक झन संगी। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Thursday, 24 December 2020

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे हज़ज मुसद्दस महजूफ़ 
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन

1222  1222 122 

बिहनिया ले चिरइया गीत गावय 
सुने जे कान तेखर मन लुभावय।  

पहुँचथे जेन नदिया तिर बिहानी।
उही हर गीत के आनन्द पावय। 

गधा घोड़ा तको मा फर्क नइ हे। 
समे पाये सबो गंगा नहावय। 

पता जब हे इहाँ हे शेर माड़ा। 
बता कब मेमना नज़दीक जावय।  

रखाये नागमणि नागिन करा हे। 
लगा के दाँव जीवन कोन लावय।

ठिठुरथे जाड़ बरसा मा फिलत हे।
मगर ये बेंदरा कब छाँव छावय। 

सुते रहिथे हमेसा देख अजगर। 
भरे तन हे न जाने काय खावय। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे हज़ज मुसद्दस महजूफ़ 
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन

1222  1222 122 

गिरा के तँय उठाये आज काबर। 
 इहाँ तँय रेंग आये आज काबर। 

कछू स्वारथ भरे का तोर मन मा। 
सुते तेला जगाये आज काबर। 

करे सूखा मरत ले घाम करके। 
बिना बादर गिराये आज काबर।  

सदा दुतकार तँय मोला भगाये।  
मया अबड़े लुटाये आज काबर। 

तियासी भात नइ पूछे कभू तँय।
बरा मोला खवाये आज काबर। 

निकाले घर तको ले लात मारे। 
बहुत मोला मनाये आज काबर। 

रखे तँय दूर अबतक कोढ़ी जइसे।
अपन तिर मा बलाये आज काबर।  

हकन के  पाप जिनगी भर करे तँय।
डुबक गंगा नहाये आज काबर।

खजाना मोर हावय नाम का जी। 
मया अबड़े दिखाये आज काबर।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा  

बहरे हज़ज मुसद्दस महजूफ़ 
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन

1222  1222 122 

किसानी ले सबो अब दूर होगे। 
चढाये रेघा बर मजबूर होगे। 

कहाँ बनिहार पाबे काम खातिर। 
सबो अपने अपन मा चूर होगे। 

लड़कपन मा बही कस जेन राहय। 
जवानी आय ले मशहूर होगे। 

अपन घर के बनव रखवार संगी। 
ढिलागे चोर मानो सूर होगे। 

लुका के राख ले हे सात पर्दा।
लगे टूरी न हो जी नूर होगे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे हज़ज मुसद्दस महजूफ़ 
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन

1222 1222 122  

बहुत देखे हवन हम तोर जइसे। 
कभू सपड़ाय नइ हे मोर जइसे। 

धरे जब चीर देहूँ टाँग दूनो। 
निकल अतड़ी जही सब डोर जइसे। 

कहे बरजे कहाँ मानत हवस तँय। 
सुधरबे लट्ठ खा के ढोर जइसे।  

सहे सकबे कहाँ तँय मोर गरमी।
खड़े इहचे डबकबे झोर जइसे।

बतर पाबे कहाँ तँय पेंट के जी। 
निकल पानी बहाही बोर जइसे। 

परे मुक्का कहूँ जब एक तगड़ा। 
निकलही चीख होवत सोर जइसे।

पहाती रात मा सुकुवा दिखा के। 
खुसर आये महल मा चोर जइसे।  

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़




गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे हज़ज मुसद्दस महजूफ़ 
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन

1222 1222 122 

भले बीमार हे पर काम करथे। 
बता दाई कहाँ आराम करथे। 

सबो के चेत मा दिन भर कमा के। 
अपन जिनगी हमर वो नाम करथे। 

जुड़ाये जाड़ मा सूरज लुकाये। 
रही गरमी मरत ले घाम करथे।  

रहे अड़हा चलइया कार के जी। 
कभू जाथे शहर मा जाम करथे। 

सुने जे बात ला कोनो बतावय। 
लगा मिर्ची मसाला लाम करथे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़



गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

*बहरे रजज़ मुसम्मन सालिम*
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन

2212 2212 2212 2212   

मरना हवय सब जानथे तब ले डरावत रात दिन। का होय काली सोंच के जिनगी दरावत रात दिन। 

सब मोह माया मा फँसे किंजरत रथे दौरी असन। 
बाती असन जंजाल मा मनखे  बरावत रात दिन। 

मन मैल अंतस मा भरे इरखा जरावत तन हवय।
धुर्रा लगे झन देंह मा कुरता झरावत रात दिन।

सब पाप ला अंतस भरे ढोंगी बने ज्ञानी हवय।
भगवान के बड़ भक्त बन पूजा करावत रात दिन। 

दिनमान सब ला ज्ञान दे रसता बने बतलात हे।
अँधियार मा बइठे तहाँ दारू ढरावत रात दिन।  

जे उम्र म भगवान के करना रहिस हावय भजन। 
किंजरत हवय  वो मनचला आँखी चरावत रात दिन।

बढ़ गे हवय अब चोर मन हर रात तारा टोरथे।
जागत रहव कहिके सदा हाँका परावत रात दिन। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़



गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा  

बहरे रमल मुसम्मन सालिम 
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन

2122  2122 2122  2122 

देश खातिर का करत हस सोंच के तो देख ले तँय।
लूट धन काबर धरत हस सोंच के तो देख ले तँय। 

कोन लेगे हे बता दे धन मरे के बाद सँग मा।
जानथस तब ले भरत हस सोंच के तो देख ले तँय।

तोर सेती लोग मन हर रोज के परसान रहिथें। 
सुख इंखर काबर हरत हस सोंच के तो देख ले तँय। 

खाय भाजी तेल बिन कंजूस मक्खी चूस सुन ले।
बिन दवा काबर मरत हस सोंच के तो देख ले तँय। 

एक रोटी तोर खाइस भूंख मा बिलखत बिचारा।
दाँत ला काबर दरत हस सोंच के तो देख ले तँय। 

दू कुकुर लड़थे लड़न दे बीच काहीं बात होही।
बीच मा काबर परत हस सोंच के तो देख ले तँय। 

रोज बिहना आ जथस तँय काय स्वारथ हे बता दे।
ये सुरज काबर बरत हस सोंच के तो देख ले तँय। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रमल मुसमन महजूफ़ 
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन

2122  2122 2122 212 

बात हे जुन्ना मगर वो बात हावय काम के। 
कह गये पुरखा हमर सुन रात हावय काम के।  

तँय हपट दिन भर भले पर रात के घर आ लहुट। 
थक चुके जे तन सुते सुरतात हावय काम के। 

सूख गे हे खेत फाटत देख ले धरती तको। 
आ जवय पानी अभी बरसात हावय काम के। 

बाढ़ आये ले नदी के पार जाना बड़ कठिन। 
जान के ये पुल बड़े बनवात हावय काम के। 

जाड़ मा ठिठुरत हवय तन मन रजाई ओढ़ जी।
चाय काफी जो मिले पर तात हावय काम के। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रमल मुसम्मन सालिम 
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन 

2122  2122 2122  2122 

जान के बाजी लगा के देश सेवा जे करत हे। 
मान ले सच बात वो हर तोर दुख हर पल हरत हे। 

आज तँय अँटियात हावस चार पइसा पाय के जी।
वो बने रखवार तब्भे तोर घर पइसा भरत हे।  

बाज कस आँखी गड़ाये देख जोहत हे परोसी।  
तब डटे ऊपर सिपाही जब हिमालय हर ठरत हे

चिलचिलावत घाम रेगिस्तान के सीमा डटे हे।
आ कभू मैदान तब चलही पता कतका जरत हे। 

सोन ले जादा तपाये तब खरा सोना बने हे। 
काल आगू आ खड़े हो पर सिपाही कब डरत हे। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़


गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रजज़ मुसद्दस सालिम 
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन 

2212  2212 2212   

बन के बड़े भगवान बस्ती मा बसे।  
पावत हवस बड़ मान बस्ती मा बसे। 

मउका मिले छोडच नही जानत हवँव।
काटे नरी सैतान बस्ती मा बसे।  

बइठे बिठाये मिल जथे धन धान भारी।
तँय जान इहँचे खान बस्ती मा बसे।  

सुनथे सुनाये गोठ इहँचे तोर जी।
भारी हवय जजमान बस्ती मा बसे। 

आये कहाँ ले तँय इहाँ भगवान बनके।
काबर बता सुनसान बस्ती मा बसे।

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़


गजल

 गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रमल मुसम्मन सालिम 
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन

2122  2122 2122  2122

दे दिए बनवास काबर राम ला तँय हर बता दे। 
भेज दे हच दूर काबर श्याम ला तँय हर बता दे। 

तँय करे अन्याय हावस जब अपन औलाद ऊपर।
अब भला कइसे के पाबे धाम ला तँय हर बता दे। 

जब करम उल्टा करे ता कोन तोला मान दीही।
मोर दाई कोन लेही नाम ला तँय हर बता दे। 

होय गे सुखियार सब झन खेत परिया अब परे हे। 
आज कल अब कोन सइही घाम ला तँय हर बता दे। 

मिल जवत हे खाय खातिर फोकटे के दार चाँउर।
कोन मिहनत कर जलाही चाम ला तँय हर बता दे। 

सब सवाँगा कर चलत हे पाँव धुर्रा नइ चढ़न दय। 
खेत के सब कोन करही काम ला तँय हर बता दे। 

आस राखे हस हमेसा जेब खाली झन रहय जी।
बिन कमाये कोन देथे दाम ला तँय हर बता दे।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा

बहरे रमल मुसद्दस मख़बून मुसककन
फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन

2122 1122 22     

आव हुसियार बनव संगी रे। 
चाकू कस धार बनव संगी रे। 

देख उल्लू बना के लूटत हे। 
ठोस दमदार बनव संगी रे। 

भोकवा जान हुरेसत रहिथें। 
आज तलवार बनव संगी रे। 

जे कटावय नही जी काटे ले।
रोठ तुम सार बनव संगी रे।

गाय बन के कभू झन राहव जी।
बिच्छी के झार बनव संगी रे। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़





Wednesday, 23 December 2020

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रजज़ मुसद्दस सालिम 
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन

2212  2212 2212 

बरसात मा बखरी बने हरिया जथे। 
लौकी तरोई नार मखना छा जथे। 

रमकेलिया खीरा करेला चेंच अउ। 
भाजी घरो घर साग बन के आ जथे। 

जब आय जाड़ा तब लगे गोभी भटा। 
बंधी मुराई गाँठ सब ला भा जथे। 

दुश्मन तको अबड़े हवय ये साग के।
आ बेंदरा गरुवा किरा सब खा जथे। 

रखवार बन देखत रहे दिन रात जे।
मिहनत करे ते दाम अच्छा पा जथे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़




गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रमल मुसम्मन सालिम 
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन

2122  2122 2122  2122 

सोंच झन जादा मुसाफिर रात हे इहँचे ठहर जा। 
मोर कहना मान ले कुछ बात हे इहँचे ठहर जा। 

छाय हे चारो डहर घनघोर बादर देख ले तँय। 
लागथे आवत हवय बरसात हे इहँचे ठहर जा। 

होय अनहोनी लगत हे शोर होवत हे बहुत जी।
कुछ अलग ये कोलिहा नरियात हे इहँचे ठहर जा। 

सन सनासन चल हवा हमला कहत कुछ बात हावय।
काल सायद लागथे छुछवात हे इहँचे ठहर जा।

का सँदेसा लाय हावय बइठ बोलत हे अटारी।
देख घुघवा हर तो सुरतात हे इहँचे ठहर जा। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे हज़ज मुसद्दस महजूफ़ 
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन 

1222  1222 122 

पढ़ाई जे करे ते पास होथे। 
ददा दाई तको के आस होथे। 

सुते रहिथे अलाली जे करे जी। 
मिले नम्बर तको बकवास होथे। 

बिहा पहिली समझ का होय रिस्ता।
रहे सारी हमेसा खास होथे। 

करे जल्दी लड़े बर मोर भाई।
सबो खेला म पहिली टास होथे। 

दिवाली मा दिवाला तक निकलथे
जिहाँ बावन परी के तास होथे। 

दिए भगवान सुग्घर तोर काया।
पिये दारू तहाँ ले नास होथे।

कहे भगवान के अस्तित्व नइ हे।
उही ला भूत के आभास होथे।

जियत भर ले कहे ये मोर चोला।
मरे मनखे तहाँ ले लास होथे। 

महाभारत करे कौरव न चाही।
लड़ाई बर घरो घर सास होथे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे हज़ज मुसद्दस महजूफ़ 
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन 

1222  1222 122 

जवानी मा बुढापा आय संगी। 
सफेदी बाल पूरा छाय संगी।  

बिहा पहिली सफा चट हे मुड़ी हर।
कहाँ टूरी भला अब भाय संगी। 

जवानी मा करे हे काम उलटा।
बुढापा आय अब पछताय संगी। 

उमर ढल गे मिलिस नइ एक टूरी। 
मिलिस बुढ़िया तभो अपनाय संगी।  

बिगड़ गे बात का करही बिचारा।
सबो के बात सुन खखवाय संगी। 

बियाये बर बियादिस सात लइका। 
सबो झन बाप ला गिंधियाय संगी।

करे सिंगार टूरी मटमटावय। 
दिखा के रूप वो भरमाय संगी। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़




Tuesday, 22 December 2020

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे हज़ज मुसद्दस महजूफ़ 
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन

1222  1222. 122 

ठहर थोरिक बतावँव बात का हे। 
अजी सुन गाँव के हालात का हे।  

भगा गे एक टूरा संग टूरी।  
अभी झन पूछ ओखर जात का हे।  

लगा के झूल गे फाँसी बबा हर।  
मरे लाँघन भला वो खात का हे।

उठा के लेग गे हाथी ल बरहा।  
इहाँ बचबो हमर औकात का हे।

हवय चिखला पियासे लोग अब तक। 
सिरागे माल सब बनवात का हे।  

पियत हे खून मच्छर रात दिन जी। 
गली मा देख ले बोहात का हे। 

सुखागे हे बड़े तरिया इहाँ के।  
अभी झन पूछ की बस्सात का हे।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Sunday, 20 December 2020

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रमल मुसम्मन सालिम 
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन
2122  2122 2122  2122  

बाँध के बीड़ा किसनहा बोह मुँड़ लानत हवँय जी। 
अन्न के हर एक दाना खास हे जानत हवँय जी।  

काम सब आसान होथे धीर धर मिहनत करे ले। 
पा जथे हीरा तको ला जेन मन छानत हवँय जी। 

सीख चाँटी के करम ले जेन पग आगू बढ़ावय।
पा जथे मंजिल कठिन तक जेन मन ठानत हवँय जी। 

द्वेष राखे मन लड़ेबर खोजथे ओखी हमेसा।
बात मा दम नइ रहय पर बात ला तानत हवँय जी।

अब बड़े के मान नइ हे बात के नइ हे ठिकाना।
आज कल के लोग लइका बात कब मानत हवँय जी। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रमल मुसम्मन सालिम 
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन 

2122  2122 2122  2122   

तोर ले हे मोर रिस्ता मन तभे अकुलात हावय। 
चाह मन मा नइ हवय आँखी मगर इतरात हावय।  

मोला जाना दूर हे पर मन कथे थोरिक ठहर जा। 
मोर रसता ओ डहर तन तोर कोती जात हावय। 

देख झन मुड़ मोर कोती मोर साहस बढ़ सकत हे। 
तोर रुक-रुक रेंगना ले मोर मन ललचात हावय।  

छम छमाछम बाज के मोला बलावत तोर पैरी। 
तोर बेनी मा लगे गजरा तको ममहात हावय। 

अब लहुट ना हे मगर घिलरत हवँव मँय तोर पाछू। 
तोर अइठे केस मोला जोर ले उलझात हावय।

कोन अस मोला बता दे काय हावय नाँव गोरी। 
गाँव कतका दूर बाँचे देख बदरी छात हावय। 

ये मया जंजाल होगे छोड़थौं पर नइ छुटत हे। 
डोर बिन बँधना बँधाये का जनी का बात हावय।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

Thursday, 17 December 2020

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रमल मुसम्मन सालिम 
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन 

2122  2122 2122  2122 

ओढ़ के सुत जा रजाई जाड़ अबड़े बाढ़ गे हे। 
मान कहना मोर भाई जाड़ अबड़े बाढ़ गे हे। 

काँप गे धरती तको हर हे सुरज बादर लुकाये। 
देख के झन कर ढिठाई जाड़ अबड़े बाढ़ गे हे। 

देख सर्दी हो जही खाँसी तको हर हो सकत हे।
खाव झन अब तो खटाई जाड़ अबड़े बाढ़ गे हे।  

हाथ मुँह जम्मो चटक गे पाँव तक चेर्रा हनत हे।
साँच कहिथे मोर दाई जाड़ अबड़े बाढ़ गे हे।

काँप जाथे तन बदन हर पाँव पानी मा धरे ले। 
छोड़ दे अब तो नहाई जाड़ अबड़े बाढ़ गे हे। 

पेंड़ मा जम गे बरफ हर देख तरिया नइ दिखत हे। 
कोन रसता अब बताई जाड़ अबड़े बाढ़ गे हे। 

सब तरफ फइले बरफ हे जीव एक्को नइ दिखत हे।
अउ बता कतका गिनाई जाड़ अबड़े बाढ़ गे हे। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Monday, 14 December 2020

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रमल मुसम्मन सालिम 
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन

2122  2122 2122  2122 

मोर बेटा आज मोला घर निकाला कर दिए तँय।
मोर अंतस चोंट करके आँख आँसू भर दिए तँय।

मोर मिहनत के कमाये मोर घर अब मोर नइ हे। 
सँग गुजारा नइ चलय कह लान आश्रम धर दिए तँय।

बाल पन ले हर जरूरत तोर पूरा मँय करे हँव।  
मोर बर बासी तको नइ हे कहे अउ टर दिए तँय।

का कमाही काय खाही सोंच का नइ आय होही?
नान कन मोला कटोरा सोंचथौं काबर दिए तँय।

भूल गे तँय दिन पुराना जब जरूरत तोर आइस। 
गाँव के घर खेत बेचे रोज आके गर दिए तँय। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रमल मुरब्बा सालिम 
फ़ाइलातुन  फ़ाइलातुन 

2122   2122 

आज आजा मन बना के। 
खेलबो धुर्रा सना के। 

ब्याम करबो रोज नइ ते। 
टूट जाही तन तना के। 

पार हाँका काय पाबे।
लोग मन ला तँय जना के। 

एक दिन अइसे भी आही।
बट जही घर तक चना के।

काय हावय तोर घर मा। 
मत बता सब ला गना के। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़