पेंड़ (चौपाई)
बीजा जब माटी मा आथे, अउ ओमा पानी पर जाथे।
तब बीजा अंकूरित हो के, जड़ देथे बीजा खुद खो के।
दू पत्ता पौधा के आथे, आगू चल के तना बनाथे।
फिर ठाँगा मन आवत जाथे, जेमा पूरा पत्ता छाथे।
जड़ ले पानी खातू पावय, पत्ता मा जेला भिजवावय।
सूरज के गरमी ला पा के, भोजन पावय वो निरमाके।
फूल फुले फिर सुग्घर सुग्घर, फर लग जावय उज्जर उज्जर।
फर के बीजा माटी जावय, जे पौधा बन के फिर आवय।
परदूषण ला अंतस लेथे, शुद्ध हवा हमला ये देथे।
छइहाँ फर अउ फूल लुटाथे, सुख बाँटत वो सुख ला पाथे।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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