Thursday, 31 December 2020

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन

1222 1222 1222 

गरीबी मा झुलस जाथे ये जिनगानी। 
कहाँ सुख चैन ला पाथे ये जिनगानी। 

न खाये के ठिकाना हे न कुरिया के। 
तभो आराम फरमाथे ये जिनगानी। 

कभू सूखा कभू जाड़ा जनावत हे। 
सबो मौसम ल अपनाथे ये जिनगानी। 

दुसर के शान शौकत देख जल जाथे।
गरीबी सोंच पछताथे ये जिनगानी। 

कहूँ मिल जाय धन दौलत अचानक से।
उड़ा के खूब इरताथे ये जिनगानी।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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