Monday, 30 November 2020

श्रृंगार छंद

श्रृंगार छंद (कका) 

कका के कहना ला तँय मान। 
कका हर नोहय कोनो आन। 

कका का काहत हावय जान। 
कका के कथनी ला पहिचान।  

कका हर करथे हर पल सोर। 
कका के कामा हावय जोर। 

कका ले झन तँय होबे बोर। 
कका के आगू झन ग निपोर।  

कका हर रसता बने दिखाय। 
कका के अनुभव सँउहत आय। 

कका के कहना जे नइ भाय। 
कका के बात सोंच पछताय। 

कका के आँखी हावय चार। 
कका हर देखय परदा पार। 

कका नइ मानत हावय हार। 
कका हर देखे हे संसार। 

कका के हाथ तको हे लाम। 
कका हर नोहय संगी आम। 

कका नइ देवय कब्भू दाम। 
कका ले हो जावत हे काम।  

कका मिल जाथे जम्मो गाँव। 
कका के रहिथे एक्के ठाँव। 

कका हर बइठे रहिथे छाँव। 
कका के कका रथे जी नाँव। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़


Sunday, 29 November 2020

छन्न पकइया

छन्न पकइया 

छन्न पकइया छन्न पकइया, जाड़ा के दिन आगे। 
सुर-सुर सुर-सुर हवा चलत हे, तन हर ठिठुरन लागे। 

छन्न पकइया छन्न पकइया, भुर्री बारव भाई। 
हाड़ा गोड़ा काँपत हावय, माते हे करलाई। 

छन्न पकइया छन्न पकइया, गरम रजाई लावव। 
ठिठुरत हावय बूढ़ी दाई, झट वोला ओढावव। 

छन्न पकइया छन्न पकइया, कम्बल तक कम लागे। 
कतको ओढव कथरी चद्दर, जाड़ कहाँ ले भागे। 

छन्न पकइया छन्नपकइया, छूहू झन जी पानी। 
बिहना बेरा कहूँ नहाये, सुरता आ जय नानी। 

छन्न पकइया छन्न पकइया, सूरज तक घबराथे। 
लेट लतीफी आवत हावय, अउ झट कुन बुड़ जाथे। 

छन्न पकइया छन्न पकइया, जाड़ा करे भलाई।
आनी बानी के तरकारी, मजा उड़ावव भाई। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

बाल कविता

बाल कविता 

कहाँ रहत हे राजा रानी। 
कइसन ऊँखर हे जिनगानी। 

कइसन ऊँखर महल अटारी। 
का उँखरो हे ब्यारा बारी। 

कोन बताही का भावत हे। 
का हीरा मोती खावत हे।  

कइसन ऊँखर होय बिछौना। 
ऊँच होय की बौनी बौना। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

बाल कविता

बाल कविता 

चला खेलबो छुपन छुपाई। 
कोठा कुरिया मा छुप जाई। 

सोनू मोनू मुनिया आवव। 
जल्दी से तुम सब छुप जावव। 

गिनती दस कर मँय आवत हँव। 
कहाँ लुकाये नइ पावत हँव। 

पहिली मुनिया दुसरा मोनू।  
खटिया पाछू तीसर सोनू। 

अब मुनिया हर खोज बताही। 
चला लुकाबो कइसे पाही। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

बाल कविता

बाल कविता  
पीं-पीं पों-पों पीं-पीं पों-पों

आवत जावत नरियावत हे। 
पीं-पीं पों-पों पीं-पीं पों-पों। 

तिरे तीर आ डरव्हावत हे। 
पीं-पीं पों-पों पीं-पीं पों-पों।  

नवा सड़क मा इतरावत हे। 
पीं-पीं पों-पों पीं-पीं पों- पों। 

करिया धुँआ ल उड़ियावत हे। 
पीं-पीं पों-पों पीं-पीं पों-पों। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रजज़ मुसद्दस सालिम 
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन 

2212  2212 2212  

सब जान के अंजान काबर तँय बने। 
रेते नरी बइमान काबर तँय बने। 

करनी सबो हे तोर हमला हे पता। 
सिधवा असन नादान काबर तँय बने। 

मनखे बने जानत रहे हन हम सदा। 
लालच म आ हैवान काबर तँय बने। 

नइ हे कका ताकत तनिक भी देह मा। 
तलवार धर सुलतान काबर तँय बने। 

खोजत रथे तोला सिपाही मन सदा।
सब चोर के पहिचान काबर तँय बने। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Saturday, 28 November 2020

बाल कविता

बाल कविता 

मदारी 

डम-डम डमरू बाजथे। 
करिया भालू नाचथे। 

कूदत हावय बेंदरा। 
पहिरे चिरहा चेंदरा।   

टूरी रेंगय डोर मा। 
खेल होत हे खोर मा।

गाँव मदारी आय हे। 
सुग्घर खेल दिखाय हे। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रजज़ मुसद्दस सालिम 
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन 

2212  2212 2212  

मन मोर नाचत हे घटा ला देख के। 
तन तोर नाचत हे घटा ला देख के। 

जंगल तरी खुसरे मयूरा हर तको। 
घनघोर नाचत हे घटा ला देख के। 

आगे किसानी दिन मगन हे खार हर।  
सब ओर नाचत हे घटा ला देख के। 

चट-चट जरय  जाही सिरा ये सोंच जी। 
अब खोर नाचत हे घटा ला देख के।  

खेलत हवय अब खोर मा लइका तको । 
कर सोर नाचत हे घटा ला देख के।

ठंडा हवा बन मनचला उड़ियात हे। 
झकझोर नाचत हे घटा ला देख के। 

देखव चिरइया हर तको लहरात हे। 
दे जोर नाचत हे घटा ला देख के। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Friday, 13 November 2020

कविता

दूर पटाखा ले रहना हे 

आज सबोझन ले कहना हे। 
दूर पटाखा ले रहना हे। 

शोर शराबा फइलावत हे। 
हाथ तको हर जर जावत हे। 

धुँआ परे ले आँखी जलथे। 
जाय रोशनी जिवरा खलथे। 

कान तको भैरा हो जाथे। 
बाद तहाँ लोगन पछताथे। 

आग लगे के खतरा भारी। 
तिरे तीर रहिथें नर नारी। 

अइसन मा आफत झन लावव। 
हँसी खुशी त्यौहार मनावव। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

कविता

दीप परब 

दिया जलत हे येती ओती। 
जगमग-जगमग चारो कोती। 

घर अँगना परछी अउ कुरिया। 
रिगबिग बारय घर भर जुरिया।  

कोठा अउ खलिहान चमक गे। 
गाँव गली चहुँ ओर दमक गे। 

मंदिर-मंदिर द्वारे-द्वारे। 
दिया जलावय मिलजुल सारे। 

आज अमावस तक हे हारे। 
धरती मा आये सब तारे। 

ताल तलइया सुग्घर लागे। 
डगर-डगर भर रौनक छा गे।  

कोनो घर अँधियार न राहय। 
रहे उजाला सबझन चाहय।

जुरमिल खुसी मनावव भाई। 
दीप परब के मिले बधाई। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़



कविता

दीप जलाएँ 

आओ बच्चों दीप जलाएँ। 
अँधियारे को दूर भगाएँ। 

मात अमावस को देना है।
घर-घर के दुख हर लेना है।  

कोई कोना रह ना जाये। 
दीप जले जो सब को भाये। 

दीपों की हम वली बनाएँ।
छत आँगन खलिहान सजाएँ 

द्वार-द्वार रंगोली डालो। 
जितना चाहो खूब सजालो। 

फोड़ पटाखे खुशी मनाओ। 
बजे ढोल तो नाच दिखाओ। 

हँसी खुशी त्यौहात मनाना।
दीपों का यह पर्व सुहाना।   

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़



Thursday, 12 November 2020

बाल कविता

झोला 

सोनू के झोला हे सुग्घर। 
देख दिखत हे उज्जर उज्जर। 

येमा पुस्तक कॉपी हावय। 
जे दुनिया के ज्ञान बतावय। 

भीतर मा बक्सा तक हावय। 
जेमा पेंसिल रबर धरावय। 

पट्टी करिया देख दिखत हे।
जेमा सोनू सुघर लिखत हे। 

कलम धराये नीला लाली। 
कॉपी बर ले हावय काली। 

बाँटी भौंरा रस्सी हावय। 
खेल समय मा खूब चलावय। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़


Saturday, 7 November 2020

ताटक छंद

ताटक छंद

जो दिखता है ओ बिकता है।देखो आज जमाने में।
उम्र खपा दी सारी अपनी,मान जरा सा पाने में।

लिखना पढ़ना सब सिखलाया,जिसको कुछ ना आता था।
जो इसकुल आने में पहले,देख हमे घबराता था।
सालों बीतें जिन बच्चों को,अंक ज्ञान समझाने में।
वही आज बतलाते हमको,खामी बहुत पढ़ाने में।

जैसे नींव दिखे ना कुछ भी,कैसे कर निर्माण किए।
मान महल पाता है जादा,जिसने सुंदर रूप दिए।
नींव बनाया किसने कैसा,भारी महल टिकाने में। 
उसको कोई पूछ रहा ना,देखो आज जमाने में।

दोस दिया करते हैं हमको,क्या हमने सिखलाया है।
ज्ञान मिला है जो बच्चों को ,ओ उनसे हीं पाया है।
बच्चे भी उनको सहराते,दिखता वही जमाने में।
उम्र खपा दी सारी अपनी,मान जरा सा पाने में।

अपना काम करेंगे हम तो,जो कर्तब्य हमारा है।
मान मिले ना फिर भी शिक्षक,कभी कहाँ ओ हारा है।
अनगढ़ को गढ़ कर दिखलाना,मुश्किल रहा जमाने में।
पर हम तो कर के दिखलाते,सहज रहे जस खाने में।

दिलीप कुमार वर्मा

सखि छंद

सखी छंद

पथरा हावय बड़ भागी।नइ लागय ओला दागी।
कतको छीनी मा मारै। पर पथरा हर नइ हारै।

धरती मा हावय भारी।लाली सादा अउ कारी। 
कोड निकालत हे ओला। टोरत फोरत हे चोला।

नींव बनाय अटारी के। परदा बनथे बारी के।
सड़क बने बर बिछ जाथे।पचरी बन के सुख पाथे।

जाँता ले रोटी खाले।सिलपट्टा चटनी पाले।
बेलन चौकी बन जाथे।सब पथरा ला सहराथे।

पुलिया बनथे नाली के। आमा टोरय डाली के।
टूट बने पथरा रेती।काम हमर आये सेती।

चमचम कुँआ बँधाये हे।पूल नदी के भाये हे।
अँगना कुरिया परछी मा।कटे न भाला बरछी मा।

लाल किला हे लाली के।झन समझव ये काली के।
ताजमहल हावय सादा।जग मा जे चर्चित जादा।

पथरा के ताँबा लोहा।लागय पथरा बन कोहा ।
सिरमिट बनथे पथरा के।खान बने सब खतरा के।

पूजत हे मनखे तोला।देव असन करके चोला।
भगवन ला खोजत हावै।देख सबो मन सुख पावै।

बिन पथरा के का होही।रीड़ धरा अपने खोही।
धरती दलदल बन जाही।जीव जगत सब दुख पाही।
दिलीप कुमार वर्मा

कुंडलियाँ

कुंडलियाँ

बरसा के पानी परे, महकावत हे अंग।
खेत खार झूमन लगे,धरती बदले रंग।
धरती बदले रंग, सरग कस भुइयाँ होगे।
मचलत चले किसान,तपन हर जम्मो खोगे। 
होगे तनिक कुबेर,आय पर हे तरसा के।
जीव सबो हरसाय,पाय पानी बरसा के।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

सखि छंद

सखी छंद

व्यथा कुकुर के सुन लौ जी।काय कहत हे गुन लौ जी।
काबर ओला दुख देथौ।नाम उखर काबर लेथौ।

मनखे ले गलती होथे।कुकुर बिचारा हा रोथे।
मनखे हर गारी खाथे।कुत्ता तब ओ कहलाथे।

अइसन का मजबूरी हे।कहना कुकुर जरूरी हे?
कुत्ता के का गलती हे।नाम डहर का चलती हे।

जादा जब गुस्सा जाथे।मनखे अब्बड़ चिल्लाथे।
खून पिये बर तक सोंचे।कुकुर सुने ता मुड़ नोंचे।

मनखे ला जइसे मारौ।गोंदा गोंदा कर डारौ।
खून हमर झन पीहौ जी।का अइसन तुम जीहौ जी।

हम तो करथन रखवाली।काम हमर नइ हे जाली। 
सेवा हमर कहानी हे।सँग तुहँरे जिनगानी हे।

मनखे जइसन झन जानौ।बात कहत हँव सच मानौ।
मनखे मन देथे धोखा।काम उखर नइ हे चोखा।

हम साथी अँधियारी के।खेत गली अउ बारी के।
का मनखे हर कर पाथे।ठुड़गा देखे डर्राथे।

अब तो कहना ला मानौ।काम हमर का हे जानौ।
नाम हमर झन लेहौ जी।अतके बस कर दैहौ जी।
दिलीप कुमार वर्मा

सखि छंद

सखी छंद

मोर गली तँय झन आबे।आबे ता बड़ दुख पाबे।
मोर गली मा काँटा हे।चाब दिही बड़ चाँटा हे।

खटके सबके आँखी मा।वार करे सब पाँखी मा।
एक कदम नइ चल पाबे।देखे सब जेती जाबे।

ताना मार रुला देही।कहिके अबड़े सुख लेही।
आँसू पोछ न पाबे तैं।रो रो कहाँ बताबे तै।

बैरी अबड़ जमाना हे ।अबतक बहुत पुराना हे।
पहिनावा ला नइ भावै।अइसन तक मनखे हावै।

सँघरा कइसे चल पाबे।ताना सुन के पछताबे।
लुगरा बिन ये छोरी हे ।देखव निच्चट गोरी हे।

कइसन बहू कुवारी हे।लगथे शहरी नारी हे।
माँग तको सुन्ना हावै।हाथ धरे सँग सँग जावै।

लाज सरम सब छोड़े हे।कइसन नाता जोड़े हे।
मुड़ ढाँके तक नइ जानै।नता गुता ला नइ मानै।

जब ये सब ला सुन पाबे।तभे रहे बर तँय आबे।
तब तक बंद दुवारी हे।मोरो तो लाचारी हे।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

दोहा

दोहा

मरनाशन में लेट कर,देख जगत का हाल।
कौन यहाँ अपना रहे,कौन चाहता काल।

बहुत दुखी तेरे लिए,करता रहे विलाप।
अंतस पट को झाँकिए, कितना मन मे ताप।

जिंदा रहने से अगर,मिलता है कुछ दाम।
ओ ज्यादा दुख में रहे,जिसको तुझसे काम।

कर्जदार गर हो सखा,लेके साहूकार।
दुआ करे ओ रात दिन,आता रहे उधार।

पत्नी का लफड़ा रहे,सोचे ये मरजाय।
दूजा करूँ विवाह जो,काम बहुत ओ आय।

बेटा चाहे बाप का,अनुकम्पा मिलजाय।
बिन मिहनत की नौकरी,कामचोर को भाय।

बीमा का पैसा मिले,पूर्ण ख्वाब हो चंद। 
पत्नी चाहे काल क्यों,आज स्वांस हो बंद।

बाप हमेसा चाहता,ठीक रहे औलाद।
फले फुले घर आँगना,जाए मेरे बाद।

बेटी रोती रह गई,एक रखे अरमान।
सर से साया ना हटे,रहे सलामत जान।

बिलख बिलख माँ रो रही, हाथ रखे ओ भाल।
बेटा के बदले अभी,मुझको आये काल।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

लावणी छंद

लावणी छंद गीत

सरग बरोबर गाँव हवय गा, छोंड़ कभू झन जाबे रे।
देख शहर के चका चौंध मा,जाके झन फँस जाबे रे।

बड़े बड़े हे महल अटारी,उहाँ कहाँ तँय घर पाबे।
जम्मो उहाँ मकान बने हे, जेन गली मा तँय जाबे।
रहिथे सबो सराय बरोबर,देख तहूँ पछताबे रे।

पइसा खातिर सब दउड़त हे, समे कहाँ दे पावत हे।
जेन बिहानी ले जावत हे, रात अँधेरी आवत हे।
दया मया के बात करे ना,बता उहाँ का पाबे रे।

तरस जबे पानी के खातिर,हवा तको घर नइ आवय।
खेत खार देखे नइ पाबे,गन्दा नाला बोहावय। 
शोर शराबा गली गली मा,सुन निसदिन झल्लाबे रे।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

दोहा

दोहा

मुझको मरना है सखा,बता करूँ क्या काम ।
निसदिन झंझावात से,मुझे मिले आराम।

जीवन के इस रेस में,थका हुआ बेहाल।
ऐसी युक्ति दीजिए,तुरते होय कमाल।

कोई लफड़ा ना रहे,तनिक रहे न मलाल।
खुशी मिले परिवार को,दोस लगे ना भाल।

चीरा फाड़ी ना करे,साबुत हो यह देंह।
खुशी खुशी तन हो बिदा, कहीं भरे ना नेह।

याद करे या ना करे,तनिक रखे ना ताप।
मेरे जाने से सखा,ना हो तनिक विलाप।

ऐसा तो होगा नहीं,जैसी तेरी चाह।
तू जो जिंदा ही रहे,तभी मिलेगा राह।

सबका सुख गर चाहता,तो कर ऐसा काम।
उँगली तुझपे ना उठे,तभी मिले आराम।

नशा नसेड़ी छोड़ दे,लगा काम में ध्यान।
मरने का यह ख्याल भी,कभी न आये मान।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

दोहा

जनउला
कइसन चौकीदार हे, बोले ना बतियाय।
कर बोर्री मा गुदगुदी,तुरते ओ हट जाय।
ताला

भजन सुनावय रात दिन,घर घर घूमत आय।
पीयय पानी लाल ओ,घर डबरा म बनाय।
मच्छर

जबरन लोग चलाय तब, सुसु करत ओ जाय।
येती तेती फेंक दय, जब जब सुसु सिराय।
कलम

उजला बेरा सँग रहे,सँग सँग रेंगत  जाय।
देख अँधेरी रात ला,तुरते रहे भगाय।
छइहाँ

बिना रंग अउ गंध के,मिलथे सकल जहान।
जे पाये खुशहाल हे, नहि ते मरे समान।
पानी
दिलीप कुमार वर्मा

सखि छंद

सखी छंद
शहर के रोना

जब ले शहर बनाये हे।देख सबो हरसाये हे।
छोड़ सबो आवत हावै।गाँव कहाँ भावत हावै।

बड़का महल अटारी हे।काम सबो सरकारी हे।
नाली सड़क बने पाबे।जेन गली तँय हर जाबे।

बिजली हे जतका चाही।पानी तक ला ओ लाही।
गली गली बहराथे जी। कचरा लेगे आथे जी।

जे चाही ते मिल जाथे।गली गली बेचे आथे।
खुले दुकान हवय भारी।लेवत हे सब नर नारी।

पर मनखे घर खुसरा हे।सच मानव खसभुसरा हे।
बाहिर कोती नइ जावै।बइठे घर बड़ दुख पावै।

भइसा कस तन होगे जी।बइठे के फल भोगे जी।
बीमारी सचरे हावै।खाये के सुख नइ पावै। 

शोर शराबा हे भारी।जीना अब हे लाचारी।
इहाँ प्रदूषण बाढ़े हे।काल दुवारी ठाढ़े हे।

रोग हृदय ला हो जाथे।तभ्भे तो झटका आथे।
शक्कर के बीमारी हे।पर जीना लाचारी हे।

केंसर रोग हमाथे जी।जे हर तन ला खाथे जी।
आनी बानी के रोगी।जादा मन शहरी भोगी।

झुग्गी मन के डेरा हे।दलदल सदा सवेरा हे।
पनपत हवय महामारी।मरना हवय सदा जारी।

अपराधी मन के डेरा।रोज लगावत हे फेरा।
जाने कब का हो जाही।सोंचय कइसे ओ आही।

चोर उचक्का तक आथे।लूट सबो ला ले जाथे।
छीनत हे चाँदी सोना।इही शहर के हे रोना। 

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

गीत

गीत

समे बड़ा बलवान,रे भाई समे बड़ा बलवान।
नइ जाने ते गुस्सा करथे,जान अरे नादान।
रे भाई समे बड़ा बलवान।

जे सब्जी ठंडा मा आथे,कौड़ी दाम बेंचाथे।
फेंकत रहिथे बारी वाला,दाम कहाँ ओ पाथे।
ओ सब्जी बरसा मा खाबे,देबे भारी दाम
रे भाई समे बड़ा बलवान

गोभी बंधी सेमी भाटा, ये ठंडा मा आथे। 
भारी मँहगा लाल टमाटर,धारे धार बोहाथे।
काला कब कब खाना हावय,समे जरा पहिचान।
रे भाई समे बड़ा बलवान

गरमी राखे सुकसी खाले,खाले जीमी कांदा।
रखिया मखना बरी बनाले,नोहय संगी फांदा।
आमा लाल कलिंदर खाले,इही बचाथे जान।
रे भाई समे बड़ा बलवान

बरसा मा पटवा भाजी अउ,रमकलिया हे बारी।
बरबट्टी खीरा अउ कुंदरू,मिले करेला भारी।
डोंड़का फोकट मा मिल जाथे,बात कहँव सच मान।
रे भाई समे बड़ा बलवान

मँहगाई के रो झन रोना,जइसे हाबय खाले। 
बे मौसम के सब्जी भाजी,खा के मजा उडाले।
समे परे रसता म फ़ेंकाथे, जइसे मरे समान।
रे भाई समे बड़ा बलवान।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

सार छंद

सार छंद

जाने कोन डहर चलदिस हे, ये बरसा के पानी।
उमड़ घुमड़ गरजत ललचाइस, छा गे रहिस जवानी।

धान बुवाई सब कर डारिन,धनहा डोली भर्री।
पानी नइ गिरही ता संगी,बन जाही सब दर्री।

हवा चलत हे सुरसुर सुरसुर,फुरहुर तन हा लागे।
हो जावय पानी के बरसा,तभे भाग हर जागे।

निच्चट देख निटोर दिए हे, जाने अब का होही।
खेत खार उखरा गड़ही अउ,धरती दाई रोही।

सावन के महिना आवत हे,सुख्खा नदिया नरवा।
काँवरिया पानी नइ पावय,जर जाही अब तरवा।

भोले बाबा मारे गरमी, ताण्डव नाच दिखाही।
हाहाकार मचे धरती मा, सब के बया भुलाही।

धरती दाई तको पुकारे,हे बरसा तँय आजा।
तन मन रूखा सूखा होगे, अब तो प्यास बुझा जा।

लइका मन सब रोवत हावय,देखत हे मुँह फारे।
करिया बदरा अब तो आजा,पानी तँय बरसा रे।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार 12-7-2019

जयकारी छंद

जयकारी छंद

बबा कहे मँय घर नइ जाँव,साधु बने जिनगी ल बिताँव।
भीख माँग के मँय हर खाँव,भले सड़क मा मँय मर जाँव।

बहू तनिक मोला नइ भाय,बात बात मा बात सुनाय।
थारी लोटा पटकत जाय, बेटा ला ओ रोज दबाय।
थोर थोर देथे ओ खाय, सुख्खा रोटी ला परसाय।
दूध दही ला देत लुकाय, मुसुर मुसुर कुरिया मा खाय। 
बबा कहे

मँय कुरिया बइठे रह जाँव,बाँचे खोंचे ला मँय पाँव।
घर मा दुख के हावय छाँव,पर सुरता आथे ओ गाँव।
संगी साथी के भरमार,बइठन हम जे तरिया पार।
घूमे जावन हम तो खार, छूटत हावय ओ संसार।
बबा कहे

मोर बनाये ओ घर द्वार,दया मया के ओ संसार।
जब ले संगी गे जग पार, जिनगी हर होगे बेकार।
अब तो नाती घर नइ जाँव,मया उहाँ थोरिक नइ पाँव।
भजे छूट जय पुरखा गाँव, साधु बने जिनगी ल बिताँव।
बबा कहे

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

लावणी छंद

लावणी छंद

मँय बन के बम के गोला,फूट करँव चिथड़ा तोला।
हाथ धरे हथियार हरँव,गोली छाती पार करँव।

सीमा के रक्षा करथौं,बैरी के गरदन धरथौं।
घेंच अइँठ के मारौं रे,बैरी ले नइ हारौं रे।

सागर कस लहरा मारौं।बैरी ला दुरिहा टारौं।
उठा पटक दँव धरती मा।आम गिरे जस गरती मा।

भीतर मा तूफान भरे।बैरी देखत चाल डरे।
उड़िया जाथे जे आथे।कोन जनी काहाँ जाथे।

बादर कस गरजत आवँव।बिजुरी कस चमकत जावँव।
थरथर बैरी काँप जवय।रूप देख के भाँप जवय।

नदिया कस कलकल पानी।झूमय जब बरखा रानी।
बाढ़ बरोबर मँय आथौं।बोहावत सब ले जाथौं।

लावा कस डबकत रहिथौं।जाड़ घाम सब ला सहिथौं।
लेसँव बैरी ला धर के।यमपुर जावय ओ मर के।

पाँव पटक भूचाल करौं।बैरी सब बेहाल करौं।
बरत रहँव आगी जइसे।भागय अब बैरी कइसे।

दिलीप कुमार वर्मा

हरिगीतिका छंद

गुरुदेव

गुरुदेव के आशीष ले,पाये हवन हम ज्ञान जी। 
उखरे कृपा के जोर ले,मिलथे सदा सम्मान जी।
अज्ञानता के तोपना ले,सब ढँकाये हे इहाँ।
गुरुदेव ही हर खोलथे, सच मानलव देखव जिहाँ।

गुरुदेव के ना जात हे, ना गोत्र अउ ना धर्म हे।
दुख दूर कर सुख सींचना,गुरुदेव के बस कर्म हे। 
गुरुदेव ओ बनथे सखा,जेकर करा सब ज्ञान हे।
सब ला बराबर जान के,शिक्षा करत जे दान हे।

बड़का उमर के होय ले,नइ बन सकय गुरु जान जी।
छोटे तको गुरु बन जही,जेकर करा हे ज्ञान जी।
जे हर सिखावत हे हुनर,गुरु तेन बड़का मान ले।
बस कान फूँकत जे इहाँ,नइ होय गुरु ये जान ले।  

गुरु के चरण मा मँय अपन,माथा नवावत हँव अभी।
गुरुदेव के आशीष ले,अँधियार मिट जावय सभी।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

कविता

चटनी बासी

चटनी पिसँव पताल के,बासी बाँचे काल के।
सरपट सरपट खाहूँ जी,सिरतो मजा उड़ाहूँ जी।

हरियर धनिया डार के,चट ले मिरचा मार के। 
नून तनिक छीटा देहूँ, अबड़ मजा अब मँय लेहूँ।

महर महर ममहात हे, देखत मन ललचात हे।
चटनी ये सिलपट्टा के,बाँटव झन जस बट्टा के।

मही तनिक अब डार दव,नून जरा सा मार दव।
अबड़ मिठाथे बासी हा,अमसुर लगे तियासी हा। 

बड़ गुणकारी जान लव,साँच कहत हँव मान लव।
शोध करे ले पाये हे, गुणकारी बतलाये हे।

फाइबर्स के ये खान हे,पसिया हर पहिचान हे।
खट ले ये पच जावत हे, सबके मन ला भावत हे।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

बाल कविता


फद फिद फद ले,टूरा गिरे बद ले।
टुरी मुसकाय दय,हिहि हाहा गाय दय।

सावन के सार हे, पानी आर पार हे।
चिखला बम फार हे, गली म कोठार हे।

गेड़ी करे रेच रेच,गली होवय पेच पेच। 
गेड़ी ह अटक गे, टूरा ह सटक गे।

टुरी रेंगे आँय बाँय,लहँगा हे झाँय झाँय।
चिखला छिटकाय गे,लहँगा सनाय गे।

ढिस ढास ढुस ले,टुरी रोदिस फुस ले। 
टूरा ह चिढाय दय,हिहि हाहा गाय दय।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

ताटक छंद


हम भी अब संकल्प करेंगे,और जगत में छाएंगे।
पेंड़ लगाते लेंगे सेल्फी,काम बड़ा कर जाएंगे।

हराभरा धरती करने को,हम भी कदम उठाएंगे।
देख मीडिया की हरकत को,गैती खूब चलाएंगे।

खोद खोद कर मैदानों में,लाखो पेंड़ लगाएंगे।
हो जाएगा नाम हमारा,फिर नेता बन जाएंगे।

पेंड़ लगे या नही लगे ओ,कौन भला पीछे देखे।
कैसे मिडिया में आना है,जो चाहे हमसे सीखे।

दिलीप कुमार वर्मा

रूपमाला छंद

रूपमाला छंद

मोर सपना के सखी तँय, मोर मन के आस ।
मोर जिनगी हा चलत हे, तोर देहे साँस।
तोर ले हिरदे धड़कथे,तोर ले संसार।
तोर बिन सुन्ना परे हे, मोर घर अँधियार।

जे मया मँय तोर पाहूँ, हो जहूँ आबाद।
नइ मिले जे मोर जोही,हो जहूँ बरबाद।
तोर सुरता मा गुजरथे,मोर दिन अउ रात।
आ जबे तँय मोर मैना,कर मया बरसात। 

तोर आँखी मा अँजाये,तेन कजरा ताँव।
तोर बेनी म सजाये ,तेन गजरा ताँव।
तोर माथा मा लगे मँय,रूप ला निखराँव। 
तोर मुँह के लाल गोरी,दे मया बरसाँव।

दिलीप कुमार वर्मा