जयकारी छंद
बबा कहे मँय घर नइ जाँव,साधु बने जिनगी ल बिताँव।
भीख माँग के मँय हर खाँव,भले सड़क मा मँय मर जाँव।
बहू तनिक मोला नइ भाय,बात बात मा बात सुनाय।
थारी लोटा पटकत जाय, बेटा ला ओ रोज दबाय।
थोर थोर देथे ओ खाय, सुख्खा रोटी ला परसाय।
दूध दही ला देत लुकाय, मुसुर मुसुर कुरिया मा खाय।
बबा कहे
मँय कुरिया बइठे रह जाँव,बाँचे खोंचे ला मँय पाँव।
घर मा दुख के हावय छाँव,पर सुरता आथे ओ गाँव।
संगी साथी के भरमार,बइठन हम जे तरिया पार।
घूमे जावन हम तो खार, छूटत हावय ओ संसार।
बबा कहे
मोर बनाये ओ घर द्वार,दया मया के ओ संसार।
जब ले संगी गे जग पार, जिनगी हर होगे बेकार।
अब तो नाती घर नइ जाँव,मया उहाँ थोरिक नइ पाँव।
भजे छूट जय पुरखा गाँव, साधु बने जिनगी ल बिताँव।
बबा कहे
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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