Friday, 13 November 2020

कविता

दीप जलाएँ 

आओ बच्चों दीप जलाएँ। 
अँधियारे को दूर भगाएँ। 

मात अमावस को देना है।
घर-घर के दुख हर लेना है।  

कोई कोना रह ना जाये। 
दीप जले जो सब को भाये। 

दीपों की हम वली बनाएँ।
छत आँगन खलिहान सजाएँ 

द्वार-द्वार रंगोली डालो। 
जितना चाहो खूब सजालो। 

फोड़ पटाखे खुशी मनाओ। 
बजे ढोल तो नाच दिखाओ। 

हँसी खुशी त्यौहात मनाना।
दीपों का यह पर्व सुहाना।   

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़



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