Saturday, 7 November 2020

दोहा

जनउला
कइसन चौकीदार हे, बोले ना बतियाय।
कर बोर्री मा गुदगुदी,तुरते ओ हट जाय।
ताला

भजन सुनावय रात दिन,घर घर घूमत आय।
पीयय पानी लाल ओ,घर डबरा म बनाय।
मच्छर

जबरन लोग चलाय तब, सुसु करत ओ जाय।
येती तेती फेंक दय, जब जब सुसु सिराय।
कलम

उजला बेरा सँग रहे,सँग सँग रेंगत  जाय।
देख अँधेरी रात ला,तुरते रहे भगाय।
छइहाँ

बिना रंग अउ गंध के,मिलथे सकल जहान।
जे पाये खुशहाल हे, नहि ते मरे समान।
पानी
दिलीप कुमार वर्मा

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