Saturday, 7 November 2020

दोहा

दोहा

मुझको मरना है सखा,बता करूँ क्या काम ।
निसदिन झंझावात से,मुझे मिले आराम।

जीवन के इस रेस में,थका हुआ बेहाल।
ऐसी युक्ति दीजिए,तुरते होय कमाल।

कोई लफड़ा ना रहे,तनिक रहे न मलाल।
खुशी मिले परिवार को,दोस लगे ना भाल।

चीरा फाड़ी ना करे,साबुत हो यह देंह।
खुशी खुशी तन हो बिदा, कहीं भरे ना नेह।

याद करे या ना करे,तनिक रखे ना ताप।
मेरे जाने से सखा,ना हो तनिक विलाप।

ऐसा तो होगा नहीं,जैसी तेरी चाह।
तू जो जिंदा ही रहे,तभी मिलेगा राह।

सबका सुख गर चाहता,तो कर ऐसा काम।
उँगली तुझपे ना उठे,तभी मिले आराम।

नशा नसेड़ी छोड़ दे,लगा काम में ध्यान।
मरने का यह ख्याल भी,कभी न आये मान।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

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