लावणी छंद
मँय बन के बम के गोला,फूट करँव चिथड़ा तोला।
हाथ धरे हथियार हरँव,गोली छाती पार करँव।
सीमा के रक्षा करथौं,बैरी के गरदन धरथौं।
घेंच अइँठ के मारौं रे,बैरी ले नइ हारौं रे।
सागर कस लहरा मारौं।बैरी ला दुरिहा टारौं।
उठा पटक दँव धरती मा।आम गिरे जस गरती मा।
भीतर मा तूफान भरे।बैरी देखत चाल डरे।
उड़िया जाथे जे आथे।कोन जनी काहाँ जाथे।
बादर कस गरजत आवँव।बिजुरी कस चमकत जावँव।
थरथर बैरी काँप जवय।रूप देख के भाँप जवय।
नदिया कस कलकल पानी।झूमय जब बरखा रानी।
बाढ़ बरोबर मँय आथौं।बोहावत सब ले जाथौं।
लावा कस डबकत रहिथौं।जाड़ घाम सब ला सहिथौं।
लेसँव बैरी ला धर के।यमपुर जावय ओ मर के।
पाँव पटक भूचाल करौं।बैरी सब बेहाल करौं।
बरत रहँव आगी जइसे।भागय अब बैरी कइसे।
दिलीप कुमार वर्मा
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