Monday, 30 November 2020

श्रृंगार छंद

श्रृंगार छंद (कका) 

कका के कहना ला तँय मान। 
कका हर नोहय कोनो आन। 

कका का काहत हावय जान। 
कका के कथनी ला पहिचान।  

कका हर करथे हर पल सोर। 
कका के कामा हावय जोर। 

कका ले झन तँय होबे बोर। 
कका के आगू झन ग निपोर।  

कका हर रसता बने दिखाय। 
कका के अनुभव सँउहत आय। 

कका के कहना जे नइ भाय। 
कका के बात सोंच पछताय। 

कका के आँखी हावय चार। 
कका हर देखय परदा पार। 

कका नइ मानत हावय हार। 
कका हर देखे हे संसार। 

कका के हाथ तको हे लाम। 
कका हर नोहय संगी आम। 

कका नइ देवय कब्भू दाम। 
कका ले हो जावत हे काम।  

कका मिल जाथे जम्मो गाँव। 
कका के रहिथे एक्के ठाँव। 

कका हर बइठे रहिथे छाँव। 
कका के कका रथे जी नाँव। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़


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